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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 8 अगस्त। शांतिनगर में तृतीय वर्ग कर्मचारियों के आवास को तोडक़र जमीन गृह निर्माण मंडल को सौंपने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दायर जनहित याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने सिंचाई कॉलोनी, शांतिनगर रायपुर स्थित करीब 300 सरकारी आवासों को तोडक़र ‘रि-डेवलपमेंट’ योजना तैयार की है। इसे नये सिरे से तैयार करने का काम गृह निर्माण मंडल को सौंपा गया है। तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ ने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का कहा कि बीते चार दशकों से सिंचाई विभाग शांतिनगर, शहीद भगत सिंह चौक तथा शंकर नगर स्थित सरकारी आवासों की देखरेख कर रहा है। विकास योजना में सिर्फ शांतिनगर स्थित तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के आवासों को जर्जर बताकर शामिल किया गया है जबकि यहां पर मंत्रियों, आईएएस, आईपीएस अफसरों के बंगले भी उतने ही पुराने हैं। कर्मचारियों को 15 किलोमीटर दूर स्थित तुलसी, कचना, पिरदा जैसी जगहों पर आवास आबंटित किये गये हैं। इस पर फैसला लेते समय केबिनेट से कोई मंजूरी भी नहीं ली गई है।
शासन की ओर से महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने अपने जवाब में कहा कि सभी मकान 60 वर्ष पुराने हैं और उनके रख-रखाव में प्रतिवर्ष होने वाला खर्च नये मकानों के निर्माण व देख रेख पर आने वाले खर्च से ज्यादा है। शहर के विस्तार को देखते हुए इस योजना का क्रियान्वयन आवश्यक है। कर्मचारियों को वैकल्पिक आवास आबंटित कर दिया गया है। अधिकांश कर्मचारियों ने अपने आवास को खाली करके नई जगह पर आबंटन प्राप्त कर लिया है। नई योजना में निर्धारित मापदंड से अधिक हरित क्षेत्र सुरक्षित किया गया है।
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पी.आर. रामचंद्र मेनन व पार्थ प्रतिम साहू की बेंच ने जनहित याचिका खारिज करते हुए शासन के निर्णय को सही ठहराया है।


