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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेकसूर साबित होने में कटी पूरी जिंदगी, उसे क्या मुआवजा मिले?
17-Jan-2026 6:20 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बेकसूर साबित होने में कटी पूरी जिंदगी, उसे क्या मुआवजा मिले?

जर्मनी की खबर है कि 2008 में एक बूढ़ी महिला की देखभाल करने वाले आदमी को महिला के बाथटब में डूबकर मर जाने पर 2010 में उम्रकैद सुनाई गई थी। वह 13 साल जेल में रहा। 2023 में उसके मामले की दुबारा सुनवाई हुई, तो उसे बरी किया गया कि अदालत से कई गलतियां हुई थी। गलत सजा पर जर्मनी में हर दिन करीब 65 सौ रूपए मुआवजे का प्रावधान है, इस आधार पर उसे करीब पांच हजार दिन की कैद के लिए सवा तीन करोड़ रूपए से अधिक का मुआवजा मिला। इस आदमी ने राज्य शासन के खिलाफ एक मुकदमा किया कि गलत सजा की वजह से उसकी नौकरी चली गई, जिंदगी बर्बाद हो गई, और परिवार टूट गया, इसलिए उसे 6.8 करोड़ रूपए अतिरिक्त मुआवजा दिया जाए। अभी 14 जनवरी को बवेरिया राज्य सरकार ने उसे 11.7 करोड़ रूपए का मुआवजा देने की घोषणा की, और यह मुआवजा शुरू में उसे कानूनी प्रावधान के मुताबिक मिले सवा तीन करोड़ रूपए के अतिरिक्त है। इस बीच राज्य सरकार ने उसे जेल में रहने-खाने का करीब 90 लाख रूपए का बिल भी भेज दिया था, लेकिन जनता और मीडिया में बड़े विरोध के बाद सरकार ने यह वसूली नोटिस वापिस लिया, और उसे उसकी मांग से अधिक मुआवजा दिया। जर्मनी में गलत सजा के लिए हर दिन 75 यूरो का मुआवजा तय है, लेकिन दूसरे नुकसान, नौकरी, मानसिक पीड़ा के लिए अतिरिक्त दावा करना पड़ता है।

 
अब जर्मनी के इस मामले पर लिखने की एक वजह आज इसलिए भी आई कि छत्तीसगढ़ में बिलासपुर हाईकोर्ट ने 19 साल पुराने एक रेप केस में आरोपी को बरी कर दिया गया, क्योंकि रेप-पीडि़ता का बयान विश्वसनीय नहीं पाया गया। अदालत ने यह भी कहा कि मेडिकल जांच में भी डॉक्टरों को कोई भीतरी-बाहरी चोट नहीं मिली, और मेडिकल रिपोर्ट में कोई निश्चित राय नहीं दी गई थी। पीडि़ता की सास ने भी यह माना कि उसी के कहने से पीडि़ता ने यह रिपोर्ट लिखाई थी। इसमें आरोपी को जिंदगी में पहली बार देखना बताया गया था, जबकि परिवार और पड़ोसियों के बयान के मुताबिक आरोपी पड़ोसी ही था, और इस घर में उसका आना-जाना था। हाईकोर्ट ने तो इस व्यक्ति को रिहा कर दिया, लेकिन 2007 में अंबिकापुर की एसटी-एससी अदालत ने उसे बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सात साल की सश्रम कैद सुनाई थी। अब चूंकि हाईकोर्ट इस मामले में एक स्पष्ट फैसला दे चुका है, इसलिए हम इस पर लिख रहे हैं कि 19 बरस तक यह आरोपी बलात्कार का आरोप भी झेलते रहा, और 2007 से वह एक सजायाफ्ता भी था, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अब पुलिस से रोज मिलने वाले, और अखबारों में छपने वाले समाचारों को देखें, तो उनमें छेडख़ानी या बलात्कार के आरोपी की गिरफ्तारी के साथ ही उसकी फोटो जारी की जाती है, नाम-पता जारी किया जाता है। इसके बाद मुकदमा चलता है, बरसों बाद सजा या रिहाई होती है, फिर ऊपर की अदालत तक मामला जाता है, वहां फैसला होता है, और कुछ गिने-चुने मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक अपील होती है।

