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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 16 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक मामले में निचली अदालत का फैसला पलट दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि महिला की मौत आत्महत्या थी या उसे इसके लिए आरोपी ने उकसाया था।
मामला जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा थाना क्षेत्र का है। आरोपी बसंत कुमार सतनामी पर आरोप था कि उसने शादी के लगभग चार साल बाद अपनी पत्नी टिकैतिन बाई को प्रताड़ित किया, जिसके चलते उसने आत्महत्या कर ली।
31 जुलाई 2007 को द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, एफटीसी जांजगीर की अदालत ने आरोपी को आईपीसी की धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
एकलपीठ में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण किया।
अदालत ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। डॉक्टर ने जिरह में स्वीकार किया कि उल्टी-दस्त से दम घुटने की संभावना भी हो सकती है। एफएसएल रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई। साथ ही गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे। कुछ गवाहों ने जहर से मौत की बात कही, कुछ ने शराब सेवन को कारण बताया, तो कुछ ने उल्टी-दस्त का जिक्र किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सामान्य झगड़ा या पारिवारिक विवाद को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता, जब तक स्पष्ट रूप से उकसाने या साजिश के ठोस सबूत न हों।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 306 के तहत सजा के लिए प्रत्यक्ष उकसावे और आपराधिक मंशा का प्रमाण जरूरी है। केवल प्रताड़ना या पारिवारिक तनाव पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह सिद्ध नहीं कर सका कि महिला की मौत आत्महत्या थी या आरोपी ने उसे इसके लिए प्रेरित किया। इस आधार पर निचली अदालत का फैसला टिकाऊ नहीं माना गया और आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया। साथ ही चार साल की सजा और जुर्माना भी निरस्त कर दिया गया।


