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लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग के एक प्रोफेसर पर आरोप है कि बीएससी फाइनल की एक छात्रा को फोन करके वे उसके लिए पेपर आऊट करने की बात कह रहे हैं, और मिलने के लिए बुला रहे हैं। बातचीत से नीयत जाहिर है कि वे छात्रा को डार्लिंग कहकर बुला रहे हैं, कह रहे हैं कि उसके लिए दोनों पेपर आऊट कर दिए हैं, रखे हुए हैं, दे देंगे, इग्जाम के पहले मिलने आ जाओ। प्रोफेसर यह भी कहते सुनाई देता है, मैं तुम पर फिदा हूं, डिच मत करना। छात्रा की शिकायत पर पुलिस ने इस प्रोफेसर को गिरफ्तार किया है, और शिकायत में छात्रा ने कहा कि प्रोफेसर ने पहले भी उससे शारीरिक छेड़छाड़ की थी। टेलीफोन की बातचीत का यह ऑडियो एकदम साफ-साफ चारों तरफ फैला हुआ है, और बताता है कि पेपर आऊट करने का सिलसिला किस तरह चलता है, और उसका लालच देकर एक प्रोफेसर अपनी छात्रा का देह-शोषण करना चाहता है। छत्तीसगढ़ के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में भी एक छात्रा ने एक प्रोफेसर, जो कि विभागाध्यक्ष भी था, उस पर आरोप लगाया था कि वह केबिन में बार-बार बुलाकर उसे बुरी नीयत से छूता था, यौन उत्पीडऩ करता था, मानसिक प्रताडऩा करता था। इस मामले में भी प्रोफेसर के टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, और यह मामला भी अभी अदालत में चल रहा है। जुलाई 2025 से एफआईआर के बाद से डॉ.आशीष सिन्हा फरार है, और सुप्रीम कोर्ट तक से अग्रिम जमानत नहीं हुई, लेकिन पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है। यह चिकित्सा प्राध्यापक छत्तीसगढ़ के सिकल सेल इंस्टीट्यूट का मेडिकल डायरेक्टर भी था, और विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी जुड़ा हुआ था। ऐसे ताकतवर प्रोफेसर के मुकाबले एमबीबीएस दूसरे बरस की एक छात्रा को सुप्रीम कोर्ट के बाद अब यह देखने मिल रहा है कि यह प्रोफेसर शायद देश छोडक़र भाग गया है।
ये दो मामले पकते हुए चावल की हंडी के दो दानों जैसे हैं। स्कूलों से लेकर कॉलेज, यूनिवर्सिटी, और रिसर्च तक यही हाल है। चारों तरफ लड़कियों और महिलाओं के शोषण के लिए मर्द तैयार बैठे हैं। छत्तीसगढ़ की ही कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक, हेडमास्टर, या प्रिंसिपल, सभी ओहदों के मर्द छात्राओं पर डोरे डालने में लगे रहते हैं, कभी-कभी छात्राएं हिम्मत करके बता पाती हैं, कई बार बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद गर्भवती होने पर बात उजागर होती है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की छात्राओं के छात्रावास में कई बार ऐसे बलात्कार होते हैं, और कमजोर ग्रामीण इलाकों से आई हुई गरीब लड़कियां विरोध नहीं कर पातीं। जिन लोगों को यह बात मुश्किल से समझ आती है कि लड़कियां तुरंत रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं करातीं, उन्हें समाज की सोच को भी समझना होगा कि सबसे पहले लोग लडक़ी पर ही तोहमत लगाएंगे कि उसे खेलने जाने की क्या जरूरत थी, एनसीसी की क्या जरूरत थी, वह किसी टीचर के बुलावे पर गई ही क्यों थी? समाज की नकारात्मक सोच के चलते हुए किसी लडक़ी या महिला के लिए किसी मर्द के खिलाफ शिकायत करना बड़ा ही मुश्किल रहता है। सबसे पहले तो पुलिस ही मसीहाई अंदाज में नसीहत देने लगती है कि जो हुआ है उसे भूल जाओ क्योंकि शिकायत करने पर समाज में लडक़ी का जीना ही मुश्किल हो जाएगा, आगे उसकी शादी नहीं हो सकेगी। इसके बाद अदालतों का रूख बड़ा मर्दाना रहता है, वकीलों में भी महिला वकील भी सेक्स-जुर्म की शिकार लड़कियों और महिलाओं में ही खामियां देखने वाली निकल जाती हैं। राजनीतिक दलों के लोग हर सेक्स-अपराध का राजनीतिक-नगदीकरण करने में लग जाते हैं, और उससे भी परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है।
