ताजा खबर
भारत में खाड़ी की जंग की वजह से पेट्रोलियम की जो कमी आई है, वह पेट्रोल पम्पों पर तो दिख रही है, गैस सिलेंडरों की कमी में भी दिख रही है, लेकिन शहरी लोगों को जो एक बड़ा खतरा अभी समझ नहीं आ रहा है, वह रासायनिक खाद की कमी का है। भारत बड़ी मुश्किल से दशकों की वैज्ञानिक कोशिशों के बाद अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ था, और उसमें रासायनिक खाद का बड़ा योगदान था। हमारी पीढ़ी के लोगों ने बचपन में अमरीका से आए हुए पीएल-480 का गेहूं खाया हुआ है, किस तरह देश दूसरे देशों का मोहताज था। वहां से लेकर हरित क्रांति के दौर में किस तरह भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ, वह पूरी दुनिया के सामने एक बहुत बड़ी मिसाल थी। लेकिन पहले रूस-यूक्रेन जंग की वजह से बाकी दुनिया में रासायनिक खाद, और अनाज, इन दोनों के साथ-साथ गैस जाना भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, और दुनिया के सबसे गरीब और भूखे देशों पर खाद्यान्न संकट का एक खतरा आ गया। अब खाड़ी के देशों से पेट्रोलियम और गैस निकलने में जो भयानक संकट आया है, उससे भारत जैसे देशों में रासायनिक खाद कम हो गई है, खेती के सारे कामकाज के लिए पंप से लेकर ट्रैक्टर तक, और हार्वेस्टर तक जो डीजल लगता था, वह मुश्किल में पड़ गया है। अब इस बार की फसल बेअसर रह पाएगी, इसकी गुंजाइश कम लग रही है। रासायनिक खाद की कमी, और इसकी वजह से अनाज में होने वाली कमी का खतरा आज पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है, और कोई भी दूसरे देश भारत को इस नौबत से उबारने में शायद ही मदद कर पाएं।
इस मुद्दे पर लिखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक ताजा अपील पर गौर करने की जरूरत है जिसमें उन्होंने किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल घटाने, और जैविक या प्राकृतिक खेती करने का सुझाव दिया है। खेती के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज भारतीय खेती बहुत बड़े पैमाने पर यूरिया, डीएपी, और पोटाश जैसी रासायनिक खादों पर टिकी हुई है। क्या ऐसे में भारत आसानी से जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा सकता है? इस बारे में सोचते ही अभी पांच बरस पहले का श्रीलंका का एक प्रयोग याद पड़ता है। वहां उस वक्त के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने अचानक यह घोषणा कर दी थी कि श्रीलंका अब पूरी तरह आर्गेनिक खेती वाला देश बनेगा। उन्होंने लगभग रातोंरात रासायनिक खाद और कीटनाशकों के आयात पर रोक लगा दी थी। सरकार का यह मानना था कि रसायनों के इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पर्यावरण और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। लेकिन दशकों से चले आ रहे रासायनिक खाद के इस्तेमाल को छोडक़र जैविक खाद और खेती के लिए किसान तैयार नहीं थे, उन्हें न ट्रेनिंग मिली थी, न वैकल्पिक खाद उपलब्ध थी, और खेतों की मिट्टी की संरचना ऐसी हो गई थी कि वह रासायनिक खाद की प्यासी थी। कुल मिलाकर नतीजा इतना भयानक निकला कि कई फसलों की पैदावार आधी रह गई, चावल उत्पादन पूरी तरह प्रभावित हुआ, और खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर देश को चावल आयात करना पड़ा, चाय का उत्पादन गिर गया, और वही चाय श्रीलंका की विदेशी मुद्रा का बड़ा जरिया थी। सरकार का खड़ा किया हुआ खाद संकट खाद्यान्न संकट में बदल गया, महंगाई बढ़ी, आर्थिक