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हिन्दुस्तान बड़ा ही अजीब देश है। यहां के लोग अलग-अलग कई सदियों में जीते हैं। कुछ लोग तो हजारों बरस पहले की गुफाओं में जीने वालों सरीखे हैं, कुछ लोग आज की पीढ़ी के बेधडक़ और बेझिझक लोग हैं जिनकी लिव-इन-रिलेशनशिप सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों से आसान हो गई है, हालांकि उत्तराखंड जैसी सरकार ने उसे मुश्किल और नामुमकिन बनाने के कानून बना दिए हैं। अभी-अभी कल-परसों ही उत्तर भारत के किसी एक राज्य में गर्भवती महिला की सोनोग्राफी करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताने वाला डॉक्टर गिरफ्तार हुआ है, और इसी देश के बहुत से बच्चे अंतरिक्ष में जाने का भी सपना देखते हैं। एक तरफ तो केन्द्र सरकार अलग-अलग जातियों के बीच विवाह होने पर दलित और आदिवासी से शादी करने वाले गैरदलित या आदिवासी को एक ठीक-ठाक रकम प्रोत्साहन के रूप में देती है, और हर साल हिन्दुस्तान में दूसरी जाति या धर्म में शादी करने वाले लोगों को उनके परिवार के लोग ही मार डालते हैं। खानदानी इज्जत के लिए की जाने वाली ऐसी हत्याओं को समाज ऑनर-किलिंग कहता है।
ऐसी एक घटना अभी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले से आई है जो दिल दहला देती है। वहां पर एक मुस्लिम ऑटोरिक्शा चालक ने अपनी बहन और बहनोई के साथ मिलकर अपनी नाबालिग बेटी का गला काटकर उसका कत्ल कर दिया, और पहचान छिपाने के लिए लाश के 6 टुकड़े करके अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बताया कि यह आदमी 15 बरस की अपनी बेटी के किसी दूसरे समुदाय के युवक से बात करने से खफा था। उसे डर था कि यह लडक़ी भी अपनी दो बड़ी बहनों की तरह दूसरे समुदाय के युवकों से शादी कर लेगी। इस आशंका में इस पिता ने पत्नी और बेटे को घर के बाहर भेजा, बहन-बहनोई के साथ मिलकर बेटी को इतने वीभत्स तरीके से मारा, और बदन के हिस्से अलग-अलग जगहों पर ठिकाने लगा दिए।
एक तरफ तो देश के बड़े-बड़े हिन्दू नेताओं की लड़कियों की शादी मुस्लिमों से हो जाती है, और कोई हल्ला नहीं होता। बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी, करोड़पति-अरबपति कारोबारी किस जात-धरम में शादी करते हैं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे राजाओं के पुराने दिन याद पड़ते हैं कि राजा जो करते हैं, वही सामाजिक नियम रहते हैं, वे किसी भी तरह के नियमों से ऊपर रहते हैं। आज के राजा बड़े-बड़े नेता, कारोबारी, या शोहरत हासिल कामयाब लोग हैं, और उनके किसी जात-धरम में शादी पर कोई विरोध नहीं होता। समाज के आम लोगों में से कोई ऐसा करें, तो उनके खिलाफ समाज के लोग झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं। दूसरे धरम की शादी तो दूर की बात रही, हिन्दू धर्म के भीतर ही, ओबीसी के भीतर ही, एक जाति से किसी ने दूसरी जाति में शादी कर ली, तो इस पर भी जातबाहर कर दिया जाता है, और ऐसे कई मामले छत्तीसगढ़ में ही अदालतों में चल रहे हैं। इन मामलों की बहुतायत जिस जाति में है, उस जाति के लोग बड़ी संख्या में हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बन रहे हैं, और ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे अपने ही लोगों को अंतरजातीय विवाह पर जातबाहर करके दूसरे धर्म की तरफ नहीं धकेल रहे हैं?
