ताजा खबर

ईयू और भारत के एफ़टीए में ट्रंप के लिए क्या संदेश देखा जा रहा है?
28-Jan-2026 10:35 AM
ईयू और भारत के एफ़टीए में ट्रंप के लिए क्या संदेश देखा जा रहा है?

-रजनीश कुमार

भारत अमेरिका में अपना सामान बेचने के लिए 50 प्रतिशत टैरिफ़ दे रहा है और यूरोपियन यूनियन के 27 देश 15 प्रतिशत.

अब भारत और ईयू ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) की घोषणा की है और इसे अमेरिका को संदेश देने के रूप में देखा जा रहा है.

अमेरिका इसे लेकर हमलावर दिख रहा है. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 24 जनवरी को कहा, ''यूरोप के हमारे सहयोगियों ने रूस से तेल ख़रीदने के बदले भारत पर टैरिफ़ लगाने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें भारत से बड़ा व्यापार समझौता करना था. यूरोप यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस की जंग में ख़ुद ही मदद कर रहा है.''

अमेरिका चाहता था कि यूरोप भी भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ लगाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यूक्रेन पर रूसी हमले को यूरोप अपने लिए ज़्यादा ख़तरा मानता है लेकिन रूसी तेल ख़रीदने का हवाला देकर टैरिफ़ अमेरिका ने लगाया.

पिछले महीने ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली आए थे और अगले महीने यूरोपियन यूनियन (ईयू) के शीर्ष के नेता आए.

अमेरिकी की अल्बनी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र क्लैरी ने ईयू-इंडिया एफ़टीए को लेकर एक्स पर लिखा है, ''ईयू-भारत व्यापार समझौता इस बात की याद दिलाता है कि अन्य देशों के पास भी विकल्प मौजूद हैं. अगर अमेरिका आर्थिक दबदबे के आधार पर कोई टैरिफ नीति बनाता है और उसका ग़लत इस्तेमाल करता है तो उसका यह दबाव भी बेकार जाएगा. अमेरिकी मनमानी को लेकर दुनिया का प्रतिरोध अब लगातार बढ़ रहा है.''

सामरिक मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी भी मानते हैं कि इससे भारत की अमेरिका पर निर्भरता कम होगी.

चेलानी ने एक्स पर लिखा है, ''संकट के ऐसे दौर में जब सप्लाई चेन बाधित हो रही है और संरक्षणवाद बढ़ रहा है, तब यह महज एक कारोबारी समझौते से ज़्यादा अहमियत रखता है.

चेलानी ने लिखा है, ''यह रणनीतिक बीमा की तरह है जो भारत और ईयू को चीन के सरकार केंद्रित व्यापार मॉडल के मुक़ाबले एक लोकतांत्रिक संतुलन के रूप में स्थापित करता है और टैरिफ़ को हथियार बनाने की ट्रंप की रणनीति को कमज़ोर करता है. यह समझौता अमेरिका और चीन दोनों पर भारत की निर्भरता को कम करता है.''

नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोमवार को भारत को 77वें गणतंत्र दिवस की बधाई दी तो एक लाइन यह भी लिखी- भारतीय आकाश में अमेरिका में निर्मित विमानों को उड़ान भरते देखना बेहद रोमांचक रहा.

लेकिन भारतीय आकाश में केवल अमेरिकी जेट ही नहीं बल्कि रूसी जेट भी थे और परेड में रूस के एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भी दिखाया गया.

संभव है कि भारत के गणतंत्र दिवस की मुख्य अतिथि यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा के लिए यह असहज करने वाला रहा होगा. एस-400 को नेटो अपने ख़िलाफ़ देखता है.

'द हिन्दू' की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने एक्स पर लिखा है, ''गणतंत्र दिवस की परेड में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पूरी तरह प्रदर्शित हुई. मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद यूरोपीय संघ के नेताओं के सामने रूसी सैन्य हार्डवेयर/डिज़ाइन, जिनमें S-400 मिसाइल सिस्टम, टी-90 टैंक और संयुक्त रूप से निर्मित ब्रह्मोस मिसाइलों का प्रदर्शन किया गया.''

ट्रंप और यूरोप दोनों चाहते हैं कि रूस से भारत की क़रीबी कम हो लेकिन यूरोप ने भारत पर दबाव डालने के लिए अमेरिका की तरह टैरिफ़ नहीं लगाया था. सर्जियो गोर भले भारतीय आसमान में अमेरिकी जेट देख आह्लादित हुए लेकिन रूस जेट और एस-400 से असहज भी हुए होंगे.

