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दुनिया के जिन समाजों में लोगों के पास अपनी कामकाजी पीढ़ी, और उसके बच्चों को जिंदा रखने की फिक्र पूरी हो जाती है, वे समाज बुजुर्गों के बारे में कुछ अधिक हद तक सोच पाते हैं। जब लोगों के पास कमाने वाले लोगों के लिए भी कमी रहती है, और उनकी अगली पीढ़ी भी उनकी कमी का शिकार रहती है, तो बिना कुछ कहे हुए भी घर के बुजुर्ग अपनी जरूरतों को बहुत सीमित कर लेते हैं, और अपनी छोड़ी विरासत के बावजूद अपने बोझ को कम से कम रखते हैं। लेकिन फिर भी समाज में बदलती हुई स्थितियों की वजह से बुजुर्गों की देखरेख, उनका खयाल, और उनकी फिक्र एक बढ़ता हुआ मुद्दा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अकेलेपन को एक वैश्विक स्वास्थ्य खतरा घोषित किया है, और माना है कि इसका असर हर दिन 15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदेह रहता है। बढ़ते हुए शहरीकरण, लोगों के दूसरे देश-प्रदेश में जाकर काम करने से परिवार का ढांचा सीमित होते चल रहा है, और बहुत से मामलों में आल-औलाद मजबूरी में भी मां-बाप से परे रहती है, काम करती है।
ऐसे बहुत से मामले आते हैं जिनमें दूसरे देशों में बसे हुए बेटा-बेटी अपने घरेलू देश में अकेले रह रहे बूढ़े मां-बाप को कई-कई दिन तक फोन भी नहीं कर पाते, और फिर कभी-कभी तो उनके मर जाने के बाद लाशों से उठी बदबू से पड़ोसियों को कुछ आशंका होती है, और पुलिस को बुलाकर दरवाजा खोला जाता है। जाहिर है कि इन दिनों हर किसी के पास एक फोन रहता है, बूढ़े मां-बाप के पास भी। और आल-औलाद दूसरे देश-प्रदेश से उसे फोन भी नहीं कर पाती।
अभी इस बारे में कुछ शोध करते हुए एक नया शब्द हाथ लगा, सिल्वर-टेक। यानी जिनके बाल चांदी सरीखे हो गए हैं, उनके इस्तेमाल के लायक टेक्नॉलॉजी। ताजा आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों की एक तिहाई बुजुर्ग आबादी अकेलेपन का शिकार है। जापान जैसे सबसे अधिक जीने वाले देश में स्वयं को समाज से काट लेने के लिए संस्कृति में एक शब्द, हिकोकोमोरी, है, और अब यह बुजुर्गों के बीच आगे बढ़ते-बढ़ते अकेले में मौत के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द, कोदोकुशी, तक पहुंच गया है। लोग इतना लंबा जीते हैं कि अगली पीढ़ी तब तक किसी और देश-प्रदेश पहुंच चुकी रहती हैं, और अकेले रहना ही शतायु पहुंचने वाली इस पीढ़ी की नियति जैसी रहती है। कुछ इसी तरह की सामाजिक समस्या को लेकर ब्रिटेन में अकेलेपन के लिए मंत्रालय बनाया गया है, और एक मंत्री की नियुक्ति हुई है। भारत के बारे में भी बढ़ते हुए शहरीकरण, और कई कामगारों, और मजदूरों के प्रवासी होने की वजह से कोई चौथाई फीसदी बुजुर्ग अकेले रहने को मजबूर हैं।
अब वृद्धावस्था में गरीबों के मदद के लिए तो सरकार और समाज की तरफ से तरह-तरह के वृद्धाश्रम रहते हैं, लेकिन इससे परे अब संपन्न तबके के बुजुर्गों के लिए भुगतान करने पर बेहतर इंतजाम का चलन भी कम से कम महानगरों में तो शुरू हो ही चुका है। जब जिंदगी के आखिरी बहुत से बरस अकेले गुजारना एक नियति है, तो फिर ऐसे लोगों को किसी छोटे से मकान के एक कमरे में बिस्तर पर पड़े-पड़े मौत का इंतजार करने देना कुछ अधिक अमानवीय है, बजाय उन्हें वृद्धाश्रमों में रखने के। वृद्धाश्रम समाज में बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की कमी बताते हैं, लेकिन अगर कुछ गहरी नजर से इन्हें दुबारा देखें, तो यह समझ पड़ेगा कि यह बुजुर्गों की अपरिहार्य दिक्कतों, और हालत के बीच शायद एक बेहतर व्यवस्था है। जब कई बुजुर्गों को एक साथ रखा जाता है, तो वे एक अलग किस्म का सामाजिक-परिवार बनाते हैं, जब एक-दूसरे के दुख-दर्द और अकेलेपन को सुनते हैं, तो उनका अपना दुख-दर्द कुछ कम होता है, या कम से कम यह तो लगता ही है कि वे ऐसे दुख वाले अकेले नहीं हैं। दूसरी तरफ रोज की जरूरतों, और जिंदा रहने के लिए वृद्धाश्रम जैसी सामाजिक व्यवस्था अलग-अलग, अकेले घरों के मुकाबले कुछ अधिक सहूलियत और हिफाजत की हो सकती हैं, जहां मददगार कर्मचारियों, या डॉक्टरों का बेहतर इंतजाम हो सके।
