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रामगढ़ संरक्षण परिचर्चा: कोल खदानों और पर्यावरण पर पूर्व डिप्टी सीएम सहित कई नेताओं ने जताई चिंता
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
अम्बिकापुर, 14 जून। सरगुजा जिले के उदयपुर के रामगढ़ में 'रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति' द्वारा एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में राज्य में नए कोल, बॉक्साइट और लौह अयस्क खदानों को दी जा रही मंजूरियों तथा पर्यावरण संरक्षण पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री टी. एस. सिंहदेव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तेज हो गया है और कई नई खदानें खोलने की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की मांग पर उदयपुर और हसदेव क्षेत्र में केवल एक कोल खदान को अनुमति दी गई थी, लेकिन अब केंद्र और राज्य की वर्तमान सरकार द्वारा कई नई खदानें चिन्हांकित की गई हैं। केते एक्सटेंशन को मंजूरी मिलने से रामगढ़ के अस्तित्व पर संकट आ गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां कॉर्पोरेट घरानों के पक्ष में हैं और ऐतिहासिक रामगढ़ क्षेत्र में दरारें आने की बात खुद सरकार भी मानती है, जिसके बचाव के बोर्ड भी वहां लगे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के लोगों से एकजुट होकर इस नीति के खिलाफ संघर्ष करने का आह्वान किया।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से जब भी आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर संकट आया है, तब वीर नारायण सिंह और वीर गुंडाधूर जैसे नेताओं ने संघर्ष किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार आदिवासियों के हितों की अनदेखी कर रही है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों पर कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक लोकतांत्रिक और गांधीवादी तरीके से एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी।
राष्ट्रीय प्रभारी, यूथ कांग्रेस मनीष शर्मा ने वर्तमान व्यवस्था की तुलना 'कंपनी राज' से करते हुए कहा कि देश के संसाधनों पर जनता का अधिकार है। उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी समाज के साहस की सराहना करते हुए कहा कि इनकी एकजुटता जनविरोधी नीतियों को बदलने की ताकत रखती है।
सर्व आदिवासी समाज के विनोद नागवंशी ने कहा कि स्थानीय लोग खनिज समृद्ध धरती पर रहकर भी रोजगार से वंचित हैं और आवाज उठाने पर उन पर वैधानिक कार्रवाई की जाती है। यह समस्या पूरे छत्तीसगढ़ की है।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा मजदूर सामाजिक कार्यकर्ता रमाकांत ने कहा कि किसान और मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यदि हसदेव के जंगलों की कटाई जारी रही, तो कोरबा और बिलासपुर तक जल संकट गहरा सकता है।
हसदेव बचाव मंच के आलोक शुक्ला ने तकनीकी आंकड़े साझा करते हुए कहा कि केते एक्सटेंशन के कारण लगभग 5,000 एकड़ क्षेत्र में 7 लाख पेड़ प्रभावित होंगे। इसके अलावा भकूरमा और तारा कोल क्षेत्र में भी करीब 20,000 एकड़ में पेड़ों की कटाई संभावित है, जिससे जल स्रोत प्रभावित होंगे। उन्होंने इसे सरकार और संबंधित कंपनी की योजना बताया।
कार्यक्रम में उदयपुर ब्लॉक के विभिन्न गांवों से आए ग्रामीणों ने क्षेत्र में हो रहे हवाई सर्वे को लेकर चिंता व्यक्त की। ग्रामीणों को आशंका है कि जिन क्षेत्रों में यह सर्वे हो रहा है, वहां भविष्य में नई खदानें खोली जा सकती हैं।
इस परिचर्चा में रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति के सिद्धार्थ सिंहदेव, राजनाथ सिंह, ओम प्रकाश सिंह सहित अनिल अग्रवाल (रायगढ़), सुनीता पोर्ते (हरिहरपुर), गंगा राम पैंकरा, ए. आर. कोरार्म और सुदेश टिकम सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न संभागों, उदयपुर, लखनपुर, अम्बिकापुर, सीतापुर, सूरजपुर सहित कई क्षेत्रों से बड़ी संख्या में नागरिक सम्मिलित हुए।


