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धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की हाईकोर्ट ने
25-Apr-2026 11:49 AM
धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की हाईकोर्ट ने

कहा—अभी कानून लागू ही नहीं हुआ, ऐसे में संवैधानिक वैधता पर सुनवाई नहीं बनती

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 25 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के बहुचर्चित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि जब तक यह विधेयक कानून के रूप में लागू नहीं हो जाता, तब तक इसकी वैधता पर सवाल उठाना समय से पहले (प्रीमैच्योर) माना जाएगा।

यह याचिका अमरजीत पटेल और क्रिस्टोफर पॉल द्वारा दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि प्रस्तावित कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वातंत्र्य  के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से अवैध धर्मांतरण के मामलों में आजीवन कारावास जैसी सजा को असंवैधानिक बताया था। उनका तर्क था कि कानून में प्रयुक्त परिभाषाएं अस्पष्ट हैं, जिससे मनमाने ढंग से कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र अग्रवाल की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कहा कि यह विधेयक न केवल धार्मिक स्वतंत्रता , बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आजादी पर भी प्रतिबंध लगाता है। उन्होंने इसे मनमाना, अस्पष्ट, अत्यधिक व्यापक और भेदभावपूर्ण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(ए), 21, 25 और 29 के खिलाफ बताया।

राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने याचिका की सुनवाई पर ही सवाल उठाते हुए इसे खारिज करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि अभी तक राज्य सरकार ने इस विधेयक को लागू करने की अधिसूचना जारी नहीं की है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि जब तक विधेयक लागू नहीं होता, तब तक उसकी संवैधानिकता को चुनौती देना उचित नहीं है। इस आधार पर खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।


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