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आज की एक खबर है कि सडक़ पर कुत्ते से टकराकर एक बाइक सवार सडक़ पर गिरा, और रात 11 बजे के करीब की इस घटना में किसी ने उसकी मदद नहीं की। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के भीतर यह व्यक्ति बेहोश पड़े रहा, और कोई उसकी बाइक, मोबाइल फोन और 800 रुपए का पर्स लेकर भाग गया। यही समाचार बताता है कि कुछ दिन पहले शहर के एक दूसरे हिस्से में ऐसा ही हुआ था, और कार से टकराकर दुपहिया सवार नौजवान बेहोश हो गया था, और उसकी दुपहिया भी गायब हो गई थी। बीच-बीच में अखबारों में ऐसी सुर्खियां देने का रिवाज है कि इंसानियत अभी जिंदा है। ऐसा उन खबरों के साथ होता है जिनमें किसी के खोए हुए सामान को लोग वापिस पहुंचा देते हैं, या ऐसी ही कोई दूसरी मदद कर देते हैं जो कि आज की इंसानियत के हिसाब से कुछ चौंकाने वाली रहती है। इंसानियत शब्द भी बड़ा अजीब है, हर उस व्यक्ति के लिए यह आसानी से इस्तेमाल हो जाता है जिनके भीतर इसका एक कतरा भी न बचा हो। एक तरफ तो सरकार यह कहती है कि सडक़ हादसे में जख्मी किसी को अस्पताल में पहुंचाने पर उन्हें 25 हजार जैसी कोई रकम ईनाम में मिलती है, यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनसे कोई पूछताछ तक नहीं होगी। अस्पतालों को कहा जाता है कि सडक़ हादसे में जख्मी होकर अगर कोई पहुंचे तो बिना भुगतान की परवाह किए तुरंत उनका इलाज शुरू किया जाए। ऐसे में भी राजधानी के भीतर अगर लोग किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाना तो दूर रहा, उसे लूट लेने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं, तो उन्हें चोर कहना, चोर की बेइज्जती होगी, उन्हें मामूली लुटेरा कहना, लुटेरों की बेइज्जती होगी, यह एकदम खास दर्जे के जल्लाद किस्म के मुजरिम हैं जिनके लिए सजा में एकदम अलग इंतजाम होना चाहिए। वैसे हिंदुस्तान में इसकी लंबी परंपरा है, और हमारी गौरवशाली संस्कृति ऐसी घटनाओं से भरी-पूरी है। देश में कई ऐसी बड़ी ट्रेन दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें आसपास के गांवों के पहुंचे हुए लोग घायलों को डिब्बों से निकालने के बजाय उनके कहने और उनकी घडिय़ां उतार रहे थे, उनके सामान लूट रहे थे। जिस वक्त इस गौरवशाली देश की संस्कृति को लोगों को यह सुझाना था कि वे घायलों को बचाते, डिब्बों में फंसे हुए लोगों को निकालते, वे गहने नोच रहे थे। अभी हाल के महीनों में ही छत्तीसगढ़ में एक से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें मुर्गियां ले जाते हुए कोई गाड़ी पलट गई, और उसके जख्मी ड्राइवर-कंडक्टर उसमें फंसे रहे, और लोग गाड़ी के ऊपर चढक़र मुर्गियां लूटकर भागते रहे, और गांव-कस्बे में दावत हो गई। किसी भी सामान से भरी हुई गाड़ी हिंदुस्तान की सडक़ों पर पलटे, तो लोग ड्राइवर कंडक्टर को बचाने से अधिक सामान लूटने में जुट जाते हैं। यही गौरवशाली संस्कृति पिछले हफ्तेभर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सडक़ों पर देखने मिली, जब घायल पड़े रहे, बेहोश रहे, और राह चलते लोग उनकी गाड़ी ले भागे, मोबाइल और बटुआ भी ले गए। हमारा अनुभव यह कहता है कि ऐसा लूटकर भागने वाले लोग जरूरी नहीं है कि पेशेवर लुटेरे रहे हों, ऐसे लोग घरेलू और आम लोग भी हो सकते हैं जो कि मौका मिलने पर कुछ देर के लिए फायदा पाने के लिए लुटेरे बन गए हों।
इस देश में लोग बड़ी-बड़ी बीमारियों की नकली दवाइयां बनाने के बहुत ही संगठित कारोबार को चलाते हैं, कोरोना के दौरान उसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन थोक में नकली बनाए गए और लाख-लाख रुपए में बेचे गए, दूसरी तरफ अभी और खबरें आईं हैं कि किस तरह कैंसर की दवाई नकली बनाकर बाजार में सप्लाई की जा रही है।
हर देश और समाज को अपनी संस्कृति पर गर्व करने का पूरा अधिकार रहता है। जिस देश की संस्कृति में छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार तक समाज का मुख्य पार्टटाइम शगल बना हुआ है, उसे भी हक रहता है कि अपनी नामौजूद संस्कृति की कल्पना करके उस पर गर्व कर सके। आज वही हो रहा है। आज की जमीनी हकीकत पर चर्चा करने के बजाय लोग पौराणिक कथाओं को चर्चा, और उसके मार्फत गर्व करने का सामान बनाकर चल रहे हैं। आज देश की संस्कृति क्या हो गई है, उस पर चर्चा तकलीफदेह रहती है, उस पर कई कड़वी और अप्रिय बातों पर चर्चा करने की मजबूरी आ जाती है। ऐसे में लोग इतिहास और पुराण के ऐसे पन्ने निकालकर लाते हैं जिनमें मनपसंद, कर्णप्रिय, और मधुर लगने वाली कहानियां रहती हैं, और वे कहानियां बहुत सारा गर्व भी जुटा देती हैं, क्योंकि वे उसी हिसाब से ढाली गई रहती है। आज कबीर को पढक़र इस देश की संस्कृति पर गर्व करना मुमकिन नहीं हो सकता, इसलिए उतना कड़वा और खरा सच बोलने वाला किनारे कर दिया गया है। आज संस्कृति के सुहाने पन्ने, जो कि सुनहरे हर्फों में लिखे जा सकते हैं, उन्हीं का चलन चल रहा है।
जब देश की सरकार घायलों की मदद के लिए बहुत ही असरदार और मददगार कानून बना चुकी है, उस वक्त भी यह आम हिंदुस्तानी संस्कृति है कि घायलों को अनदेखा करके सडक़ पर आगे बढ़ लिया जाए। ये लोग इससे भी सौ कदम आगे के हैं कि घायल का बचना तो तय है नहीं, उसके बिना उसके सामान और उसके पैसे अनाथ न हो जाएं, इसलिए उनको उठाकर ले जाया जाए। ऐसी सोच और ऐसी घटनाओं को लेकर समाज में चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इससे बड़ी शर्मिंदगी सामने आएगी। लोगों को यह मानना पड़ेगा कि उनके बीच परले दर्जे के नीच और कमीने लोग भी हैं। ऐसे वर्तमान को कालिख से लिखने के बजाय काल्पनिक इतिहास को सुनहरे अक्षरों में लिखना लोगों को अधिक माकूल बैठता है। यह नौबत इस देश को सुधरने, और बेहतर काम करने का मौका ही नहीं देगी। लोग अपने-आपमें इतने मशगूल हैं कि उन्हें सच की जरूरत नहीं रह गई है। जब इस तरह की कोई घटिया हरकत होती है, तो क्या भारत के या छत्तीसगढ़ के समाज में सार्वजनिक रूप से इस नौबत पर कोई चर्चा होती है कि ये कहां आ गए हम?