स्कूलों के मामले में हमने देखा है कि जब स्कूली लड़कियों को गुड टच-बैड टच के बारे में समझाया जाता है, तो उसके बाद उनका हौसला बढ़ता है, शिकायत के लिए टेलीफोन नंबर की घोषणा और प्रचार होने के बाद अब कई मामले ऐसे फोन पर की गई शिकायतों से भी सामने आए हैं। आज जब सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग लाखों रूपए रिश्वत देने के लिए तैयार रहते हैं, तब अच्छी खासी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरी को खतरे में डालते हुए भी जो शिक्षक छात्राओं का ऐसा शोषण करते हैं, उनके लिए कुछ अधिक सजा तय होनी चाहिए, और यह इंतजाम भी होना चाहिए कि चूंकि वे खुद तो जेल में रहेंगे, इसलिए उनकी पेंशन का एक हिस्सा लंबे समय तक उनके शोषण के शिकार लडक़ी या महिला को मिले। इससे बलात्कारी, या यौन-शोषक के परिवार को भी परोक्ष रूप से एक जुर्माना लगेगा। चूंकि यह पेंशन परिवार का हक नहीं है, यह सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की नौकरी से जुड़ा हुआ मामला है, और उस नौकरी के दायरे में ही अगर उसने मातहत कर्मचारी या छात्र-छात्रा के साथ ऐसा जुर्म किया है, तो इसकी सजा का एक हिस्सा तनख्वाह या पेंशन से भी जुर्माने की शक्ल में निकलना चाहिए। ऐसे मामलों में सिर्फ कैद काफी नहीं मानी जानी चाहिए, बल्कि जिस नौकरी की वजह से वे ऐसा जुर्म करने की ताकत पा सके हैं, उस नौकरी के वेतन-पेंशन का कुछ हिस्सा भी जुर्माने में जाना चाहिए।
किसी खिलाड़ी, छात्रा, शोधकर्ता के साथ यौन-शोषण का मतलब उस तरह की हजारों दूसरी लड़कियों और महिलाओं को उनकी संभावना से दूर कर देना भी होता है। जो मामले पुलिस तक पहुंचते हैं, उससे भी बहुत से परिवार अपनी लड़कियों या महिलाओं को पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद, शोधकार्य से दूर रखते हैं। ऐसी घटनाओं की वजह से लड़कियों का खुद का भी हौसला पस्त हो जाता है, उनका व्यक्तित्व बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है, और वे यौन-हमलों के जख्मों से बाकी पूरी जिंदगी जूझती रहती हैं। भारत में मातहत का यौन-शोषण कामकाजी महिलाओं से लेकर नीचे छात्राओं तक धड़ल्ले से चलता है। मौजूदा कानून इस पर रोक नहीं लगा पा रहे हैं। हमने पहले भी इस मुद्दे पर लिखते हुए यह सुझाया था कि बलात्कारी की संपत्ति का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार को दे दिया जाना चाहिए। जितना हिस्सा उस बलात्कारी के बच्चों का हो, या उसकी पत्नी का, उतना ही हिस्सा उस संपत्ति में से बलात्कार की शिकार को भी मिल जाना चाहिए। यह एक अलग सामाजिक न्याय होगा। कानून निर्माताओं के सामने इस सोच को बढ़ाना चाहिए, और हो सकता है कि किसी दिन कोई विधानसभा, या कोई संसद ऐसा कानून बनाने को तैयार भी हो जाए।
फिलहाल तो यह है कि शैक्षणिक संस्थाओं, या कामकाज की जगहों पर इस तरह के यौन-शोषण की अदालती सुनवाई तेज रफ्तार से होनी चाहिए क्योंकि आसपास लोगों को सजा होते देखने से दूसरे हमलावर मर्दों का हौसला कुछ पस्त हो सकता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


