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सोशल मीडिया वीडियो के आधार पर हुई बर्खास्तगी रद्द
05-Feb-2026 1:58 PM
सोशल मीडिया वीडियो के आधार पर हुई बर्खास्तगी रद्द

हाई कोर्ट ने जेल प्रहरी की बहाली के दिए आदेश
बेंच ने कहा-बिना ठोस साक्ष्य दी गई सजा पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी
'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 5 फरवरी। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के आधार पर बर्खास्त किए गए जेल प्रहरी को हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस पीपी साहू की सिंगल बेंच ने राज्य शासन के बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को सेवा में वापस लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी को बिना ठोस साक्ष्य के दंडित किया जाता है, तो ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

जेल प्रहरी लखनलाल जायसवाल को 2 अगस्त 2024 को एक कैदी को चिकित्सा जांच के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल (मेकाहारा) ले जाने की जिम्मेदारी दी गई थी। अस्पताल में जांच के बाद वह शाम करीब 4:50 बजे कैदी के साथ जेल लौट आए। इसी बीच सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो सामने आए, जिनके आधार पर विभाग ने उन पर आरोप तय किए और बाद में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
पहला आरोप यह था कि अस्पताल ले जाने के दौरान याचिकाकर्ता कैदी के परिजनों के साथ रायपुर के फाफडीह इलाके में एक रेस्तरां में अनाधिकृत रूप से घूमते दिखाई दिए। दूसरा आरोप यह लगाया गया कि कैदी को सुबह अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बिना उचित कारण के देर शाम जेल लौटे, जिससे कैदी के फरार होने का खतरा बन सकता था।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने दलील दी कि आरोप अस्पष्ट हैं और उनमें समय, स्थान व अन्य आवश्यक विवरणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने बताया कि अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने कुछ परीक्षण सुझाए थे, जिनकी रिपोर्ट में देरी की जानकारी मिलने पर याचिकाकर्ता कैदी के साथ लौट आया। साथ ही यह भी कहा गया कि जांच के दौरान वीडियो फुटेज को प्रमाणित करने की वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

राज्य की ओर से कहा गया कि आरोप पत्र में तिथि और स्थान का उल्लेख है। हालांकि यह स्वीकार किया गया कि विभागीय जांच में अस्पताल कर्मचारियों से पूछताछ नहीं की गई और न ही कोई चिकित्सीय दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाए गए।
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी विभागीय जांच में वैधानिक प्रावधानों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि वीडियो फुटेज को प्रमाणित करने, गवाहों की जांच करने और साक्ष्य अधिनियम के अनुरूप प्रक्रिया अपनाने में गंभीर खामियां रहीं।
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को दी गई सजा बिना ठोस साक्ष्य के थी, इसलिए टिकाऊ नहीं है। परिणामस्वरूप, 31 दिसंबर 2024 और 6 अगस्त 2025 के बर्खास्तगी से जुड़े आदेशों को रद्द कर दिया गया। याचिकाकर्ता को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया, हालांकि पिछला वेतन नहीं मिलेगा, लेकिन सेवा की निरंतरता बनी रहेगी।
 


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