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मुंबई, 30 जनवरी। महाराष्ट्र के दिवंगत उप मुख्यमंत्री अजित पवार के विमान हादसे में हुए निधन के बाद उनके नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और उनके चाचा एवं राजनीति के दिग्गज माने जाने वाले शरद पवार नीत राकांपा (शप) के प्रस्तावित विलय की प्रक्रिया में तेजी आ सकती है। सूत्रों ने यह जानकारी दी।
सूत्रों के मुताबिक विलय की घोषणा जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव के नतीजों के बाद हो सकती है।
उन्होंने बताया कि बुधवार को अजित पवार की विमान हादसे में मौत की दुखद घटना के बावजूद, सत्तारूढ़ राकांपा और राकांपा(शप)के वार्ताकारों ने पुष्टि की है कि यह प्रक्रिया ‘‘पूरी तरह से सही दिशा में आगे बढ़ रही है।’’
सूत्रों ने बताया कि पुणे और पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका चुनावों में एक साथ मैदान में उतरकर जमीनी स्थिति का जायजा लेने के बाद अजित पवार ने विलय प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सावधानीपूर्वक समयबद्ध योजना तैयार की थी।
दोनों दलों के सूत्रों ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की कि विलय की बातचीत ‘‘उन्नत चरण’’में है।
पूरे घटनाक्रम से अवगत सूत्रों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘परिवार और पार्टी को फिर से एकजुट करने की प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी। अजित दादा ने खुद वरिष्ठ नेताओं के साथ मतभेदों को दूर करने के लिए कई दौर की बातचीत की थी।’’
राकांपा(शप) से जुड़े सूत्रों ने बताया कि बुधवार को हुए विमान हादसे से पहले दोनों पक्ष बातचीत के ‘उन्नत चरण’ पर पहुंच चुके थे, और आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों के समापन के तुरंत बाद आठ फरवरी को विलय की घोषणा किये जाने की योजना थी।
अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा के पास महाराष्ट्र विधानसभा में 40 सीट हैं ( अजित पवार की अपनी बारामती सीट को छोड़कर, जो अब खाली है), जबकि शरद पवार नीत धड़े के 10 विधायक हैं। विलय के बाद, सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि क्या विलय के बाद भी राकांपा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली ‘महायुति’ सरकार का हिस्सा बनी रहेगी।
हालांकि, राकांपा के राज्य सरकार से अलग होने की स्थिति में भी संख्याबल के आधार पर देवेंद्र फडणवीस सरकार को कोई खतरा नहीं है। वर्तमान में भाजपा, राकांपा और एकनाथ शिंदे नीत शिवसेना के गठबंधन ‘महायुति’ के पास 288 सदस्यीय विधानसभा में 235 विधायक हैं।
अजित पवार भाजपा और शिवसेना के साथ सत्ता में भागीदारी के बावजूद कहते रहे थे कि वह एक धर्मनिरपेक्ष नेता हैं जो ‘शाहू, फुले और आंबेडकर’ (छत्रपति शाहूजी महाराज, महात्मा फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर) की प्रगतिशील वैचारिक विरासत के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
किरण गूजर समेत अजित पवार के करीबी सहयोगियों ने दावा किया कि दिवंगत नेता राकांपा के दोनों धड़ों का विलय करने के प्रति दृढ़ संकल्पित थे।
गूजर ने बृहस्पतिवार को बारामती में ‘पीटीआई-भाषा’से कहा, ‘‘अजित पवार दोनों धड़ों के विलय को लेकर उत्सुक थे। उन्होंने मुझे पांच दिन पहले बताया था कि इसकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अगले कुछ दिनों में विलय होने वाला है।’’
गूजर से पूछा गया कि क्या उन्होंने शरद पवार के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की है? इसके जवाब में अजित पवार के पिछले चार दशकों से करीबी विश्वासपात्र रहे गुजर ने कहा, ‘‘पवार साहब, सुप्रिया ताई (सुप्रिया सुले) और अन्य नेताओं के साथ सकारात्मक बातचीत चल रही थी’’ और संकेत मिल रहे थे कि शरद पवार इस कदम का समर्थन करेंगे।
उन्होंने कहा, ‘‘कई सकारात्मक चीजें हो रही थीं, लेकिन इस त्रासदी ने अजित ‘दादा’ को हमसे छीन लिया। अब, उनकी मृत्यु के बाद, यह और भी अधिक अनिवार्य हो गया है कि दोनों धड़े एक साथ आएं तथा बारामती और राज्य की बेहतरी के लिए काम करें।’’
विमान हादसे से कुछ दिन पहले ही अजित पवार ने संगठनात्मक एकता और सत्ता-साझाकरण व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए राकांपा(शप) नेता जयंत पाटिल से मुलाकात की थी।
विलय की बातचीत के बीच, राकांपा के कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं ने अजित पवार के उत्तराधिकारी को लेकर बहस शुरू कर दी है।
राकांपा नेतृत्व का एक वर्ग परिवार की राजनीतिक विरासत को बनाए रखने के लिए उनकी पत्नी एवं वर्तमान में राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद के लिए नामित करने का इच्छुक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राकांपा के विलय से सत्तारूढ़ ‘महायुति’ और विपक्षी महा विकास आघाडी (एमवीए)दोनों के भीतर सियासी समीकरण आमूल-चूल रूप से बदलेंगे।
इस विलय को पश्चिमी महाराष्ट्र के ‘चीनी उत्पादक क्षेत्र’ पर फिर से पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है जहां पर भाजपा हाल में हुए महानगरपालिका चुनावों में सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है।
सूत्रों ने बताया कि अजित पवार राकांपा के दोनों धड़ों के संभावित विलय को दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के तौर पर देख रहे थे, खासकर 2029 के चुनावों और पार्टी की भविष्य की प्रासंगिकता के मद्देनजर। उनके मुताबिक अजित पवार को विश्वास था कि विलय अंततः होगा, और महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके चाचा शरद पवार की सहमति से ही यह संभव होगा।
सूत्रों के मुताबिक स्थानीय निकाय के नौ फरवरी को आने वाले परिणाम संभावित विलय का मार्ग प्रशस्त करेंगे। (भाषा)


