ताजा खबर
कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में दिए गए फैसले बलात्कार में लडक़ी या महिला की अलग-अलग स्थितियां तय करते हैं। इन दोनों की आपस में तुलना करने की कोई वजह नहीं है, दोनों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन भारतीय कानून में महिलाओं की स्थिति, और भारतीय हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के नजरिए को लेकर इन दोनों की एक तुलना करना जरूरी भी है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन बरस कर दिया, क्योंकि हाईकोर्ट जज का यह मानना था कि किसी महिला की योनि पर अगर आरोपी ने अपना गुप्तांग टिकाया था, और वहीं उसका स्खलन हुआ, तो जब तक उसने योनि के भीतर प्रवेश नहीं किया था, तब तक वह बलात्कार नहीं, सिर्फ बलात्कार का प्रयास कहलाएगा। यह पूरी बात सुनने में बड़ी अप्रिय लगती है, लेकिन सेक्स अपराधों के मामले में इस चर्चा से इसलिए नहीं बचा जा सकता कि ऐसे बारीक तकनीकी फर्क से कानून के नजर में जुर्म बदल जाता है। हाईकोर्ट ने इस तकनीकी फर्क के आधार पर मौजूदा कानून के तहत इसे बलात्कार की कोशिश ही माना, और उस आधार पर ही सजा सुनाई, ट्रॉयल कोर्ट की दी गई सजा घटाकर आधी कर दी।
एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए गए उस विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक नाबालिग लडक़ी को सीना पकडक़र, उसका नाड़ा खींचा गया था, उसे पुल के नीचे ले जाया गया था, और हाईकोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास मानने से भी इंकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। हमने पिछले बरस के इस फैसले के तुरंत बाद इसी जगह यह लिखा था कि जज का यह तर्क सही नहीं है कि उस नाबालिग लडक़ी का सीना भींचना, और उसका नाड़ा खोलने या तोडऩे की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं है। इसके खिलाफ हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर जमकर कहा था, और सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस फैसले को तुरंत खारिज करे। इसे खारिज करने में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 11 महीने लगा दिए, और सर्वोच्च अदालत को जो संवेदनशीलता दिखानी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा का नाम तब से हमारे दिमाग में घूम ही रहा था कि कैसे कोई जज इतना संवेदनाशून्य हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। हमने इस पर पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक-सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरुषवादी, महिलाविरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरियों तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो जज सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। हम जजों से यह उम्मीद तो नहीं करते कि वे पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से, धर्म या जाति के मामलों से पूर्वाग्रह की वजह से ही अलग रखना चाहिए।
जब-जब हमारी कही कोई बात सुप्रीम कोर्ट में जायज करार दी जाती है, तो थोड़ी तसल्ली होती है कि प्राकृतिक न्याय पर आधारित हमारी सीमित समझ सही साबित हुई है। इससे भी अधिक तसल्ली यह होती है कि भारतीय समाज में जो तबके सबसे कमजोर हैं, उन तबकों के साथ, उनमें से कम से कम किसी एक तबके के साथ यह थोड़ी हमदर्दी की बात हुई है। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले में नफरती-बयान की याचिका पर जो रूख दिखाया है, वह एकदम ही निराश करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले, रिटायर हो चुके जजों ने हेट-स्पीच के मामले में जो साफ-साफ फैसले दिए थे, और पूरे देश के प्रशासन पर एफआईआर दर्ज करने की जो जिम्मेदारी डाली थी, आज के चीफ जस्टिस खुद ही हाल के बरसों के उस फैसले को अनदेखा करते हुए दिख रहे हैं। खैर, आज लड़कियों और महिलाओं के हक, उनकी गरिमा, उनके साथ इंसाफ की चर्चा में हम नफरती-बयानों के मुद्दे को जोडक़र सब कुछ बहुत जटिल करना नहीं चाहते, इसलिए उस पर अलग से।
फिलहाल बिलासपुर हाईकोर्ट का यह ताजा फैसला कुछ फिक्र खड़ी करता है कि कोई पुरूष अपने निजी अंग को महिला के निजी अंग पर दस मिनट तक रखे, और वहीं उसका स्खलन हो जाए, और उसे बलात्कार न माना जाए। जज अपनी जगह सही होंगे, क्योंकि भारत के कानून में बलात्कार की परिभाषा में महिला की देह के भीतर प्रवेश एक अनिवार्य शर्त है, और उसके बिना उसे रेप नहीं माना जा सकता। लेकिन यह कानून जब भी बना होगा, उस वक्त इस बात को अनदेखा किया गया कि महिला के गुप्तांग पर इस तरह स्खलित होने का मतलब उस महिला को एड्स सहित दूसरे सभी सेक्स-संक्रमित बीमारियों को देना भी है। इनमें से एड्स अभी तक पूरी दुनिया के लिए लाइलाज है। इसे उस लडक़ी या महिला की पूरी जिंदगी के लिए एक जानलेवा खतरा बनाने वाले को अगर बलात्कारी न माना जाए, तो क्या माना जाए? एक संकुचित परिभाषा के तहत उसे बलात्कारी न मानना तकनीकी रूप से जायज तो हो सकता है, लेकिन उसे महज बलात्कार के प्रयास का आरोपी मानकर छोड़ देना तो कानून की बहुत ही अदूरदर्शी, और सीमित सीमाओं का एक सुबूत है। जज ने अपने हिसाब से तंगनजरिए वाले कानून के तहत सही व्याख्या की होगी, लेकिन हमारी समझ यह भी कहती है कि हाईकोर्ट को कानून की व्याख्या करने के साथ-साथ जरूरत पडऩे पर उसमें फेरबदल भी सुझाना चाहिए। इस फैसले में जज ने वह सुझाया है या नहीं, वह पूरा फैसला अभी हमें देखने नहीं मिला है। लेकिन जिस संसद से कानून बनते हैं, उस संसद में यह बात आनी चाहिए कि किसी लडक़ी या महिला को इस तरह एड्स के खतरे में डालने को क्या कहा जाए? जिंदगी का खतरा, पूरी जिंदगी की बीमारी का खतरा, यह बलात्कार के दर्जे में नहीं आ रहा है, यह गैरइरादतन हत्या के दर्जे में नहीं आ रहा है, तो फिर कहां आ रहा है? एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए लडक़ी के नाड़े तोडऩे को बलात्कार का प्रयास मान रहा है, तो दूसरी तरफ लडक़ी के बदन से अपना गुप्तांग रगडक़र वहीं स्खलित हो जाने को भी बलात्कार का प्रयास ही माना जा रहा है। इन दोनों में साफ-साफ फर्क होना चाहिए। और अगर जरूरत हो तो बलात्कार से जुड़े हुए कानूनों में बारीकी से इस बात का प्रावधान करना चाहिए कि एड्स जैसी बीमारी का खतरा पैदा करने वाले बलात्कार की कोशिश करने वाले को पूरा बलात्कारी माना जाए, या गैरइरादतन हत्या का मुजरिम माना जाए? इस पर संसद को बात करना चाहिए, और एक खास सजा का इंतजाम करना चाहिए। बदलते हुए वक्त, और हो रही अलग-अलग घटनाओं को लेकर कानून में फेरबदल की जरूरत आते रहती है, और संसद को एक ऐसा कानून भी बनाना चाहिए कि किस तरह के फैसले देने वाले जजों को उस तरह के मामलों से अलग रखने की अनिवार्यता अदालती-प्रशासन पर लागू हो। क्या पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में उलझी हुई संसद को भारतीय कानून और अदालत की ऐसी जटिलताओं पर कोई गंभीर बात करने का वक्त है?


