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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : स्कूली बच्चों की आत्मघाती हिंसा से उठते हैं कई सवाल, पर जवाब सरकार के पास
सुनील कुमार ने लिखा है
20-Feb-2026 4:05 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : स्कूली बच्चों की आत्मघाती हिंसा से उठते हैं कई सवाल, पर जवाब सरकार के पास

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अभी 48 घंटे के भीतर स्कूली इम्तिहानों में शामिल होने जा रहे चार नाबालिग बच्चों ने खुदकुशी कर ली। इनके पीछे मोटेतौर पर पढ़ाई का तनाव दिख रहा है, लेकिन जैसा कि किसी की भी जिंदगी में होता है, यह भी हो सकता है कि साथ-साथ कोई दूसरा तनाव भी हो। एक नाबालिग ने तो खुदकुशी की जो चिट्ठी लिख छोड़ी है उसमें परिवार से कहा है कि उसका शरीर मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाए। यह अतिपरिपक्व सोच इस उम्र के हिसाब से कुछ अधिक गंभीर है, और हक्का-बक्का करने के अलावा यह हैरान भी करती है। वैसे तो बालिगों, या नाबालिगों, अक्सर ही प्रेमीजोड़ों, या वैध-अवैध कहे जाने वाले रिश्तों में उलझे हुए लोगों की खुदकुशी की खबरें आती रहती हैं, लेकिन एक ही जिले में दो दिनों के भीतर इम्तिहान के मौसम में चार नाबालिग छात्र-छात्राओं की खुदकुशी दिल दहलाती है, और लोग इसे गंभीर मानें तो यह सोचने का एक बहुत बड़ा मुद्दा है। वरना इसे कोई महत्व न देना हो, तो यह पुलिस, अस्पताल, पोस्टमार्टम का मामला है, और इसके साथ ही केस बंद हो जाएगा। समाज या सरकार के सामने इससे अधिक कुछ करने की कोई बेबसी नहीं है।

एक बिल्कुल अलग मामले में धमतरी जिले की एक सरकारी स्कूल में 35 बच्चे ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपने कलाई पर किसी नुकीली या धारदार चीज से खरोंच लगाई है, अपने ही बदन को नुकसान पहुंचाया है, कई मामलों में काटने का निशान मिला है। यह जानकारी तो अभी सामने आई है, लेकिन इस मिडिल स्कूल के छात्र-छात्राओं की कलाई पर ये निशान कुछ हफ्तों तक से कुछ महीनों तक के पुराने दिख रहे हैं। इनमें लडक़े-लड़कियां दोनों ही शामिल हैं, और किसी ने घर के तनाव की वजह से ऐसा किया है, किसी ने दिल टूट जाने के कारण। ऐसा लगता है कि एक-दूसरे के देखादेखी इन बच्चों ने अपने को नुकसान पहुंचाने का यह तरीका निकाला है। इसे लेकर अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं, और बच्चों से और उनके मां-बाप से बात करने के लिए किसी परामर्शदाता को गांव भेजा भी गया है। यह मामला खुदकुशी तक नहीं पहुंचा है, लेकिन कुछ कम दर्जे का आत्मघाती मामला तो है ही, अपने को नुकसान पहुंचाने का।

हम किसी भी खुदकुशी को उस व्यक्ति की असफलता के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक दायरों की असफलता भी मानते हैं जिन्होंने वक्त रहते अपने बीच के सदस्यों की निराशा को नहीं भांपा, और वे खुदकुशी कर बैठे। अधिकतर मामलों में यह होता है कि खुदकुशी की कगार पर पहुंचने के पहले लोगों के बर्ताव से आसपास के लोगों को यह अहसास हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। लोग चाहें तो अपने बीच के व्यक्ति को संभाल सकते हैं, और कोई ठोस मदद न सही, कम से कम दिलासा दिला सकते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगा सकते हैं। जब लोगों के मन में जिंदगी छोड़ देने का ख्याल आता है, तब वे ऐसी अस्थिर मानसिक स्थिति में रहते हैं कि वे निराशा जरा सी और बढऩे पर कगार के बाहर कदम बढ़ा सकते हैं, और हौसला थोड़ा सा मिल जाए, तो वे उस कगार से वापिस भी लौट सकते हैं। इम्तिहानों के दिनों में कई नेता, कहीं-कहीं पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए सामान्य अपील जारी करते हैं, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया और मोबाइल सरीखे उपकरणों की मेहरबानी से लोगों को सिर्फ सबसे अधिक आकर्षक, सनसनीखेज, या उत्तेजक सामग्री ही बांध पाती है, और ऐसे में नसीहत की बातें उन पर अधिक असर नहीं करती, सच तो यह है कि उनका ध्यान तक नहीं खींचती।

