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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बिना मेडिकल बिल, पेंशन वाले ट्रैफिक उपकरण पुलिस के सबसे असरदार औजार...
सुनील कुमार ने लिखा है
12-Apr-2026 5:24 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बिना मेडिकल बिल, पेंशन वाले ट्रैफिक उपकरण पुलिस के सबसे असरदार औजार...

दुनिया के विकसित देशों, और भारत के महानगरों से दशकों पीछे चलते हुए अब इस देश के छोटे शहरों में सडक़ों पर गाडिय़ों की स्पीड चेक करने, या दूसरे ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों की रिकॉर्डिंग करने की तकनीक का इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है। बहुत देर से शुरू होने के बाद भी अब पुलिस और प्रशासन के हाथ ऐसी तकनीक आसानी से लगी है जिससे वह सडक़ों पर, और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर गाडिय़ों, और गुंडागर्दी पर नजर रख सकती है। अब छोटे-छोटे शहरों में भी इतने कैमरे लग गए हैं, और वे इस तरह के नेटवर्क से जुड़ गए हैं कि पुलिस कंट्रोल रूम में बैठकर यह आसानी से देखा जा सकता है कि कौन किस जगह नियम तोड़ रहे हैं, उनकी तस्वीरें भी रिकॉर्ड की जा सकती हैं, और कंट्रोल रूम में बैठे-बैठे उनका ट्रैफिक चालान उनके नंबरों पर भेजा जा सकता है। अब मामूली से शहरों में भी किसी जगह लगने वाले ट्रैफिक जाम को उपग्रह से भी देखा जा सकता है, और उसे खत्म करवाने के लिए पुलिस की टीम को भेजा जा सकता है।

अब इसे भारत की जमीनी हकीकत के साथ अगर जोडक़र देखें, तो ट्रैफिक पुलिस बहुत बदनाम और भ्रष्ट समझी जाने वाली है। अगर वह ईमानदारी से भी सडक़ों पर चालान करती है, तो भी लोगों को लगता है कि यह वसूली या उगाही के लिए की जा रही कार्रवाई है। दूसरी तरफ जब सडक़ों पर खड़े होकर चालान की जरूरत नहीं रह जाती, जब कंट्रोल रूम में लगी हुई बड़ी-बड़ी स्क्रीन पर देखकर सुबूत सहित चालान करना पल भर का काम रहता है, तो सरकार को ऐसी सस्ती टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इससे एक साथ दो बातें होती हैं, एक तो नियम तोडऩे वाले लोगों पर जब बड़े पैमाने पर तेज रफ्तार से कार्रवाई होती है, तो लोगों में नियमों का डर तेजी से आता है। जब इक्का-दुक्का लोगों पर अपवाद की तरह कार्रवाई होती है, तो लोग बेधडक़ होते जाते हैं। इसलिए पुलिस को हर दिन सीमित चालान का एक कोटा तय करने के बजाय अलग-अलग शिफ्ट में कर्मचारियों को रखकर बड़े पैमाने पर चालान करने चाहिए, ताकि जिन्हें महीने में एक-दो बार जुर्माना भरना पड़ जाए, जिनके ड्राइविंग लाइसेंस सस्पेंड होने का खतरा दिखने लगे, उनके बीच नियमों का सम्मान तेजी से बढ़ेगा।

आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को देखें, तो पुलिस विभाग की मांग से आधे-चौथाई ही ट्रैफिक वाले यहां तैनात हैं। यह मांग उस वक्त से चली आ रही है जब टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बड़ा सीमित था। आज तो स्पीड दर्ज करने वाले रडार वाले कैमरे हैं, सडक़ों पर नियम तोडऩे वाले लोगों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करने वाले कैमरे लगे हैं, और अब ट्रैफिक पुलिस की उतनी जरूरत नहीं है जितनी कि पहले सोची और मांगी गई थी। अब बहुत ही आसान सी टेक्नॉलॉजी इतने सस्ते में हासिल है कि वह सरकार पर पुलिस के पडऩे वाले आर्थिक बोझ के मुकाबले बहुत ही सस्ती भी है, और एयरकंडीशंड कंट्रोल रूम में बैठकर आसानी से वह काम किया जा सकता है, जिसके लिए पुलिस को खराब मौसम में भी सडक़ों पर धूल और धुएं के बीच बदमिजाज लोगों से बदसलूकी झेलते हुए काम करना पड़ता था। अब पूरी दुनिया में टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल इतना आम हो चुका है कि एक पुलिस सिपाही पर सरकार के एक महीने के खर्च में एक से अधिक कैमरे लगाए जा सकते हैं, जो कि दूर से नियंत्रित होते हैं, और भ्रष्टाचार के आरोपों के बिना सरकार को अधिक कमाई करके दे सकते हैं।

