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शादीशुदा होने की जानकारी हो तो रेप और धोखाधड़ी का केस नहीं बनेगा
26-Apr-2026 12:10 PM
शादीशुदा होने की जानकारी हो तो रेप और धोखाधड़ी का केस नहीं बनेगा

महिला की अपील खारिज की हाईकोर्ट ने

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 26 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को पहले से पता हो कि पुरुष विवाहित है, फिर भी वह उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती है, तो बाद में इसे विवाह के झांसे में किया गया संबंध या धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की एकल पीठ ने इस टिप्पणी के साथ निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और महिला द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। इस मामले में महिला ने स्वयं ही कोर्ट में अपनी पैरवी की।

डोंगरगढ़ निवासी महिला ने दावा किया था कि 8 मई 2008 को उसकी शादी महेश गंजीर से हुई थी और 21 जनवरी 2009 को एक विवाह अनुबंध भी किया गया। महिला के अनुसार, दोनों कुछ समय तक साथ रहे और इस दौरान शारीरिक संबंध भी बने।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसने विभिन्न यात्राओं में करीब 85 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन जब उसने आगे पैसे देने से इनकार किया तो आरोपी ने उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद उसने निचली अदालत में धोखाधड़ी और दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला के बयानों में कई विरोधाभास पाए। रिकॉर्ड के अनुसार, महिला की ओर से भेजे गए कानूनी नोटिस और पुलिस शिकायत में विवाह की कोई स्पष्ट तारीख नहीं थी, बल्कि केवल मई से सितंबर 2008 के बीच संबंध बनाने की बात कही गई थी।

एक अन्य नोटिस से यह भी स्पष्ट हुआ कि महिला को पहले से ही आरोपी के विवाहित होने की जानकारी थी, यहां तक कि वह उसकी पहली पत्नी का नाम भी जानती थी।

कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 493 के तहत अपराध का मूल तत्व ‘छल’ है, जिसमें पुरुष महिला को यह विश्वास दिलाता है कि वह उसकी वैध पत्नी है। लेकिन जब दोनों पक्षों को यह पता हो कि वे कानूनी रूप से पति-पत्नी नहीं हैं और पुरुष पहले से विवाहित है, तब धोखे का सवाल ही नहीं उठता। साथ ही कोर्ट ने माना कि ऐसा विवाह अनुबंध हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं 5 और 11 के तहत प्रारंभ से ही शून्य है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई बरी करने की राहत को सही ठहराया और महिला की अपील को खारिज कर दिया।


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