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'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 9 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानूनी जानकारी का अभाव या आर्थिक तंगी किसी मामले में याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने 97 दिन की देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सीमाबद्धता का कानून, लिमिटेशन लॉ जनहित और न्यायिक निश्चितता पर आधारित है।
दुर्ग निवासी अभिषेक शर्मा ने रायपुर फैमिली कोर्ट द्वारा 17 जुलाई 2025 को पारित भरण-पोषण आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। याचिका निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के 97 दिन बाद दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने देरी माफी के लिए आवेदन प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया कि वह एक गरीब ग्रामीण है और उसे कानूनी प्रक्रिया व समय-सीमा की जानकारी नहीं थी। उसने कहा कि वकील से सलाह मिलने और आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद उसने बिना और देरी किए याचिका दाखिल की। इसे उसने अनजाने में हुई भूल बताते हुए न्यायहित में माफ करने की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें मध्यप्रदेश शासन बनाम रामकुमार चौधरी प्रकरण भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक कठिनाई या कानूनी मार्गदर्शन का अभाव सहानुभूति तो जगा सकता है, लेकिन कानून की नजर में यह पर्याप्त कारण नहीं है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कानून उन्हीं की सहायता करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद केवल कानूनी सहायता मिलने पर सक्रिय होना देरी माफी का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि देरी को उदारतापूर्वक माफ करना पत्नी और बच्चे के अधिकारों के साथ भी अन्याय होगा, क्योंकि सीमाबद्धता अवधि पूरी होने के बाद उन्हें एक वैधानिक अधिकार प्राप्त हो चुका है।


