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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 15 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 38 साल पुराने दवा प्रकरण में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की एकल पीठ ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि सबूतों की कमी के कारण दिया गया बरी करने का आदेश उचित था।
मामला वर्ष 1988 का है। 16 मार्च 1988 को ड्रग इंस्पेक्टर ने खैरागढ़ स्थित पंडित मेडिकल स्टोर्स से ‘पैराक्विन’ टैबलेट का सैंपल लिया था। बताया गया था कि यह दवा इंदौर की एमएस पारस फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स कंपनी में बनी है। भोपाल की सरकारी लैब से आई जांच रिपोर्ट में दवा को मानक से कम गुणवत्ता का बताया गया। इसके बाद ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत विक्रेता, थोक व्यापारी और निर्माण कंपनी के भागीदारों के खिलाफ केस दर्ज किया गया।
डोंगरगढ़ की अदालत ने 2002 में सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान पाया गया कि दवा की सप्लाई चेन की पुष्टि में गंभीर कमी थी। जांच अधिकारी ने मूल बिल और दस्तावेज जब्त नहीं किए, केवल फोटोकॉपी पेश की गई। साथ ही, आरोपियों को दवा का सैंपल सेंट्रल ड्रग्स लैब में दोबारा जांच कराने का कानूनी अधिकार था, लेकिन दवा की एक्सपायरी हो जाने के कारण यह संभव नहीं हो सका।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को सही माना और राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही 38 साल पुराने इस मामले पर कानूनी रूप से पूर्ण विराम लग गया।


