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-दिलनवाज़ पाशा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली में शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने शिक्षकों को बेसहारा पशुओं के लिए भूसा दान करने का आदेश जारी कर दिया.
विवाद के बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया है और आदेश जारी करने वाले अधिकारी पर जांच बिठा दी गई है.
बरेली की बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. नमिता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "ये आदेश नासमझी में जारी किया गया है और संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है."
बीएसए के मुताबिक़, ये आदेश क्यों जारी किया गया ये पता करने के लिए विभागीय जांच भी की जाएगी.
बरेली के नवाबगंज ब्लॉक के खंड शिक्षा अधिकारी ने 22 मई को एक नोटिस जारी कर सभी स्कूलों को प्रति स्कूल 46 किलो भूसा दान करने का आदेश दिया था.
इस आदेश में कहा गया था, "इस कार्य को एक सप्ताह के भीतर पूरा किया जाना है, शिथिलता करने वालों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी."
विद्यालयों को जारी किए गए इस आदेश में कहा गया था, "आप सभी को निर्देशित किया जाता है कि 46 किलोग्राम भूसा प्रति विद्यालय भूसा का दान खंड विकास अधिकारी नवाबगंज या पशुचिकित्साधिकारी नवाबगंज के कार्यालय में देना सुनिश्चित करें और दान की रसीद प्राप्त करें."
ये नोटिस सामने आने के बाद से ही इसे लेकर विवाद हो रहा था. शिक्षक संघ ने भी इसका विरोध किया था और स्थानीय शिक्षक असमंजस में थे.
विवाद बढ़ने के बाद पहले आदेश को वापस ले लिया गया और संशोधित आदेश जारी करते हुए कहा गया, "अवगत कराया जाना है कि निराश्रित/बेसहारा गौवंश के भरण पोषण हेतु भूसा दान स्वैच्छिक है, इसमें किसी प्रकार का जोर दबाव नहीं है."
ये आदेश सार्वजनिक होने के बाद कई शिक्षकों ने नाराज़गी ज़ाहिर की है. यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन बरेली के ज़िलाध्यक्ष भानु प्रताप सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "भूसा एकत्रित करने का आदेश अव्यवहारिक और शिक्षक की गरिमा के ख़िलाफ़ है."
उन्होंने कहा, "शिक्षक पहले से ही जनगणना के काम में लगे हुए हैं, अब शिक्षक हित की गरिमा के विपरीत ये आदेश निकाल दिया गया है. हम इसका विरोध करेंगे और ज़रूरत पड़ी तो धरना भी देंगे."
भानु प्रताप का तर्क है कि शिक्षकों को ऐसे काम करने के लिए कहा जा रहा है जो एक शिक्षक की गरिमा के ख़िलाफ़ है.
उन्होंने कहा, "आज हमसे भूसा इकट्ठा करने के लिए कहा जा रहा है, कल कहेंगे कि गोबर इकट्ठा करो. अगर भूसा इकट्ठा करवाना ही है तो आप ग्राम प्रधान से या पशुपालन विभाग को आदेश दें, शिक्षक को ही यह आदेश क्यों दिया गया है."
बरेली के ही एक और शिक्षक वीरेंद्र कुमार ने इस आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा, "तपती गरमी में हम जनगणना कर रहे हैं, अब हमें भूसा इकट्ठा करने का आदेश दिया गया है, यह अव्यवहारिक है और शिक्षकों की नियमावली के ख़िलाफ़ हैं. हमारी ड्यूटी चुनाव कार्य, आपदा प्रबंधन या जनगणना में लगाई जा सकती है, ऐसे कार्यों में नहीं लगाई जा सकती."
वीरेंद्र कहते हैं, "शिक्षकों को मज़ाक का विषय बनाकर रख दिया गया है, अगर शिक्षक हाथ में झोला लेकर भूसा इकट्ठा करेगा तो उसकी क्या गरिमा रह जाएगी?"
वहीं टीचर्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मेघराज भाटी ने बीबीसी न्यूज़ हंदी से बात करते हुए कहा, "ऐसे आदेश निकालना शिक्षक पद की गरिमा के ख़िलाफ़ है, फिलहाल ये आदेश संशोधित कर दिया गया है. शिक्षक नियमावली के तहत कहीं ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके तहत अध्यापकों से भूसा इकट्ठा करने के लिए कहा जाए."
मेघराज भाटी कहते हैं, "पहले से ही टीचर जनगणना कार्य में व्यवस्त हैं और इसे लेकर काफ़ी दवाब में हैं. इस तरह के आदेश शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्य के दवाब को और अधिक बढ़ाते हैं."
प्रशासन का क्या कहना है?
हालांकि बरेली ज़िला प्रशासन ने ख़ुद को इस आदेश से अलग कर लिया है.
स्थानीय पत्रकारों ने जब बरेली के ज़िलाधिकारी अविनाश सिंह से इस आदेश के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "यह मेरी जानकारी में नहीं है, हम इसे दिखवा रहे हैं, कार्रवाई की जाएगी."
वहीं बरेली की बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. नमिता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "ऐसा कोई आदेश नहीं है, किसी शिक्षक को भूसा एकत्रित करने के लिए नहीं कहा है. ऐसा कोई आदेश शिक्षा विभाग ने पारित नहीं किया है."
