ताजा खबर
छत्तीसगढ़ के अधिकतर शहरों में खेल मैदान या उद्यान में कसरत की मशीनें लगाई गई हैं। कई जगहों पर ये मशीनें शानदार हालत में हैं, और काम कर रही हैं, कई जगहों पर लोगों ने इस बात को अपना राष्ट्रीय अपमान माना कि कोई सार्वजनिक सहूलियत बर्बाद हुए बिना खड़ी है, और वे खाली बैठे हैं। हिन्दुस्तानियों का आत्मसम्मान, उनका स्वाभिमान, और उनकी सांस्कृतिक पहचान को कई बातों से तुरंत चोट लगती है। इनमें किसी जगह का साफ-सुथरा रहना सबसे ऊपर है जो कि उन्हें राष्ट्रीयता के लिए एक बड़ी चुनौती लगती है। जिस तरह मन में राष्ट्रीयध्वज के लिए सम्मान होना चाहिए, बाकी तमाम राष्ट्रीय प्रतीकों पर मान होना चाहिए, उसी तरह सार्वजनिक जगहों का गंदा होना भी राष्ट्रीयता की भावना का एक हिस्सा है, और इसके लिए लोग खूब मेहनत करते दिखते हैं। पेशाबघरों में पखाना कर देना, पखानों में नल को तोड़ देना, और दस बरस के बच्चों तक के लिए बनाए गए झूलों पर मोटे-तगड़े अधेड़ लोगों का झूलना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। फिर चौराहों पर लालबत्ती का विरोध मन में इतना होता है कि लोग तुरंत ही गाडिय़ों के दरवाजे खोलकर सडक़ों पर खूब सारी पीक उगलना शुरू कर देते हैं, और जाहिर है कि इतनी पीक के लिए मुंह में तम्बाकू तो भरकर रखना ही होता है। आखिर ट्रैफिक पुलिस की यह मजाल कैसे हो गई कि वह लालबत्ती दिखाकर हिन्दुस्तानियों को रोके, पुलिस के इस दुस्साहस पर खासी मात्रा में पीक उगल देना भारतीयों की बगावत की राष्ट्रीय भावना का एक हिस्सा है।
सार्वजनिक जगहों पर अगर लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां लगी हैं, तो एक पर खुद बैठकर बाकी दोनों तरफ अपने सामान रख देना सार्वजनिक सम्पत्ति को अपना मानने के आत्मविश्वास का एक हिस्सा रहता है। जिन्हें सिर्फ एक कुर्सी नसीब हो, उनका आत्मविश्वास डोलने लगता है, और मन में हीनभावना घर करने लगती है। फिर जब बस स्टैंड, स्टेशन, या एयरपोर्ट पर ऐसी भरी हुई कुर्सियों के बीच किसी आकर्षक व्यक्तित्व का पहुंचना होता है, तो लोग अपने बगल की कुर्सी से सामान बिजली की रफ्तार से उठाने लगते हैं, मानो वह आकर्षक व्यक्तित्व को न्यौता दिया जा रहा हो। बाकी अनाकर्षक लोग कहीं फर्श पर अपनी जगह ढूंढ सकते हैं। यह सिलसिला देश की सरहदों तक ही कायम रहता है, जब भारतीय संस्कृति से लबालब लोग दूसरे देशों को जाते हैं, तो वहां गोरी और अंग्रेजी हिकारत की दहशत में राष्ट्रीयता की ये हरकतें छूट जाती हैं। कहीं अंग्रेजी में गोरी डांट न पड़ जाए, यह डर अंग्रेजों की गुलामी खत्म होने की पौन सदी बाद भी दूसरे देश पहुंचने पर लौट आता है।
सार्वजनिक जगहों पर लगी कसरत की मशीनों पर लोग जोड़ों में बैठ जाते हैं, और उनका बेंच की तरह इस्तेमाल करते हैं कि बाद में आने वाले कोई लोग कहीं उन पर कसरत न कर लें। उन लोगों की चर्बी पर रहम करते हुए मशीनों पर यह कब्जा करने के लिए अगर एक से अधिक लोग नहीं हैं, तो अकेले लोग भी किसी दूसरी मशीन की सीट पर अपनी जैकेट रख देते हैं, पानी की बोतल, मोबाइल फोन, या चाबियां रख देते हैं कि लोग कहीं अधिक कसरत न कर लें। कुछ लोग सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध ऊंची आवाज में मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं कि आसपास के दूसरे लोगों की बोरियत खत्म होती रहे, और वे लोग भी यह सुनते रहें कि एक शहर से बात करते हुए वे अपने आपको कैसे किसी और शहर में बताते रहते हैं। ऐसे सार्वजनिक झूठ की नुमाइश के बिना लोगों को लगता है कि वे अपनी संस्कृति भूल रहे हैं। लोग और चाहे कोई भी गलती करें, गलत काम करें, वे संस्कृति को भूलने का जुर्म नहीं करते, संस्कृति है तो सब है। देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों की नकल करके न तो साफ-सफाई रखने जैसी गुलाम मानसिकता दिखानी चाहिए, और न ही वक्त के पाबंद रहकर अपने को अंग्रेजों का पिछलग्गू साबित करने की गलती हिन्दुस्तानी नहीं करते।
