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भीषण ताप से झुलस रहे छत्तीसगढ़ को उपहार, हसदेव में 7लाख पेड़ और कटेंगे
28-May-2026 11:03 AM
भीषण ताप से झुलस रहे छत्तीसगढ़ को उपहार, हसदेव में 7लाख पेड़ और कटेंगे

सांसद, पर्यावरण प्रेमी, विशेषज्ञों और प्रभावित आदिवासियों की चेतावनी को दरकिनार कर लिया गया फैसला

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 28 मई। भीषण गर्मी की चपेट में झुलस रहे छत्तीसगढ़ और पूरे देश को केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने हसदेव अरण्य के घने जंगलों में एक नए कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति देकर ‘उपहार’ दे दिया है। केंते एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोल माइनिंग एंड पिट हेड कोल वॉशरी प्रोजेक्ट के लिए 1742.6 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने की सिफारिश को मंजूरी मिल गई है। इसके चलते करीब 7 लाख पेड़ काटे जाएंगे।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, 8 मई 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एडवाइजरी कमिटी की चौथी बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया। मीटिंग मिनट्स और परिवेश पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यूजर एजेंसी हेम राज (राजस्थान राज्या विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड से जुड़ा) के पक्ष में स्टेज-फर्स्ट वन स्वीकृति की सिफारिश की गई है।  

मालूम हो कि हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा-कोरबा-सरायपाली क्षेत्र में फैला करीब 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर का घना जंगल है, जिसे भारत के सबसे बड़े अखंड वनों में से एक माना जाता है। यह हाथियों, तेंदुओं, स्लॉथ बियर और कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है तथा हसदेव नदी का कैचमेंट क्षेत्र है, जो लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई उपलब्ध कराता है।

बता दें कि 2011 में तत्कालीन यूपीए सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एफएसी की नो-गो सिफारिश को दरकिनार कर स्टेज-एक को क्लियरेंस दी थी। यह राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को अलॉट किया गया, जिसका एमडीओ अदानी इंटरप्राइजेज को दिया गया। यूपीए के कार्यकाल में ही 2013 से उत्पादन शुरू हो गया। 2022 में फेज-2 एक्सटेंशन को मंजूरी मिली, जिसमें हजारों पेड़ काटे गए। एनजीटी ने 2014 में इस कटाई पर रोक लगाई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया।

वहीं परसा कोल ब्लॉक में 2019-2022 के बीच स्टेज-1 और स्टेज-2 के लिए फॉरेस्ट क्लियरेंस मिली। ग्राम सभाओं की सहमति विवादित रही है। आरोप है कि उनकी वास्तविक सहमति नहीं थी, जाली दस्तावेजों के जरिये यह हासिल किया गया। कांग्रेस सरकार ने बार-बार मांग के बावजूद जांच नहीं कराई। अब की सरकार में तो वह मुद्दा ही किनारे हो चुका है।

कुल मिलाकर हसदेव में पीईकेबी, परसा और अब केंते एक्सटेंशन के तहत हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र में कटाई का रास्ता साफ हो चुका है। एफएसी ने 2009 में क्षेत्र को नो-गो जोन घोषित किया था, लेकिन राजनीतिक फैसलों ने इसे ओवररूल किया।

दरअसल, 8 मई 2026 की मीटिंग में इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया है। कृष्णा कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित मीटिंग मोड हाइब्रिड था। कमेटी ने ई-फाइल में मिनट्स अप्रूव कर परिवेश पोर्टल के जरिए आगे की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश भीषण गर्मी, जल संकट और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अब कॉर्पोरेट हितों की रक्षा कर रहा है, न कि पर्यावरण की।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए) और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति लंबे समय से इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। सीबीए के संयोजक आलोक शुक्ला, जिन्हें गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार (ग्रीन नोबेल) भी मिल चुका है, ने इन दस्तावेजों को हाल ही में सार्वजनिक किया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला आदिवासी अधिकारों, पेसा एक्ट, फॉरेस्ट राइट 2006 और पर्यावरण संरक्षण का उल्लंघन है। ग्राम सभाओं की सहमति बिना या जाली तरीके से ली गई है। केंते एक्सटेंशन में करीब 7 लाख पेड़ काटने की आशंका है, जो जैव विविधता और आदिवासी जीवन दोनों के लिए घातक साबित होगा।

क्षेत्र की सांसद ज्योत्सना महंत हसदेव की बर्बादी को लेकर मुखर हैं। उन्होंने केंद्र से परसा और हसदेव प्रोजेक्ट्स की अनुमतियां रद्द करने की लगातार मांग की है। स्थानीय प्रभावित आदिवासी परिवारों ने बार-बार प्रदर्शन किए, लंबी पदयात्राएं और अदालतों में याचिकाएं दायर कीं। 2022 में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से हसदेव को माइनिंग-फ्री लेमरू एलीफेंट रिजर्व बनाने का प्रस्ताव पास किया था, लेकिन केंद्र और राज्य स्तर पर फैसले उलटे दिशा में चले गए हैं।


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