उन्होंने कहा, "बेसहारा और निराश्रित पशुओं के लिए बरेली में एक ज़िला भूसा बैंक बनाया जा रहा है. इसके लिए भूसा एकत्रित करने का कोई आदेश शिक्षकों को जारी नहीं हुआ है."
डॉ. नमिता ने कहा, "ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार करते हुए खंड शिक्षा अधिकारी नवाबगंज ने एक चिट्ठी जारी की थी. इसे लेकर उन्हें नोटिस जारी किया गया है और जवाब मांगा गया है. उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की पत्रावली भी प्रक्रिया में है."
डॉ. नमिता के मुताबिक़, ज़िले में बन रहे भूसा बैंक के लिए आम लोग भूसा दान कर सकते हैं. शिक्षकों को भूसा दान करने या एकत्रित करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है.
विवादित आदेश जारी करने वाली अधिकारी का कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है. बीबीसी ने उनसे संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका.
अवारा पशुओं के लिए क्या कर रही है यूपी सरकार
उत्तर प्रदेश में गोवंश के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार पिछले कई सालों से बड़े पैमाने पर योजनाएं चला रही है.
द सीएसआर जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य सरकार के अनुसार साल 2017 से अब तक प्रदेश में 7,713 गौ-आश्रय स्थल और गोशालाएं स्थापित की गई हैं, जिनमें 16 लाख से अधिक गोवंश को आश्रय दिया जा रहा है.
सरकार का दावा है कि मुख्यमंत्री सहभागिता योजना के तहत 2.37 लाख से अधिक गोवंश, इच्छुक पशुपालकों और किसानों को भी सौंपे गए हैं.
राज्य सरकार के अनुसार गौ-आश्रय स्थलों को पशुओं के भरण-पोषण के लिए प्रतिपशु 1,500 रुपये प्रतिमाह (50 रुपये प्रतिदिन) की सहायता सीधे ट्रांसफ़र के ज़रिये से दी जाती है.
हालांकि, प्रदेश में आवारा पशुओं की वास्तविक संख्या, गौशालाओं की क्षमता और उनके संचालन की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं.
2019 की पशुधन गणना में उत्तर प्रदेश में लगभग 11.84 लाख आवारा/निराश्रित गोवंश दर्ज किए गए थे, जबकि सरकार हाल के वर्षों में 16 लाख से अधिक गोवंश को संरक्षण दिए जाने का दावा कर रही है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के पिछले बजट में गोवंश के रखरखाव के लिए दो हज़ार करोड़ रुपए आवंटित किए थे.
इसके अलावा गोसंरक्षण केंद्रों की स्थापना के लिए 140 करोड़ रुपए की व्यवस्था की थी. साथ ही, पशु चिकित्सालयों/पशु सेवा केन्द्रों को और चाकचौबंद करने के लिए 123 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित की थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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आज़म ख़ान के बेटे अब्दुल्ला को दो पासपोर्ट मामले में मिली राहत, कोर्ट ने सुनाया यह फ़ैसला
गौरव गुलमोहर, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
समाजवादी पार्टी के नेता अब्दुल्ला आज़म को दो पासपोर्ट मामले में बड़ी क़ानूनी राहत मिली है. एमपी-एमएलए सेशन कोर्ट ने निचली अदालत से सुनाई गई सात साल की सज़ा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है.
अब्दुल्ला आज़म समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आज़म ख़ान के बेटे हैं. वह रामपुर की स्वार विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं.
अब्दुल्ला आज़म ने निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सेशन कोर्ट में अपील दायर की थी. इसी अपील पर सुनवाई के बाद अदालत ने शुक्रवार को फ़ैसला सुनाया.
अपीलकर्ता पक्ष के वकील नासिर सुल्तान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "आकाश सक्सेना ने रामपुर के थाना सिविल लाइन में 30 जुलाई 2019 को एक एफ़आईआर दर्ज कराई थी. उसमें आरोप लगाया था कि अब्दुल्ला आज़म खां ने जाली दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग समय पर दो अलग-अलग पासपोर्ट जारी करा लिए और उनका आईडी के रूप में इस्तेमाल भी किया."
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पांच दिसंबर 2025 को मोहम्मद अब्दुल्ला आज़म खां को सात साल की सज़ा सुनाई थी.
उन्होंने बताया, "उस निर्णय के ख़िलाफ़ क्रिमिनल अपील रामपुर के एमपी-एमएलए कोर्ट में दायर की गयी थी, जिसमें आज फ़ैसला आया है. इस फ़ैसले में नीचे की ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया गया है और सज़ा को रद्द कर दिया गया है."
हालांकि इस मामले में राहत मिलने के बावजूद अब्दुल्ला आज़म फ़िलहाल जेल से बाहर नहीं आएंगे. दूसरे मामलों में भी वह सज़ा काट रहे हैं.
फ़ैसला सुनाए जाने के बाद समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं ने अदालत के बाहर जश्न भी मनाया. हालांकि अभियोजन पक्ष के पास इस फ़ैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प मौजूद है.