एक बार फिर कसरत की मशीनों पर चलें, तो उन्हें किसी कील से, किसी और औजार से नुकसान पहुंचाकर लोग एक बार फिर यह भरोसा कर लेते हैं कि यह सारा सामान उन्हीं की सहूलियत के लिए लगाया गया है, महज चर्बी को भगाने के लिए नहीं। विश्वविद्यालय कैम्पस में पढ़े-लिखे समझे जाने वाले छात्रों की बेंच पर हिटलर की तारीफ कुरेद दी जाती है, और ऐसा करके लोग यह भरोसा पाते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अभी कायम है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत मायने रखती है, लोग रात-बिरात अपने घर लौटते हैं तो दरवाजा या गेट खुलवाने के लिए अपने दुपहियों या चौपहियों की अभिव्यक्ति को जोर-जोर से बजाते हैं ताकि घरवाले आकर खोलें, और साथ-साथ आसपास के पूरे इलाके को यह पता लग जाए कि अभिव्यक्ति की आजादी देश में बाकी है।
सुबह-शाम घूमने वाले लोग, या किसी सडक़-चौराहे पर अनायास ही मिल जाने वाले लोग इतनी जोर-जोर से अपनी विचारधारा का प्रदर्शन करते हैं कि असहमत विचारधारा दुबककर निकल जाए। लोग अपने घरों में बैठे हुए भी आसपास के लोगों की निपट-बेवकूफी की नुमाइश को कानों से देख सकते हैं, और अगले दिन उसी वक्त ऐसी मोबाइल नुमाइश चलते हुए उसी जगह पर आकर फिर मुफ्त का शो करने लगती है। लोग अपने घरों से दूर किसी जगह जाकर कुत्तों, गाय, और सांड को खिलाते हैं, अपने घर पर ऐसा जमघट नहीं लगने देते। इसी तरह बेवकूफी की बातें करने वाले लोग छोटे-छोटे समूह बनाकर दूसरों के घरों के सामने, या किसी मोड़ पर, किसी पेड़ के साये में, या किसी चबूतरे पर बैठकर दिव्य ज्ञान को बघार लगाते हैं, ताकि आसपास के जिन लोगों को मूर्खता से वास्ता कम पड़ा हो, वे भी फायदा पा सकें।
हिन्दुस्तान के लोग अपने सार्वजनिक बर्ताव को लेकर एकदम साफ रहते हैं, पारदर्शी, कमर कसे हुए, और बेझिझक। वे अपने नाजायज अधिकारों की नुमाइश करते हुए कभी भी दूसरों के जायज अधिकारों पर नजर डालने की जहमत नहीं उठाते। ऐसी चूक करने से अपना मकसद धरा रह जाता है, अपनी संस्कृति की उपेक्षा हो जाती है, और आत्मकेन्द्रित-आत्ममुग्धता बुरा मानती है। इसलिए लोग सार्वजनिक जगहों पर तमाम किस्म के नाजायज हक का इस्तेमाल करते हुए एक बार फिर अपने को यह भरोसा दिलाते हैं कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है, सार्वजनिक जगहें उनके बाप के बाप की हैं। अब जिन लोगों को यह बात मंजूर न हों, उन्हें सार्वजनिक जगहों से दूर रहना चाहिए।
हमने एआई से पूछा कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारतीयों में सबसे बड़ी सांस्कृतिक एकता क्या है, कौन सी बात है जो क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, और रंग से परे एक सरीखी है? एआई ने काफी सोच-विचारकर बताया कि गंदगी अकेली ऐसी चीज है जिस पर पूरा देश एक साथ खड़े रहता है, गंदा रहना, गंदगी फैलाना, और गंदगी के बीच जीने की आदत डाल लेना पूरे देश में एक समान है। अभी देश में राष्ट्रीय सामानों की कोई फेहरिस्त नहीं बनी है, वरना गंदगी को राष्ट्रीय पदार्थ घोषित किया जा सकता है, जो कि तमाम जगहों पर मौजूद और उपलब्ध है। लोगों को हमारी लिखी हुई कुछ गिनी-चुनी बातों से परे भी यह देखना चाहिए कि भारत में सार्वजनिक जगहों पर, सार्वजनिक जीवन में लोगों के बर्ताव में राष्ट्रीयता की और कौन-कौन सी बातें दिखाई पड़ती हैं। भारत के सामाजिक जीवन का ऐसा अध्ययन लोगों को अपने देश को समझने में, और उस पर गर्व करने में मदद करेगा।