सरकार और समाज को आज की परीक्षा के मौसम की अपीलों से बढक़र कुछ सोचना होगा। हमने अपने अखबार में, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस मुद्दे को उठाया है कि आज समाज में हर उम्र के लोग जिस तरह से हिंसक या आत्मघाती होते चल रहे हैं, उसे देखते हुए समाज के बीच अधिक परामर्शदाताओं की जरूरत है। आज मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं को देखें, तो पौन घंटे की उनकी फीस ही हजारों रूपए होती है, और एक-एक की उलझन को सुलझाने में कई बार ले जाना पड़ता है। आज देश में कितने ऐसे लोग हैं जो कि अपने परिवार के एक सदस्य पर हजारों रूपए खर्च कर सकें? फिर यह भी है कि देश में अंधविश्वास की वजह से मानसिक उलझन के लोगों को प्रेत-बाधा का शिकार मान लिया जाता है, या किसी ने जादूटोना कर दिया होगा, ऐसा मान लिया जाता है। मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता, या मनोचिकित्सक न आसानी से उपलब्ध हैं, और न ही वे सस्ते हैं, दूसरी तरफ झाड़-फूंक करने वाले, भूत उतारने वाले, तंत्र-मंत्र करने वाले पाखंडी गली-गली मौजूद हैं, और वे मनोविज्ञान के पेशेवर लोगों के मुकाबले बड़े-बड़े दावे भी करते हैं, भरोसा दिलाते हैं, और उनके गिरोह में शामिल लोग उनसे ठीक होने वाले लोगों की कहानियां भी फैलाते रहते हैं। कई धर्मों में इस तरह के पाखंडी लोगों का बड़ा बोलबाला है, और कई तरह के बाबा, चंगाईसभा करने वाले पादरी लोगों पर से दुष्टात्मा हटाने का पाखंडी-प्रदर्शन करते हैं। कई तरह की धार्मिक सभाओं में असली या नकली मानसिक विचलित लोगों को तरह-तरह की अस्वाभाविक हरकतें करते दिखाया जाता है, और फिर धार्मिक पाखंड से जुड़े हुए लोग उन्हें ठीक कर देते हैं। देश में जब अंधविश्वास एक आम ढर्रा बन जाता है, तो पेशेवर मनोवैज्ञानिकों की जरूरत भी कम रहती है, और वे वैसे भी लोगों की पहुंच के बाहर हैं।

हम शायद 50वीं बार अपनी इस सलाह को दुहरा रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकारों को यह चाहिए कि अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले विश्वविद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग में बड़े पैमाने पर परामर्शदाता तैयार करने का ढांचा खड़ा करे। इसके लिए स्कूलों के मौजूदा प्रशिक्षित शिक्षकों को भी आमंत्रित किया जा सकता है कि वे अपनी तनख्वाह पाते हुए भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श का एक या दो बरस का एक कोर्स करें, और फिर अपनी तैनाती की जगह पर अपनी स्कूल के बच्चों के अलावा भी वे शहर-कस्बे की दूसरी स्कूलों में जाकर वहां भी हर हफ्ते बच्चों की उलझन सुलझाएं। इससे नाबालिग हिंसा, और आत्मघाती हरकतों के मामले घटेंगे। यह भी होगा कि जब कम उम्र से बच्चे मानसिक रूप से अधिक मजबूत रहेंगे, तो वे बेहतर बालिग भी साबित होंगे। लेकिन आज न सिर्फ बच्चों, बल्कि समाज के बड़े लोगों के लिए भी तरह-तरह के परामर्शदाताओं की जरूरत है। स्कूलों के शिक्षक चूंकि पढ़ाने के बीएड जैसे कोर्स किए हुए रहते हैं, इसलिए वे परामर्श के कोर्स करने के लिए अधिक सही व्यक्ति भी होते हैं। सरकारें अगर समाज में औपचारिक जगहों पर, और अनौपचारिक रूप से भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श की सहूलियत मुहैया नहीं कराएंगी, तो एक तो सरकार के हाथ हिंसा के बहुत से मामलों से भरे रहेंगे, दूसरी बात यह भी रहेगी कि एक बीमार या विचलित समाज कभी भी एक स्वस्थ और खुश समाज जितना उत्पादक नहीं हो सकता। हमें आज के लिए सबसे जरूरी, और सबसे आसान बात यही लगती है कि सरकार अपने ढांचे में मौजूद शिक्षकों को ऐसी पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करे, और अभी से इस बात की घोषणा करे कि आने वाले बरसों में शिक्षकों के लिए जिस तरह बीएड अनिवार्य है, उसी तरह मनोवैज्ञानिक-परामर्श का कोर्स किए हुए लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। भारत में समाज इतना सक्षम और संपन्न नहीं है कि वह अपनी बहुत सी दिक्कतों को खुद सुलझा सके, इसलिए सरकारों का योगदान जरूरी है, जिसके बिना कई तरह के खतरे टल नहीं सकते।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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