ताजा खबर
सेवानिवृत ट्राइवल उपायुक्त को वेतन एरियर्स देने का आदेश
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 19 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि नो वर्क, नो पे का सिद्धांत हर मामले में आंख मूंदकर लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण पदोन्नति से वंचित रखा गया हो। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी.आर. साहू को पदोन्नति से जुड़े वेतन अंतर का 50 प्रतिशत एरियर्स अदा करे।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को वर्षों तक पदोन्नति के लाभ से वंचित रखा गया, जबकि वह वरिष्ठता सूची में ऊपर थे और समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) ने उन्हें पदोन्नति के लिए उपयुक्त भी पाया था।
याचिकाकर्ता जी.आर. साहू अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग में सहायक आयुक्त पद से 31 दिसंबर 2016 को सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने उप आयुक्त पद पर पदोन्नति नहीं दिए जाने को चुनौती दी थी। अदालत में बताया गया कि 13 जुलाई 2011 को उनसे कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया, जबकि वरिष्ठता सूची में साहू उनसे ऊपर थे।
फैसले में उल्लेख किया गया कि साहू लगातार विभाग को आवेदन देकर पदोन्नति पर विचार करने की मांग करते रहे। बाद में वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने उनकी वरिष्ठता 7 सितंबर 2006 से संशोधित करते हुए उन्हें एक पदोन्नत कनिष्ठ अधिकारी से ऊपर रखा। इसके बाद 20 फरवरी 2015 को हुई समीक्षा डीपीसी ने उन्हें पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना और कनिष्ठ अधिकारियों से ऊपर रखने की सिफारिश भी की।
इसके बावजूद विभाग ने सेवा अवधि के दौरान उन्हें पदोन्नति नहीं दी। हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर साहू को अवमानना याचिका तक दायर करनी पड़ी। सेवानिवृत्ति के बाद भी जब राहत नहीं मिली, तब उन्होंने वर्तमान याचिका दाखिल की।
मामले की सुनवाई लंबित रहने के दौरान राज्य सरकार ने 29 नवंबर 2019 को आदेश जारी कर साहू को 13 जुलाई 2011 से काल्पनिक पदोन्नति दे दी। इसके आधार पर उनकी पेंशन, ग्रेच्युटी और वरिष्ठता में संशोधन किया गया, लेकिन वेतन एरियर्स देने से इनकार करते हुए नो वर्क, नो पे सिद्धांत लागू कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता हमेशा उच्च पद पर काम करने के लिए तैयार थे, लेकिन विभागीय त्रुटियों और देरी के कारण उन्हें अवसर ही नहीं दिया गया। अदालत ने टिप्पणी कहा कि प्रतिवादियों की गलती का खामियाजा याचिकाकर्ता को नहीं भुगतना चाहिए।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई कर्मचारी काम करने के लिए तैयार और पात्र हो, लेकिन प्रशासनिक कारणों से उसे कार्य करने से रोका जाए, तो नो वर्क, नो पे सिद्धांत लागू नहीं होगा।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने वास्तविक रूप से उच्च पद पर कार्य नहीं किया था। सार्वजनिक धन पर भार को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया और 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक सहायक आयुक्त और उप आयुक्त के वेतन अंतर का 50 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश दिया।
अदालत ने राज्य सरकार को चार महीने के भीतर राशि की गणना कर भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। तय समयसीमा में भुगतान नहीं होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।