भारत के वृंदावन में पति खो चुकी महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृद्धाश्रम सुनाई पड़ते हैं, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं आकर मरने तक ईश्वर की आराधना में लगती हैं। जिस तरह वे सफेद कपड़ों में एक रंगहीन जिंदगी गुजारती हैं, और हिन्दुओं के एक सबसे रंग-बिरंगे भगवान, कृष्ण की भक्ति-आराधना ही उनकी जिंदगी में रह जाती है, तो वह एक दर्शनीय सामाजिक विरोधाभास भी बताती है। मयूरपंखी रंगों वाले कृष्ण, और किसी भी रंग के बिना एक विधवा! यह शब्द लिखना हम पसंद नहीं करते हैं, लेकिन जिस रंगहीन जिंदगी की हम बात करते हैं, उसे इस शब्द से बेहतर समझा जा सकता है। तो समाज के, हिन्दुओं के, एक तबके ने घरों से अकेली रह गई बुजुर्ग महिला से मुक्ति पा लेने का जरिया वृंदावन में निकाल लिया। धर्म कई तरह की सहूलियतें जुटाकर देता है, जिसमें एक सबसे आम सहूलियत आत्मग्लानि से मुक्ति की रहती है।
भारत की कुछ जातियों में पुरूष अपने से 8-10 बरस छोटी लडक़ी या महिला से शादी करने के लिए जाने जाते हैं। और भारत की आबादी का दूसरा तथ्य यह है कि यहां महिला की औसत उम्र पुरूष की औसत उम्र के मुकाबले करीब सवा तीन बरस अधिक रहती हैं। अब इस नौबत में अकेली रह जाने वाली महिला के अकेले बरसों का हिसाब लगाने के लिए केलकुलेटर की जरूरत नहीं है, पति से 7 बरस छोटी महिला आखिर के करीब 10 बरस अकेली रहने की नियति पाती है। ऐसी ही महिलाएं वृंदावन के विधवाश्रमों में कृष्ण की भक्ति करते हुए रंगहीन जिंदगी गुजारती हैं।
ऐसे में बुजुर्गों की मेडिकल देखरेख करने वाले, और उनके रोजाना के कामकाज में मदद करने वाले तरह-तरह के औजार और उपकरण विकसित दुनिया, या संपन्न देशों में इस्तेमाल में अधिक आते जा रहे हैं। लेकिन इसका एक बुरा नतीजा यह भी होता है कि आल-औलाद मां-बाप को उपकरणों के हवाले करके उनसे और दूर हो जाती हैं। एक तरफ जहां ऐसे उपकरण सहूलियत लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे भावनात्मक दूरी भी खड़ी कर देते हैं। मोबाइल फोन, या किसी और किस्म की वीडियो कॉल पर हुई बातचीत को मिलने जाने का विकल्प सा मान लिया जाता है। और ऐसी सहूलियत मुहैया करा देने वाले परिजनों को यह भी लगता है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है।
यह बात आज जहां से शुरू की थी, उसी पर लौटें, तो जापान की असल जिंदगी की एक कहानी पर बनी फिल्म याद पड़ती है। इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े शोहरत पाई थी। जापान एक वक्त बहुत बुरे अकाल से गुजर रहा था। लोगों के पास खाने को नहीं था। कमाने वाले लोग भी भूखे मर रहे थे, और वे अपने बच्चों को भूख से मरते देख नहीं पा रहे थे। ऐसे में जवान लोग अपने बहुत कमजोर हो चुके बूढ़े मां-बाप को ईश्वर का दर्शन कराने के नाम पर पीठ पर लादकर पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहां से खाई में फेंक देते हैं। खाई में नीचे मानव कंकालों का ढेर रहता है। जो बुजुर्ग ऊपर ले जाए जाते हैं, उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि उनके साथ क्या होगा, क्योंकि ऐसे ईश्वर देखे हुए कोई भी बुजुर्ग गांव लौटे नहीं रहते हैं। जब जिंदगी की दिक्कतें अमानवीय होने लगती हैं, तो वे ताकतवर पीढ़ी को सबसे पहले अमानवीय कर देती हैं, और कमजोर पीढिय़ों को ऐसी ताकत का शिकार बना देती हैं।
आज पूरी दुनिया में बुजुर्ग आबादी का अनुपात जिस रफ्तार से बढ़ते चल रहा है, उसमें यह जरूरी है कि अपने कामकाजी बरसों में लोगों पर एक ऐसा टैक्स लगाया जाए जो कि सीधे-सीधे बुजुर्गों की देखरेख में इस्तेमाल हो। जब सरकार के हाथ में अलग-अलग कमाई और खर्च तय करने की सहूलियत रहती है, तब सबसे कमजोर तबके, बुजुर्ग, बीमार, बेघर, बच्चे, मानसिक विचलित, कहीं प्राथमिकता नहीं बन पाते। अपने पैरों पर चलकर पोलिंग बूथ तक पहुंचने की ताकत रखने वाले, और उन्हें मिले हुए फायदों को याद रखने वाले लोगों की ही फिक्र में बजट डूब जाता है। इसलिए दुनिया में बढ़ती हुई बुजुर्ग आबादी की संख्या का अंदाज लगाकर उसके लिए अलग से टैक्स लेने की जरूरत है, ताकि सरकार बुजुर्गों को ऐसी वृद्धावस्था पेंशन के भरोसे न छोड़ दे, जिसमें सबसे गरीब तबके को भी रोज दो रोटी न मिल सके। दिक्कत यह है कि आज फैसले लेने वालों के हाथ-पांव चलते हैं, और फैसलों की जगह पर बैठे लोगों के पास अपने बुढ़ापे का पर्याप्त इंतजाम रहता है, इसलिए वे दूसरों के बुढ़ापे की फिक्र की जहमत से आजाद रहते हैं। लेकिन समाज के बीच से सरकारों पर इस बारे में दबाव पडऩा चाहिए। आज के वक्त सोशल मीडिया पर लिखना और बोलना, बहस छेडऩा, ऐसा ही एक सामाजिक दबाव है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


