ताजा खबर
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 5 फरवरी। राज्य के हजारों गांवों तक इंटरनेट पहुंचाने वाली महत्वाकांक्षी भारतनेट परियोजना कानूनी विवाद में फंसी हुई है। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई की। कंपनी ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण के गठन के लिए दूसरे पंच (आर्बिट्रेटर) की नियुक्ति की मांग की है। लंबी बहस के बाद न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
यह विवाद भारतनेट फेज-2 परियोजना से संबंधित है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 3056 करोड़ रुपये बताई गई है। इस चरण में राज्य की लगभग 6,000 ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर के जरिए हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ना प्रस्तावित था।
वर्ष 2018 में छत्तीसगढ़ इन्फोटेक प्रमोशन सोसायटी (चिप्स) और टाटा प्रोजेक्ट्स के बीच समझौता हुआ था। इसके तहत कंपनी को फाइबर बिछाने, नेटवर्क स्थापित करने और दीर्घकालीन संचालन व रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
टाटा प्रोजेक्ट्स का दावा है कि परियोजना को समय पर पूरा करने में कई ऐसी बाधाएं आईं, जो उसके नियंत्रण से बाहर थीं। कई क्षेत्रों में खुदाई की अनुमति समय पर नहीं मिली, किए गए कार्यों का भुगतान देर से हुआ। इसके बावजूद एकतरफा तरीके से जुर्माना लगाया गया और बैंक गारंटी भी भुना ली गई। साथ ही, संचालन और रखरखाव का कार्य शुरू नहीं हो सका। इन कारणों से परियोजना में भारी देरी हुई और कंपनी पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा।
लगातार विवाद और सहयोग के अभाव का हवाला देते हुए कंपनी ने मई 2025 में अनुबंध समाप्त कर दिया। इसके बाद विवाद निपटारे के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की गई, जिसके तहत एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश को पंच नियुक्त किया गया। हालांकि राज्य सरकार की ओर से दूसरा पंच नियुक्त नहीं किया गया, जिसके चलते कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
राज्य सरकार और चिप्स ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह कार्य अनुबंध (वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट) की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में विवाद का निपटारा छत्तीसगढ़ मध्यस्थता न्यायाधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत होगा, न कि सामान्य मध्यस्थता कानून 1996 के अंतर्गत। यह भी दलील दी गई कि कार्य एक कंसोर्टियम के माध्यम से किया जा रहा था, ऐसे में सभी साझेदारों की सहमति के बिना याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की भूमिका भी सामने आई है। भारतनेट केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है और इसका अधिकांश वित्तपोषण केंद्र से होता है। टाटा प्रोजेक्ट्स का तर्क है कि परियोजना की निगरानी में केंद्र सरकार लगातार शामिल रही, इसलिए वह भी विवाद का पक्षकार है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।


