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अब मामलों का निपटारा तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट पर होगा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 24 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रियल एस्टेट से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी, रेरा कोई न्यायिक अदालत नहीं, बल्कि एक विशेष नियामक संस्था है। ऐसे में यहां दायर शिकायतों को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि रेरा कानून में शिकायत दर्ज करने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं है। यह फैसला जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने सुनाया।
जगदलपुर निवासी निधि साव ने दुर्ग जिले के अमलेश्वर स्थित ‘ग्रीन अर्थ सिटी’ प्रोजेक्ट में एक फ्लैट बुक किया था। उनका आरोप था कि बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया और निर्माण की गुणवत्ता भी खराब रही। शुरुआत में उन्होंने स्थानीय प्रशासन से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने रेरा का रुख किया।
रेरा ने अपने आदेश में बिल्डर को दो माह के भीतर निर्माण पूरा कर कब्जा देने का निर्देश दिया, वहीं खरीदार को बकाया राशि जमा करने को कहा। इस आदेश से असंतुष्ट होकर निधि साव ने रेरा अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील दायर की।
अपीलीय न्यायाधिकरण ने मामले की मेरिट पर सुनवाई किए बिना ही यह कहते हुए अपील खारिज कर दी कि शिकायत दाखिल करने में अत्यधिक देरी हुई है। इसके खिलाफ निधि साव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को गलत ठहराते हुए उसे निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रेरा अधिनियम की धारा 31 में शिकायत दर्ज करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है। लिमिटेशन एक्ट सामान्य सिविल अदालतों पर लागू होता है, न कि रेरा जैसे विशेष निकायों पर, जब तक कि कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो।
हाईकोर्ट ने मामले को पुनः ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए निर्देश दिया है कि अब इस प्रकरण की सुनवाई तथ्यों और मेरिट के आधार पर की जाए, न कि तकनीकी आधार पर।