अब उत्तरप्रदेश के इस मुस्लिम पिता ने अपनी ही बच्ची का कत्ल कैसे किया होगा, यह हमारे सरीखे साधारण इंसान के लिए समझना भी मुश्किल है। यही देश एक औलाद के लिए हर किस्म के डॉक्टर के पास, मंदिर-मस्जिद, और दरगाह तक जाते हुए लोगों को देखते रहता है। सरकार के सामने बच्चों की चाह रखने वाले लोग कमेटियों में अर्जी लगाए हुए बरसों तक इंतजार करते हैं कि उन्हें कोई बच्चे मिल जाएं। संपन्न लोग आज के आईवीएफ सेंटरों से लेकर दूसरे कई किस्म के अस्पतालों तक लाखों रूपए खर्च करते हैं, और सरोगेसी के लिए दसियों लाख रूपए भी लगा देते हैं। ऐसे में अपनी ही औलाद के टुकड़े-टुकड़े कर देना, इतनी ताकत कोई धर्म ही दे सकता है, या किसी जाति का कोई पाखंडी अहंकार। शादी पर अपने बच्चों को, या उनके प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना, शादी हो चुकी है तो अपनी औलाद के पति, या उसकी पत्नी को मार डालना एक पारिवारिक अहंकार से बढक़र सामाजिक अहंकार के लिए किया जाने वाला जुर्म है क्योंकि लोगों को लगता है कि परिवार में ऐसा होने के बाद वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे।
भारत में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की वजह से पुरूषवादी सोच इस हद तक हावी है कि परिवार की इज्जत लडक़े से जोडक़र नहीं देखी जाती, लडक़ी से ही जोडक़र देखी जाती है। परिवार के लडक़े दूसरे जात-धरम की लडक़ी को लेकर आएं, तो उस पर कोई कत्ल नहीं होते, लडक़ों के परिवार वाले नहीं करते। लेकिन अगर लडक़ी के परिवार का, जात का, धरम का, समाज का अहंकार आहत होता है, तो पूरा का पूरा कुनबा जेल चले जाने की कीमत पर भी मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। ऑनरकिलिंग अगर देखें, तो मानो लड़कियों के परिवार का ही ऑनर अपमानित होता है, और पहले उन्हीं को मारा जाता है, फिर अगर हत्या का विस्तार करना हो तो बेटी के आशिक या उसके पति को भी साथ-साथ निपटा दिया जाता है। यह सोच हिन्दुस्तान के बाहर भी ब्रिटेन तक में कई मामलों में दिखती है, और वहां भी बहुत से हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी माँ-बाप ऐसी ऑनरकिलिंग में गिरफ्तार हुए हैं।
दुनिया 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में दाखिल हो चुकी है, लेकिन सामाजिक नियमों और रीति-रिवाजों का दबदबा इतना है कि जन्म देने वाले माँ-बाप ही अपनी औलादों का कत्ल कर देते हैं। यह सिलसिला कम होते भी नहीं दिखता है, और यह सिलसिला पूरी तरह से साम्प्रदायिक हो ऐसा भी नहीं है। यह सिलसिला माँ-बाप, परिवार, समाज, और जात-धरम के आडंबरी अहंकार से जुड़ा हुआ सिलसिला है। यह सिलसिला संपन्नता से दूर ही चलता है, आमतौर पर मध्यमवर्गीय, या उससे नीचे के आय वर्ग के लोगों को ऐसे अहंकार की फिक्र अधिक रहती है। पटौदी परिवार को देखें, तो लगातार दो पीढिय़ों ने दो चर्चित हिन्दू अभिनेत्रियों से शादी की, और किसी बात का कोई हल्ला नहीं हुआ। संपन्नता आडंबरी अहंकार को हावी नहीं होने देती। आमतौर पर संपन्नता से कुछ दूरी पर रह गए, या बहुत दूर रह गए लोग ही इस किस्म की हिंसा करते हैं। लोग फैशन के लिए, खर्च और शान-शौकत के लिए जिन बड़े लोगों के देखकर उनके नक्शेकदम पर चलना और जीना चाहते हैं, उन लोगों के बीच जात-धरम बेमायने रहने से वे कुछ नहीं सीखते। अगर देश के चर्चित जोड़ों को देखकर नीचे के आम लोग बर्दाश्त करना सीख लेते, तो वह किसी चर्चित के फैशन की नकल करने के मुकाबले बेहतर बात होती।