अभी छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार की नीयत लोगों को जरा भी नाराज करने की नहीं है। नतीजा यह होता है कि तकनीक से हर दिन जहां लाखों लोगों के चालान हो सकते हैं, सरकार का तकनीक में किया गया निवेश तेजी से वापिस आ सकता है, वहां पर सरकार अफसरों को धीमे चलने को कहती है। जब जुर्माने और कार्रवाई की रफ्तार एक सीमा से अधिक धीमी हो जाती है, नियम तोडऩे वाले लोग नियमों और खतरों में बढ़ जाते हैं, तो फिर टेक्नॉलॉजी भी बेअसर लगने लगती है। सडक़ों के मामलों में सरकार के पास रियायत का हक इसलिए नहीं होना चाहिए कि नियम तोडऩे वाले पर कार्रवाई न होने से नियम मानने वाले लोगों की जिंदगियां भी खतरे में पड़ती हैं। किसी सरकार को बेकसूर लोगों की जिंदगी खतरे में डालने का हक कैसे मिल सकता है?

टेक्नॉलॉजी ने पुलिस के बाकी दायरों का काम भी बड़ा आसान किया है। आज अधिकतर मुजरिम सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग, मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स, और मोबाइल फोन की लोकेशन, इन तीन चीजों से ही पकड़े जा रहे हैं। पहले पुलिस की टीम हफ्तों तक जो जांच करती रहती थीं, वह अब पुलिस सिर्फ रिकॉर्डिंग, लोकेशन, और कॉल डिटेल्स से अपने दफ्तर में बैठे हुए कुछ घंटों में कर लेती है। इसलिए भी तरह-तरह की रिकॉर्डिंग, और निगरानी की तकनीक का सार्वजनिक जगहों पर अधिक इस्तेमाल करना चाहिए। टेक्नॉलॉजी तो जैसे चाहें वैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी कैमरे की रिकॉर्डिंग से ट्रैफिक चालान भी हो सकता है, और वहां से गुजरने वाले दूसरे मुजरिमों को भी पकड़ा जा सकता है। इसलिए सरकार को अब पुलिस कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बजाय टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। ट्रैफिक को लेकर अधिक फिक्रमंद इसलिए रहते हैं कि बड़े जुर्मों की शुरूआत ट्रैफिक नियमों को तोडक़र ही शुरू होती है। जब इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तब ऐसे ही लोग आगे बढक़र अधिक बड़े नियम, और अधिक बड़े कानून तोड़ते हैं। सरकार को निगरानी कैमरों, चालान करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाकर उससे अधिक से अधिक जुर्माना वसूल करके इस पूंजीनिवेश को मोटी कमाई का जरिया बनाना चाहिए, कम से कम तब तक तो यह कमाई जारी रह सकती है, जब तक कि लोग नियमों को पालना शुरू न कर दें। उसके बाद भी जरूरत न रहने पर ये उपकरण एक उम्र पूरी करके खत्म भी हो जाएंगे, और इंसानों की तरह इन्हें बीमारी के इलाज, या पेंशन की जरूरत भी नहीं रहेगी। सरकार के लिए टेक्नॉलॉजी सबसे सस्ती और आसान चीज है। अभी तक हमने एआई के किसी इस्तेमाल की चर्चा भी नहीं की है। जब ऐसे उपकरणों के साथ एआई को जोड़ दिया जाएगा, तो सरकार की कार्रवाई करने की क्षमता सैकड़ों-हजारों गुना बढ़ जाएगी।

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