 

अब सवाल यह उठता है कि भारत के कानून में किसी को सजा देने के लिए उसका जुलूस निकालने, उसकी फोटो सहित समाचार जारी करने का कोई प्रावधान नहीं है। पुलिस के ऐसा करने से आरोपी और उसके परिवार की, उसके संस्थान की जो बदनामी होती है, उसमें लोगों के कारोबार खत्म हो जाते हैं, रिश्ते टूट जाते हैं, नौकरियां छूट जाती हैं। भारत में जगह-जगह पुलिस पर साजिश के आरोप भी लगते हैं, और अभी दो दिन पहले मध्यप्रदेश में एक ऐसा पुलिस इंस्पेक्टर मिला है जिसने अपने ड्राइवर और रसोईये को ही सौ से अधिक मामलों में गवाह बना लिया था। नाराज अदालत ने इसके खिलाफ आदेश दिया है। भारत में बलात्कार के सौ मामलों में से करीब 23 मामले ही सजा दिलवा पाते हैं, बाकी अनसुलझे रह जाते हैं, या आरोपी बरी हो जाते हैं। पहले के बरसों में सजा का प्रतिशत कुछ अधिक था, लेकिन अब यह 23 फीसदी के भी नीचे आ गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अदालती सजा मिलने के पहले जो सामाजिक बदनामी की सजा मिलती है, उस नुकसान की भरपाई कैसे हो सकती है? जिन लोगों को जेल के भीतर लंबे समय तक रहना पड़ता है, उनके बेकसूर रिहा होने पर उनको क्या मुआवजा दिया जा सकता है?
 
हमने पहले भी इस बात को उठाया था कि राष्ट्रीय स्तर पर एक मुआवजा बीमा योजना लागू करनी चाहिए, जो कि शुरूआत में कम से कम गरीब लोगों के लिए ही लागू कर दी जाए, जो कि अपने परिवार के लिए एक जरूरी कमाऊ सदस्य रहते हैं। अब बिलासपुर हाईकोर्ट की जिस खबर को लेकर हम यहां लिख रहे हैं, उस आदमी को बलात्कार का आरोप, अदालती कार्रवाई, और कैद मिलाकर 19 बरस प्रताडऩा झेलनी पड़ी, इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले में यह आया कि शिकायत विश्वसनीय नहीं थी। अब इस आदमी को करीब दो दशक जो सामाजिक अपमान झेलना पड़ा, वह तो अब किसी तरह से दूर हो भी नहीं सकता। ऐसे में दो बातें हो सकती हैं, पहली बात तो यह कि निचली अदालत से सजा हो जाने के पहले तक पुलिस किसी आरोपी के नाम जारी न करे, फोटो जारी न करे। मीडिया इस बात को बहुत नापसंद करेगा, लेकिन प्राकृतिक न्याय के लिए ऐसा जरूरी लगता है। दूसरी बात यह कि एक राष्ट्रीय मुआवजा योजना बेकसूर साबित हुए कैदियों के लिए लागू की जाए, और सरकार को जरूरत रहे तो किसी बीमा योजना के तहत इसका इंतजाम करे। जर्मनी की यह ताजा मिसाल सामने है, और हर देश को मानवाधिकारों के मामले में, लोकतंत्र के मामले में, अपने से अधिक विकसित देशों की मिसालों से कुछ सीखना चाहिए। बरसों की प्रताडऩा के बाद बेकसूर साबित हुए लोगों के नजरिए से इस मुद्दे को देखिए, तो इसका महत्व समझ आएगा।

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