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जम्मू-कश्मीर में साइबर पुलिस की ओर से पत्रकारों को तलब किए जाने पर और उनसे हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने के आरोपों पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने प्रतिक्रिया दी है.
पिछले हफ़्ते जम्मू-कश्मीर में पुलिस ने मस्जिदों की प्रबंधन समितियों के सदस्यों और उनके परिवारों की सभी निजी जानकारियां इकट्ठा करने का अभियान शुरू किया.
कई बड़े अख़बारों ने यह ख़बर छापी तो श्रीनगर में मौजूद उनके संवाददाताओं को साइबर पुलिस ने तलब किया. इनमें इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता बशारत मसूद और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संवाददाता आशिक़ हुसैन के नाम भी शामिल हैं.
इस मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने एक बयान जारी कर कहा, "पत्रकारों को मनमाने ढंग से तलब करना, पुलिस की ओर से पूछताछ करना और दबाव में हलफ़नामे लेने की कोशिश करना, मीडिया को उसके वैध कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने के लिए किया गया ज़बरदस्ती और डराने-धमकाने जैसा क़दम है."
बयान में कहा गया, "रिपोर्ट्स में कहा गया कि पत्रकारों पर इस बात का दबाव बनाया गया कि वे ऐसे बॉन्ड या हलफ़नामों पर हस्ताक्षर करें, जिनमें यह कहा गया हो कि वे किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जिससे 'शांति भंग' हो, चाहे इसका जो भी मतलब या संकेत हो. हालांकि पुलिस प्रशासन ने अभी तक इस तरह की कार्रवाई के कारणों को स्पष्ट नहीं किया है."
एडिटर्स गिल्ड ने पुलिस और अधिकारियों से ऐसी कार्रवाइयां नहीं करने की अपील की है, जो अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमित करती हैं और मीडिया को उसके मूल कामकाज से रोकती हैं.
एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि लोकतंत्र में ऐसी मनमानी कार्रवाइयों के लिए कोई जगह नहीं हो सकती, जहां मीडिया एक अहम स्तंभ है.
पत्रकारों को पुलिस की ओर से तलब किए जाने के मामले पर उनके अख़बारों ने भी बयान जारी किए हैं. (bbc.com/hindi)


