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'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 18 अप्रैल। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आर्बिट्रेशन के एक मामले में स्पष्ट किया है कि बिना ठोस प्रमाण के लॉस ऑफ प्रॉफिट का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि समझौते में तय शर्तों से बाहर जाकर किसी भी प्रकार का ब्याज प्रदान नहीं किया जा सकता।
भारत संचार निगम लिमिटेड ने मध्यस्थ,आर्बिट्रेटर के फैसले और एकल पीठ द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। बीएसएनएल की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने पक्ष रखा।
कंपनी का तर्क था कि संबंधित ठेकेदार को सबसे कम बोलीदाता एल वन होने के बावजूद वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया गया, क्योंकि उसके खिलाफ सतर्कता जांच लंबित थी। ऐसे में ठेकेदार को लॉस ऑफ प्रॉफिट के नाम पर किसी भी प्रकार की आर्थिक भरपाई का अधिकार नहीं बनता।
बीएसएनएल ने यह भी कहा कि ठेकेदार द्वारा 15 प्रतिशत ब्याज की मांग पूरी तरह अनुचित है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि समझौते में जो शर्तें निर्धारित हैं, उन्हीं के अनुरूप ब्याज दिया जा सकता है, उससे अधिक नहीं।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि सिक्योरिटी डिपॉजिट पर भी ब्याज देने का प्रावधान समझौते में नहीं था, इसलिए उस पर भी ब्याज नहीं दिया जा सकता।
फैसले में कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 29ए में किए गए संशोधन को प्रॉस्पेक्टिव, यानी भविष्य में लागू होने वाला बताया। यानी यह संशोधन पुराने मामलों पर लागू नहीं होगा।


