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आयकर विभाग का मामला
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 19 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आयकर विभाग में वर्षों तक कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर उसी काम को आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए उनसे ही करवाना और समान कार्य करने वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित कर देना पूरी तरह मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की खंडपीठ ने माना कि इस प्रकार की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, इसलिए इसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
मामले में लाटेल प्रसाद यादव, राजबीर दास समेत अन्य कर्मचारियों ने याचिका दायर की थी। ये सभी आयकर विभाग में अलग-अलग समय पर चतुर्थ श्रेणी पदों पर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में नियुक्त हुए थे। उन्होंने 10 से 15 वर्षों से अधिक समय तक विभाग में लगातार सेवाएं दीं। अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि विभागीय अधिकारियों ने कई बार उनके कार्य की सराहना करते हुए नियमितीकरण की सिफारिश भी की थी।
सुनवाई के दौरान बताया गया कि वर्ष 2011-12 में विभाग ने अपनी नीति बदल दी। 4 जुलाई और 25 जुलाई 2011 को जारी आदेशों के जरिए डेटा एंट्री, टाइपिंग, सफाई और सुरक्षा जैसे कार्यों को आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से कराने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 14 मार्च 2012 को आदेश जारी कर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को भी आउटसोर्सिंग व्यवस्था के तहत अनुबंध आधारित प्रणाली में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
इस निर्णय के खिलाफ कर्मचारियों ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, जबलपुर पीठ में चुनौती दी थी, लेकिन कैट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए कैट के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता नियमितीकरण के लाभ पाने के हकदार हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया जा चुका है कि लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले कर्मचारियों को केवल तकनीकी आधार पर नियमितीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक नियमित और स्थायी प्रकृति का कार्य किया है, उनकी नियुक्तियों को केवल प्रक्रियात्मक त्रुटियों के आधार पर अवैध नियुक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि कर्मचारियों ने लगातार सेवा दी और विभाग उनके कार्य से संतुष्ट भी था।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि कैट ने 11 अक्टूबर 2013 को आदेश पारित करते समय उमा देवी मामले के सिद्धांतों को अत्यधिक कठोर और यांत्रिक तरीके से लागू किया, जबकि बाद के न्यायिक फैसलों और मामले की वास्तविक परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि कैट ने कर्मचारियों की लंबी और निर्बाध सेवा, स्थायी प्रकृति के कार्य, विभागीय सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के बाद के महत्वपूर्ण फैसलों की अनदेखी की, जिसके कारण उसका आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।