संकट एक राजनीतिक विस्फोट की हद तक पहुंच गया। बाद में श्रीलंका सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा, कुछ महीनों में ही रासायनिक खाद की अनुमति फिर देनी पड़ी, लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका था। अभी एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि चार साल बाद भी श्रीलंका के किसान उस एक प्रयोग के आर्थिक और कृषि नुकसानों से उबर नहीं पाए हैं। दिक्कत रासायनिक से जैविक खेती की तरफ जाना नहीं था, बिना किसी तैयारी या प्रशिक्षण के जिस तरह अचानक जैविक खाद इस्तेमाल करवाया गया, उसके लिए न मिट्टी तैयार थी, न किसान।
भारत में अभी नौबत उस तरह की नहीं है, अभी कुछ हद तक तो रासायनिक खाद उपलब्ध है, और कुछ हद तक जैविक खाद भी बनाई जा सकती है। लेकिन ये सब अभी सामने खड़े फसल के मौसम तक होने वाले काम नहीं हैं। आज भी अगर ईरान वाली जंग खत्म हो जाए, तो भी इस अगली फसल के लिए पूरी खाद जुट पाना मुमकिन नहीं दिखता है। भारत की खेती के तथ्य बताते हैं कि यह देश दुनिया में यूरिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत रासायनिक खादों के लिए पश्चिम एशिया और खाड़ी के कई देशों पर निर्भर करता है, और वहां से गैस आना मुश्किल है, गैस आई भी तो भी बहुत महंगी होगी, और उससे बनने वाला रासायनिक खाद आम किसानों की पहुंच के बाहर हो सकता है। यह नौबत बड़ी आसान नहीं है, क्योंकि किसानों के खेत रासायनिक खाद के प्यासे हो चुके हैं, और अगर पर्याप्त यूरिया और डीएपी नहीं मिले, तो कई फसलों का उत्पादन दस-पन्द्रह फीसदी तक गिर सकता है, कुछ इलाकों में इससे भी अधिक।
खाद की जरूरत एकदम सामने खड़ी है, और उधर अमरीका और ईरान एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। फसल को इंतजार करने के लिए नहीं कहा जा सकता, वह तो मौसम के मुताबिक अपने वक्त पर ही उग पाएगी, या फिर मौसम बर्बाद हो जाएगा। अगर ऐसी नौबत आती है, तो अनाज महंगा होगा, और हो सकता है कि भारत को कुछ अनाज दूसरे देशों से मंगाना भी पड़े। भारत में सरकार की पीडीएस दुनिया की सबसे बड़ी अनाज राहत योजना है। तकरीबन तमाम आबादी को केन्द्र और राज्य सरकारों के अनुदान से कुछ रियायती, और कुछ मुफ्त अनाज मिलता है। रासायनिक खाद की कमी के अलावा भी जलवायु परिवर्तन की मार खेती पर बहुत बुरी पड़ी हुई है। डीजल की कमी से खेती के बहुत सारे काम प्रभावित होंगे, जिनमें मशीनों से लेकर पंप, और फसल को मंडी तक ले जाने वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली तक पर असर पड़ेगा। यह नौबत आज की तारीख में अगर देखें, तो सरकार के लिए बड़ी मुश्किल की है, लेकिन किसान के नजरिए से देखें, तो वे तो एक बिल्कुल ही नए तनाव और खतरे में पड़े हुए दिखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की जैविक खेती की सलाह एक बहुत लंबी तैयारी से ही हो सकती है। उसे फसल के किसी एक मौसम में नहीं किया जा सकता। आने वाले वक्त में देश और प्रदेशों की सरकारें इस बारे में क्या करेंगी, उस पर ही किसानों की जिंदगी टिकी हुई रहेगी। यह देश के किसानों के लिए जितने खतरे की नौबत है, उतने ही खतरे की नौबत उन गरीबों के लिए भी है जिन्हें सरकार रियायती अनाज देती है। ट्रम्प ने दुनिया पर जो नाजायज जंग थोपी है, उसके शिकार सिर्फ अमरीकी नहीं हो रहे हैं, भारत जैसे देश के गांव-गांव में बसे हुए गरीब भी हो रहे हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