एफ़टीए बनी रणनीति
दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत इसी असहजता की फ़िक्र नहीं कर रहा है और ट्रंप को यह रास नहीं आ रहा है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''अमेरिका में कूटनीतिक माहौल अब पहले जैसा नहीं रहा है. ट्रंप प्रशासन का ध्यान घरेलू राजनीति और लेन-देन आधारित रिश्तों पर है, जिससे सहयोग की पारंपरिक परिभाषाएं कमज़ोर हुई हैं. भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है लेकिन साथ ही वह यह भी समझता है कि मौजूदा हालात में ज़्यादा निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है.''

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''ट्रंप की विदेश नीति में निरंतरता की कमी रही है. पाकिस्तान, चीन और रूस जैसे देशों के साथ उनके रुख़ में बार-बार बदलाव हुआ है. इससे भारत के लिए लंबी अवधि की रणनीति बनाना मुश्किल हो जाता है. भारत हर वक़्त अमेरिकी असहजता के सामने झुकता नहीं रहेगा.''

भारत अमेरिकी टैरिफ़ के असर को कम करने के लिए कई देशों के साथ एफ़टीए कर रहा है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''ईयू और भारत में एफ़टीए पर सहमति ट्रंप की नीतियों के कारण ही बनी है. दोनों देशों ने सहमति तक पहुँचने के लिए ख़ुद को उदार भी बनाया है. अब सवाल है कि क्या ईयू से एफटीए ट्रंप के टैरिफ के असर को कम कर देगा?''

''देखिए अमेरिका हर देश के लिए बहुत बड़ा बाज़ार है. अमेरिका में भारत का निर्यात पिछले दो महीने में 20 प्रतिशत गिरा है. अमेरिका से नुक़सान अभी हो रहा है लेकिन ईयू से हुआ एफ़टीए लागू होने में क़रीब एक साल लग जाएगा. ज़ाहिर है कि लागू होने के बाद भारत का निर्यात बढ़ेगा और ट्रंप के टैरिफ़ का दबाव कम होगा. मैं तो ट्रंप को शुक्रिया कहता हूँ क्योंकि उन्होंने सच्चाई बता दी है कि आप किसी पर निर्भर ना रहें. भारत ने ट्रंप के कारण ही कई सुधारों को लागू करना शुरू कर दिया है और एफटीए पर भी बात बन रही है. अमेरिका के भरोसे रहना जोखिम भरा रहेगा.''

इससे पहले, भारत ओमान, न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन से एफ़टीए कर चुका है. ईयू से एफ़टीए पर बात वर्षों से चल रही थी लेकिन मुहर तब लगी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण दुनिया भर में उथल-पुथल है.

ईयू के साथ एफ़टीए का कितना असर
भारत और और ईयू दोनों अमेरिका के साथ चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. पहले भारत के बारे में कहा जाता था कि वह संरक्षणवादी नीति पर चलता है. यानी बाज़ार को पूरी तरह से खोलने से बचता है. अब भारत अपनी उस छवि को पीछे छोड़ता दिख रहा है.

भारत के लिए यह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है कि ट्रंप की नीतियों से होने वाले नुक़सान को बेअसर कर दे और रूस से संबंध मज़बूत रखते हुए ईयू के साथ अपने हक़ में एफ़टीए कर ले.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़ में व्यापार और अर्थशास्त्र के रिसर्च प्रमुख अमितेंदु पालित ने ब्लूमबर्ग से कहा कि ट्रंप की नीतियों को लेकर 'अनिश्चितता के माहौल' में देश पहले की कड़वाहट को दफ़्न करने के लिए तेजी से तैयार हो रहे हैं.

उन्होंने कहा, "किसी एक पर निर्भरता ख़त्म करना बिल्कुल अनिवार्य हो गया है."

अमेरिका के 50 फ़ीसदी टैरिफ के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए बाज़ार तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. ट्रंप ने भारत को "टैरिफ किंग" कहा था. भारत इसके बाद मर्कोसुर ब्लॉक, चिली, पेरू और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के साथ साझेदारी की कोशिश कर रहा है.

एमकाय ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा की एक रिपोर्ट बताती है कि ईयू के साथ एफ़टीए से 2031 तक ईयू में भारत का निर्यात 50 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईयू के साथ एफ़टीए से भारत के फार्मा, टेक्स्टाइल और केमिकल सेक्टर को सीधा फ़ायदा होगा.

पिछले वित्त वर्ष में यूरोपीय संघ और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 136.5 अरब डॉलर का रहा, जिसमें भारत के कुल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 17% से अधिक थी. भारत यूरोपीय संघ का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.

