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मेडिकल कॉलेजों में पीपीपी मॉडल को लेकर आंध्र में सियासी टकराव तेज
19-Dec-2025 10:59 PM
मेडिकल कॉलेजों में पीपीपी मॉडल को लेकर आंध्र में सियासी टकराव तेज

विशेष रिपोर्ट : दिनेश आकुला

अमरावती, 19 दिसंबर। आंध्र प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल को लेकर सियासी संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। यह मुद्दा सत्तारूढ़ टीडीपी नीत गठबंधन और विपक्षी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के बीच सीधी टकराव की वजह बन गया है। जहां विपक्ष इसे निजीकरण की ओर बढ़ाया गया कदम बता रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि वर्षों से अधूरी पड़ी मेडिकल कॉलेज परियोजनाओं को पूरा करने और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए पीपीपी ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।

विवाद की जड़ राज्य सरकार का 10 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल के तहत विकसित करने का फैसला है। ये कॉलेज उन 17 मेडिकल कॉलेजों में शामिल हैं जिन्हें केंद्र सरकार ने वाईएसआरसीपी सरकार के कार्यकाल के दौरान मंजूरी दी थी, लेकिन कई वर्षों बाद भी ये परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं।

गुरुवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस जगन मोहन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस अब्दुल नज़ीर से मुलाकात की और पीपीपी मॉडल के खिलाफ एक करोड़ से अधिक हस्ताक्षर सौंपे। वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ राजभवन पहुंचे जगन ने एक विस्तृत ज्ञापन भी सौंपा और कहा कि यह अभियान जनता की व्यापक असहमति को दर्शाता है और इसे सरकारी मेडिकल कॉलेजों के निजीकरण के खिलाफ सामूहिक जनमत के रूप में देखा जाना चाहिए।

पार्टी नेताओं के अनुसार, हस्ताक्षरों से भरे दस्तावेजों को लेकर कई वाहन विजयवाड़ा के लोक भवन पहुंचे, जहां राज्यपाल कार्यालय के अधिकारियों ने उनकी जांच और सत्यापन किया। जगन ने इसे राज्यव्यापी शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन बताया और कहा कि निजीकरण से सस्ती चिकित्सा और मेडिकल शिक्षा कमजोर होगी, जिसका सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा जो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं।

इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री ने बी आर आंबेडकर सामाजिक न्याय स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि यह विरोध संविधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और सभी के लिए सुलभ स्वास्थ्य सेवा के अधिकार से जुड़ा है। बाद में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपना फैसला वापस नहीं लेती है तो वाईएसआरसीपी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। उनका आरोप था कि पीपीपी मॉडल के तहत सरकारी जमीन और संसाधन तो सरकार के पास रहेंगे, लेकिन प्रबंधन और मुनाफा निजी हाथों में चला जाएगा।

जगन ने कहा कि वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान स्वीकृत 17 मेडिकल कॉलेजों का उद्देश्य कम शुल्क पर मेडिकल सीटें बढ़ाना था। उन्होंने सवाल उठाया कि करीब दो लाख करोड़ रुपये के बजट वाली मौजूदा सरकार इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अनुमानित पांच हजार करोड़ रुपये खर्च करने से क्यों कतरा रही है। पीपीपी मॉडल को उन्होंने एक बड़ा घोटाला करार दिया और कहा कि सत्ता में लौटने पर उनकी पार्टी इसे खत्म कर देगी।

सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन ने विपक्ष के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। टीडीपी के प्रवक्ता और एपी स्वच्छ आंध्र निगम के अध्यक्ष कोम्मारेड्डी पट्टाभिराम ने हस्ताक्षर अभियान को राजनीतिक दिखावा बताया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वाईएसआरसीपी सांसद एम गुरुमूर्ति, जो संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति के सदस्य हैं, राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल कॉलेजों के लिए पीपीपी मॉडल का समर्थन कर चुके हैं। पट्टाभिराम ने वाईएसआरसीपी शासनकाल में मेडिकल कॉलेजों के लिए आवंटित धन के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया।

एनडीए नेताओं ने भी इसी तरह की बातें दोहराईं। 20 सूत्री कार्यक्रम के अध्यक्ष लंका दिनाकर ने कहा कि वाईएसआरसीपी जानबूझकर पीपीपी को निजीकरण के रूप में पेश कर भ्रम फैला रही है। उन्होंने कहा कि आरोग्यश्री और आपातकालीन एंबुलेंस सेवाएं जैसी कई स्वास्थ्य योजनाएं वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान पीपीपी मॉडल पर ही चल रही थीं, लेकिन उन्हें सरकारी योजनाओं के रूप में प्रचारित किया गया।

मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने सचिवालय में आयोजित पांचवें कलेक्टर सम्मेलन में इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पीपीपी मॉडल के बावजूद मेडिकल कॉलेज सरकारी ही रहेंगे और उनके संचालन, नियमों, शैक्षणिक मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े सभी फैसले सरकार ही करेगी।

नायडू ने कहा कि इन मेडिकल कॉलेजों की 70 प्रतिशत सेवाएं एनटीआर वैद्य सेवा योजना के तहत दी जाएंगी और मेडिकल सीटों की संख्या भी बढ़ेगी। उन्होंने निजीकरण के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पीपीपी को राजनीतिक कारणों से गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार भी कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल अपना रही है और उन्हें आलोचना से डर नहीं है।

पूर्व सरकार पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि विशाखापत्तनम में ऋषिकोंडा संरचना पर खर्च किए गए 500 करोड़ रुपये से दो मेडिकल कॉलेज बनाए जा सकते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी सरकार ने राज्य को गंभीर वित्तीय संकट में डाल दिया, जहां कभी कभी वेतन तक देने की स्थिति नहीं रही और 13 से 14 प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज लिया गया।

टीडीपी सांसद केसिनेनी शिवनाथ ने दोनों सरकारों के कामकाज की तुलना करते हुए कहा कि वाईएसआरसीपी अपने कार्यकाल में 17 मेडिकल कॉलेजों का वादा पूरा करने में असफल रही। उनके अनुसार, लगभग 85 हजार करोड़ रुपये की जरूरत के मुकाबले पिछली सरकार ने चार वर्षों में एक हजार करोड़ रुपये से भी कम खर्च किया, जिससे परियोजनाएं अधूरी रहीं।

उन्होंने कहा कि पीपीपी मॉडल को आर्थिक मामलों के विभाग ने अधिसूचित किया है, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने इसकी सिफारिश की है और संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति ने इसका समर्थन किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी पीपीपी को निजीकरण बताकर छात्रों और अभिभावकों को गुमराह कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वामित्व और नियामक नियंत्रण सरकार के पास ही रहेगा और निजी भागीदार केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण में सहयोग करेंगे। उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत सीटें सरकारी कोटे में रहेंगी, आरक्षण व्यवस्था यथावत रहेगी और 70 प्रतिशत अस्पताल बेड आयुष्मान भारत के लाभार्थियों के लिए आरक्षित होंगे।

सरकार ने जनता की शंकाओं को दूर करने के लिए विस्तृत स्पष्टीकरण भी जारी किए हैं। सरकार के अनुसार पीपीपी और निजीकरण एक समान नहीं हैं। जमीन और परिसंपत्तियों का स्वामित्व सरकार के पास ही रहेगा, शैक्षणिक नियंत्रण डॉ. एनटीआर स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के अधीन रहेगा और सभी संस्थान राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मानकों का पालन करेंगे। कन्वीनर कोटे की फीस आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा विनियामक एवं निगरानी आयोग द्वारा तय की जाएगी और आरक्षण नीतियों में कोई बदलाव नहीं होगा।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पीपीपी मॉडल को अपनाना राज्य की वित्तीय वास्तविकताओं को देखते हुए एक व्यावहारिक फैसला है। एक मेडिकल कॉलेज को सालाना करीब एक हजार करोड़ रुपये के संचालन खर्च की जरूरत होती है, जिसे अकेले सरकार के लिए वहन करना संभव नहीं है। सरकार का तर्क है कि कड़े नियमों के तहत निजी भागीदारी से अधूरी परियोजनाओं को पूरा किया जा सकता है, मेडिकल सीटें बढ़ाई जा सकती हैं और अस्पताल सेवाओं का विस्तार किया जा सकता है, बिना सार्वजनिक हित से समझौता किए।

जैसे जैसे विवाद आगे बढ़ रहा है, पीपीपी मुद्दा राज्य की राजनीति में विश्वसनीयता की बड़ी परीक्षा बन गया है। विपक्ष इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा की लड़ाई बता रहा है, जबकि सरकार इसे वर्षों की देरी और अधूरे वादों को सुधारने का जरूरी कदम मान रही है। कानूनी लड़ाइयों और राजनीतिक बयानबाजी के बीच आने वाले महीने तय करेंगे कि आंध्र प्रदेश टकराव की राजनीति से निकलकर अपनी लंबे समय से लंबित मेडिकल बुनियादी ढांचे को पूरा कर पाता है या नहीं।


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