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सुप्रीम कोर्ट ने कल एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए देश के तमाम हाईकोर्ट को मामले समय पर निपटाने के लिए कहा है। उसने कहा है कि जिन मामलों की सुनवाई पूरी करके हाईकोर्ट जज फैसला सुरक्षित रख लेते हैं, उन पर अधिकतम तीन महीने के अंदर फैसला सुनाना जरूरी होगा। ऐसा न होने पर संबंधित पक्ष चार महीना हो जाने पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि तीन महीने में अगर फैसले नहीं आते हैं, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार मामले को खुद होकर मुख्य न्यायाधीश के सामने रखें, और मुख्य न्यायाधीश दो हफ्ते का समय दे सकते हैं, लेकिन तब भी अगर फैसला नहीं सुनाया जाएगा, तो मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जा सकेगा। जमानतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाएं, अगर किसी वजह से फैसला सुरक्षित रखना पड़े, तो अगले दिन वह फैसला सुना दिया जाए, और वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अर्जी मंजूर होने पर आदेश उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजा जाए, ताकि कैदी की रिहाई में देर न हो। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की वजहें ढूंढने पर यह पता लगा कि कुछ हाईकोर्ट में जज साल-साल भर तक फैसले सुरक्षित रखते आए हैं, और उन पर फैसला घोषित नहीं करते। कुछ मामले तो ऐसे भी हुए हैं जिनमें दो-तीन साल तक फैसले नहीं लिखे गए।
मुख्य न्यायाधीश एवं एक अन्य जज की बेंच का दिया गया यह आदेश पूरे देश के हाईकोर्ट के लिए अनिवार्य रूप से मानने का है। संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मिले अधिकारों के तहत यह समय सीमा तय की गई है। लेकिन हम ऐसे बहुत सारे मामलों को न जानते हुए भी इस बात पर कुछ हैरान हो रहे हैं कि सुनवाई पूरी हो जाने के बाद किसी मामले पर फैसला लिखने में साल भर का वक्त क्यों लगना चाहिए? अदालत के लिखित रिकॉर्ड के साथ-साथ अदालत में जो बातें बहस के दौरान जज सुनते हैं, वे बातें भी साल भर में किसी की भी याददाश्त से धुंधली हो जाना तय है। जब महीनों के बाद कोई जज अदालती रिकॉर्ड देखकर सुबूत, गवाही, और वकीलों के तर्क को पढक़र फैसला लिखते होंगे, तो वे एआई की मदद से तो ऐसा करते नहीं हैं, और इंसानी याददाश्त की एक सीमा रहती है। रिकॉर्ड पर लिखी गई बातों से परे भी कई बातें जजों के दिमाग पर दर्ज रहती हैं, और वे तो धुंधली होते चले जाना तय रहता है। फिर किसी फैसले से जिसका भी नफा होना हो, या जिसे भी नुकसान होना हो, उन पर भी महीनों, और बरस-दर-बरस की देरी से नुकसान या नफा होता है, जो कि पूरी तरह नाजायज रहता है। आज जब हम देश भर में कई मुजरिमों को बार-बार जुर्म करते देखते हैं, तो भी हमें लगता है कि इनके पुराने जुर्मों के पुलिस रिकॉर्ड के बाद भी इन्हें बाद में इतने जुर्म और करने की छूट कैसे मिल जाती है?