यूरोपीय संघ को सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक तक पहुंच मिलेगी. भारत 1.4 अरब से अधिक लोगों का बाज़ार है.

भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार अमेरिका है. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, 2024-25 में भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय व्यापार 131.84 अरब डॉलर का था.

अमेरिका के साथ पिछले वित्त वर्ष में भारत का 41.18 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस था. यानी भारत ने अमेरिका में सामान बेचा ज़्यादा था और ख़रीदा कम था. राष्ट्रपति ट्रंप को यही पसंद नहीं है और वह चाहते हैं कि ट्रेड सरप्लस अमेरिका के पक्ष में हो.

अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है और भारत ने पिछले साल 87 अरब डॉलर का सामान अमेरिका में बेचा था. ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के अनुसार, ट्रंप का टैरिफ़ अमेरिका में भारत का निर्यात 52 प्रतिशत तक कम कर सकता है और इससे भारत की जीडीपी मध्यम अवधि में 0.8 फ़ीसदी कम हो सकती है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि ट्रंप के टैरिफ़ के कारण 41 अरब डॉलर ट्रेड सरप्लस बुरी तरह से प्रभावित होगा लेकिन भारत जिस तरह से एफ़टीए कर रहा है, उससे इस नुक़सान की भरपाई तत्काल तो नहीं लेकिन अगले एक दो सालों में कर लेगा.

श्रीवास्तव कहते हैं, ''यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएँ भारत के लिए अमेरिका की तुलना में अधिक लाभकारी हो सकती हैं. यूरोप से भारत को होने वाले प्रमुख निर्यात में जेट इंजन और औद्योगिक नियंत्रण वॉल्व जैसी हाई-टेक मशीनरी शामिल हैं. इसके उलट अमेरिका से आयात बहुत ही सामान्य चीज़ों के हैं, जिनमें मक्का और सोयाबीन जैसे कृषि उत्पाद, साथ ही स्क्रैप के बाद बची रिसाइकल सामग्री शामिल है. भारत से यूरोप को होने वाले प्रमुख निर्यात में कपड़ों के साथ ही रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं.''

ईयू-भारत एफ़टीए के अनुसार, भारत ईयू के 90 प्रतिशत से अधिक सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे हर साल लगभग 4.8 अरब डॉलर के बराबर बचत होनी चाहिए.

यूरोपीय कारों पर टैरिफ़ मौजूदा 110 प्रतिशत से घटकर धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक आ जाएगा, जिसमें कम टैरिफ हर साल अधिकतम 2,50,000 वाहनों पर लागू होगा.

ईयू ने कहा कि मशीनरी, रसायन और फार्मास्यूटिकल्स पर भारत के टैरिफ भी समाप्त किए जाएंगे और प्रमुख कृषि उत्पादों पर टैरिफ घटाए या ख़त्म किए जाएंगे.

भारत और न्यूज़ीलैंड का एफ़टीए
न्यूज़ीलैंड और भारत ने पिछले महीने दिसंबर में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) की घोषणा की थी.

न्यूज़ीलैंड के साथ एफटीए भी वैश्विक आर्थिक पहुंच बढ़ाने के लिए भारत की कोशिश को दर्शाता है. न्यूज़ीलैंड के व्यापार मंत्री ने इसे ऐतिहासिक समझौता कहा था.

उन्होंने कहा था कि भारत को होने वाले उसके मौजूदा निर्यात के 95 प्रतिशत सामानों को टैरिफ मुक्त या काफ़ी कम टैरिफ़ के दायरे में ले आएगा. इसमें कोयले से लेकर भेड़ के मांस और शिशु फार्मूला मिल्क तक के उत्पाद शामिल हैं. भारत ने न्यूजीलैंड से सीमित मात्रा में सेब आयात पर भी शुल्क घटाया है, जो किसी भी मुक्त व्यापार समझौते के तहत इस फल पर उसकी पहली रियायत है.

यह क़दम ऐसे समय में उठाया गया था, जब अमेरिका नई दिल्ली पर अपने बाज़ार को अमेरिकी सेब के लिए खोलने का दबाव बना रहा है. इसके बदले में न्यूज़ीलैंड सभी भारतीय निर्यात पर शुल्क समाप्त करेगा और भारत से आने वाले छात्रों और कामगारों के लिए आवाजाही नियमों में ढील देगा.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने न्यूज़ीलैंड समकक्ष क्रिस्टोफर लक्सन से फोन पर बातचीत की थी और दोनों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने को लेकर भरोसा जताया था. न्यूज़ीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश पर भी सहमति जताई थी.

