ताजा खबर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 25 जनवरी। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस को कड़े निर्देश देते हुए साफ किया है कि गिरफ्तारी, रिमांड या हिरासत के दौरान संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों से किसी भी प्रकार का विचलन गंभीर विभागीय कार्रवाई को आमंत्रित करेगा। अदालत ने कहा कि पुलिस को अपना अधिकार संयम, जिम्मेदारी और कानून के दायरे में रहकर ही प्रयोग करना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने हिरासत में दुर्व्यवहार और पुलिस की कथित ज्यादती से जुड़े एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि किसी भी स्थिति में नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि छोटे या तुच्छ विवादों में भी संवैधानिक संरक्षण को कम नहीं किया जा सकता।
21 जनवरी को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में किसी भी प्रकार का उत्पीड़न या प्रताड़ना पूरी तरह अस्वीकार्य है। अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए कि वे अपने अधीन सभी इकाइयों को स्पष्ट स्थायी निर्देश जारी करें, ताकि अवैध हिरासत, अनावश्यक हथकड़ी, सार्वजनिक परेड या मानसिक-शारीरिक अपमान जैसी घटनाएं न हों।
संबंधित याचिका दुर्ग जिले के भिलाई के पांच निवासियों ने दायर की थी। उनका आरोप था कि अक्टूबर 2025 में सिनेमा हॉल के भीतर मामूली कहासुनी के बाद स्मृति नगर चौकी पुलिस ने उनके साथ मनमानी की। याचिकाकर्ताओं ने अवैध हिरासत, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना, हथकड़ी लगाने और सार्वजनिक रूप से घुमाने जैसे गंभीर आरोप लगाए।
राज्य की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने आरोपों से इनकार किया। सरकार ने कहा कि पुलिस कार्रवाई एक महिला की लिखित शिकायत के आधार पर की गई थी। पुलिस महानिदेशक ने अपने शपथपत्र में दावा किया कि सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया, मेडिकल जांच कराई गई और सार्वजनिक परेड का आरोप पुलिस वाहन में आई तकनीकी खराबी से जुड़ा भ्रम है। संबंधित थाना प्रभारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात भी कही गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ-साथ पुलिस को संवैधानिक आदेशों और न्यायिक मिसालों का पालन करना अनिवार्य है। अदालत ने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी और पुलिसिंग पूरी तरह पेशेवर, जवाबदेह और कानूनसम्मत होगी।