कल के ही सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश को देखें, तो इसमें एक तरफ तो शिकायतकर्ता की शिकायत पर समय पर फैसला देना जरूरी किया गया है, और इसके लिए किसी हड़बड़ी या गलती का दबाव भी नहीं डाला गया है। जब सुनवाई पूरी हो जाती है, उसका मतलब यही रहता है कि अब जज को न आगे कोई सुबूत देखना है, न गवाहों को सुनना है, और न ही किसी वकील के तर्क सुनने हैं। इसलिए उसके बाद अगर फैसला लिखने के लिए तीन महीने का वक्त तय किया गया है, तो यह इसलिए भी जरूरी है कि जिसके खिलाफ मामला है, वह अगर मुजरिम है, तो वह जेल जाए, कैद काटे, और अगर मुजरिम नहीं है, तो वह छूट जाए, उसके खिलाफ केस खत्म हो जाए। कल के ही इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से जमानत की सुनवाई और उस पर फैसले को भी उसी दिन तय करने की शर्त लगाई है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ताकतवर विचाराधीन कैदी तो अपने लिए बहुत महंगे वकील लाकर अदालत पर एक किस्म का अघोषित दबाव बनवा लेते हैं, दूसरी तरफ गरीबों की जमानत अर्जी पर सुनवाई का कोई ठिकाना नहीं रहता। अब कल के आदेश से आम जनता के लिए एक तो यह अच्छी बात हो रही है कि जुर्म के मामलों में फैसले में अंधाधुंध देरी के बजाय तीन महीनों में फैसला आ जाएगा, और जुर्म साबित होने पर अभियुक्त को सजा हो जाएगी, समाज कुछ समय के लिए ऐसे मुजरिम से मुक्त हो जाएगा। दूसरी तरफ समाज में एक परेशानी बढऩे भी जा रही है कि अगर किसी अभियुक्त को जमानत, अर्जी के दिन ही मिल जाती है, तो फिर ऐसे लोग बाहर आकर दुबारा उसी तरह के जुर्म कर सकते हैं। समाज के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वजह से जमानत अर्जी पर जल्द आदेश एक परेशानी और खतरा भी लेकर आ सकते हैं, लेकिन यह परेशानी अदालत की फिक्र की नहीं रहती, या कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार सरकार की जिम्मेदारी रहती है।
देश में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में मामलों का बोझ तो कम है, निचली अदालतों में यह बोझ और अधिक ज्यादा है। हाईकोर्ट तक पहुंचने के पहले हर मामले में निचली अदालत में सुनवाई, आदेश, फैसला, इनमें से कुछ न कुछ हो चुका रहता है। जिला अदालतों के ऐसे बोझ को भी कम करने के बारे में कुछ सोचना चाहिए। आज ही हमने गांधी पर एक लेख देखा है कि किस तरह वे अदालत में जिरह करने के मामले में तो कमजोर वकील थे, लेकिन मध्यस्थता से मामलों को निपटाने के मामले में वे बड़़े कामयाब रहे, दक्षिण अफ्रीका में भी उन्होंने कई लोगों के बीच चल रही मुकदमेबाजी को आपस में बैठाकर सुलझाया। आज यह बात कम दिखाई पड़ती है। लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था से परे अगर हम अमरीकी न्याय व्यवस्था देखें, तो उसमें अदालत के बाहर मामलों के निपटाए जाने की परंपरा और व्यवस्था बड़ी मजबूत है। वहां पर तो सरकार के किसी के खिलाफ चलाए जा रहे मुकदमों में भी आरोपी के, और सरकारी वकील के बीच सजा या जुर्माने को लेकर खुले मोलभाव की व्यवस्था है, और बहुत से मामलों में संभावित सजा घटाने की शर्त पर आरोपी अपना जुर्म मान भी लेते हैं। सरकारी वकील कम सजा दिलवाने पर तैयार भी हो जाते हैं, और अदालतों पर से बहुत से मामलों का बोझ घटता है। हमारा मानना है कि जुर्म मानकर रियायत पाने की व्यवस्था को भारतीय कानून में किस तरह जोड़ा जा सकता है, इस पर विचार करना चाहिए। एक दूसरा मामला अभी खाड़ी के एक देश से सामने आया है, वहां एक भारतीय को मौत की सजा हुई थी, लेकिन वहां के कानून के मुताबिक दसियों करोड़ रूपए का जुर्माना देने पर सजा से माफी का भी इंतजाम है, और यह पैसा जुर्म के शिकार परिवार को जाता है, ब्लडमनी कहलाता है। अभी-अभी सोशल मीडिया पर एक अपील के माध्यम से भारत के एक ड्राइवर को रियाद से बरी करवाया गया है, जिसे 2011 में मौत की सजा सुनाई गई थी, और बाद में मृतक के परिवार ने 34 करोड़ रूपए के बराबर रकम लेकर इस आरोपी को माफी देने का समझौता किया था। अभी यह ड्राइवर लौटकर हिन्दुस्तान आया है।
हमें यह भी लगता है कि भारत में अगर किसी के जुर्म के शिकार बहुत गरीब परिवार रहते हैं, तो क्या उसे आर्थिक हर्जाना दिलवाने के एवज में आरोपी-मुजरिम की सजा में कुछ कटौती करवाई जा सकती है? इससे आज के लिखित कानूनों से परे भी एक किस्म का सामाजिक न्याय हो सकेगा। आज भारतीय न्याय व्यवस्था ने सजा-माफी, या सजा-कटौती को खरीदने का कोई इंतजाम नहीं है। लेकिन अगर इससे किसी गरीब परिवार का भला होता है, तो इस बारे में भी सोचना चाहिए। अदालत के बाहर कानूनी मोलभाव से अगर कुछ मामले घट सकते हैं, कुछ मामले हर्जाना चुकाकर निपट सकते हैं, तो ऐसी नई संभावनाओं के नफे-नुकसान पर भी विचार करना चाहिए।