हालांकि कम व्यापार के कारण इससे भारत के निर्यात में बहुत बढ़ोतरी नहीं होगी. 2024-25 में न्यूजीलैंड और भारत के बीच कुल व्यापार 1.3 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत का निर्यात 711 मिलियन डॉलर और न्यूजीलैंड से आयात 587 मिलियन डॉलर था.

यूके के साथ एफ़टीए
पिछले साल मई महीने में भारत और ब्रिटेन के बीच फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ था. ब्रिटिश सरकार के अनुसार, यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 34 अरब डॉलर तक बढ़ाएगा.

ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि भारत ने वस्तुओं पर 90 प्रतिशत टैरिफ कम कर दिए हैं और इनमें से अधिकांश एक दशक के भीतर टैरिफ मुक्त हो जाएंगे.

ब्रिटिश व्हिस्की और जिन पर शुल्क आधा होकर 75 प्रतिशत रह जाएगा और बाद में इसे घटाकर 40 प्रतिशत किया जाएगा. भारत कारों पर भी अपने टैरिफ, जो 100 प्रतिशत से अधिक हैं, को कोटा के तहत 10 प्रतिशत तक घटाएगा. इसके बदले ब्रिटेन ने कपड़ों, जूतों और झींगे सहित खाद्य उत्पादों पर टैरिफ कम कर दिए हैं.

ब्रिटिश सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में यूके और भारत के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार 58 अरब डॉलर का रहा. इससे भारत यूके का 11वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना. यह व्यापार समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब कई देश अपने गठबंधनों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

ओमान के साथ एफ़टीए
पिछले साल दिसंबर में ही भारत ने ओमान के साथ एफ़टीए किया था. भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कहा ने कहा था कि खाड़ी के इस देश ने अपने 98 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क की पेशकश की है. इनमें रत्न और आभूषण, कपड़ा, प्लास्टिक, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे प्रमुख श्रम-प्रधान क्षेत्र शामिल हैं.

बयान में कहा गया कि नई दिल्ली ने डेयरी, चाय, कॉफी और सोना-चांदी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करते हुए 77.79 प्रतिशत तक टैरिफ कम करने पर सहमति जताई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल के प्रमुख सदस्यों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर के लिए ओमान गए थे.

भारत मध्य-पूर्व के देशों के साथ अपनी रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को मज़बूत करने की भी कोशिश कर रहा है. भारत पहले ही संयुक्त अरब अमीरात के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है और गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों के साथ एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है.

2024-25 में ओमान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 10.6 अरब डॉलर था. हालांकि भारत के लिए ओमान एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार है. पिछले साल ओमान भारत का चौथा सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता था, जिसमें आयात का 99.9 प्रतिशत लिक्विड नैचुरल गैस थी. इसके बदले भारत मुख्य रूप से कृषि उत्पाद, खनिज तेल, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन और फार्मास्यूटिकल्स ओमान को भेजता है.

आगे कनाडा और ब्राज़ील
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा अगले महीने 19 फ़रवरी को भारत के दौरे पर आ रहे हैं. हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति लूला से फोन पर बात हुई थी. इसके बाद ही लूला ने भारत दौरे की घोषणा की थी. ब्राज़ील और भारत दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं. दोनों देश ट्रंप के टैरिफ़ का सामना कर रहे हैं.

इसके अलावा मार्च में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भारत के दौरे पर आने वाले हैं. मार्क कार्नी ने इसी महीने दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए कहा था कि दुनिया भर के मिडिल पावर वाले देशों को एक साथ आना चाहिए. मार्क कार्नी ने अपने भाषण में भारत का नाम भी लिया था.

मंगलवार को कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन और भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बीच हुई बैठक के बाद साझा बयान में कहा गया है कि कनाडा भारत को अधिक कच्चा तेल, लिक्विड नैचुरल गैस और पेट्रोलियम गैस देगा जबकि भारत कनाडा को रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद देगा.

हॉजसन ने मंगलवार को गोवा में इंडिया एनर्जी वीक के दौरान कहा, "हमें भारत के साथ काम करने का अवसर दिखता है. हम अब पश्चिमी तट तक पाइपलाइनों का निर्माण कर रहे हैं. हम कभी भी अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए नहीं करेंगे. कनाडा पहले अपनी ऊर्जा निर्यात का 98 प्रतिशत एक ही देश को देता था. हम यह निर्भरता कम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."  (bbc.com/hindi)


अन्य पोस्ट