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21 साल पुराने किडनैपिंग, रेप मामले का अपराधी गिरफ्तार
04-Dec-2025 12:00 PM
21 साल पुराने किडनैपिंग, रेप मामले का अपराधी गिरफ्तार

वर्षों से छिपता फिर रहा था एडीजे कोर्ट की सजा के बाद

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, 4 दिसंबर। मरवाही थाना क्षेत्र के 21 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म के मामले में लंबे समय से फरार चल रहे आरोपी 46 वर्षीय रोहित कुमार परस्ते को पुलिस ने आखिरकार गिरफ्तार कर लिया। एडीजे कोर्ट पेंड्रा रोड ने आरोपी को 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन फैसला आते ही वह पुलिस की पकड़ से बचकर फरारी काट रहा था।

मामला साल 2004 का है, जब मरवाही थाने में धारा 363, 366 और 376 के आरोपों पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पीड़िता उस समय नाबालिग थी। आरोपी की लगातार गैरहाजिरी पर हाईकोर्ट ने कई बार गैर-जमानती वारंट जारी किए, इसके बावजूद वह पकड़ में नहीं आ रहा था।

हाल ही में फिर से जारी वारंट की तामिली के लिए मरवाही पुलिस ने लोहारी इलाके में दबिश देकर आरोपी को हिरासत में ले लिया। इसके बाद रोहित परस्ते को एफटीसी कोर्ट पेंड्रारोड में पेश किया गया, जहां से उसे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से जारी गिरफ्तारी जेल वारंट का पालन करते हुए जेल भेज दिया गया।

रोहित परस्ते का आपराधिक रिकॉर्ड लंबा है। उसके खिलाफ मारपीट, धमकी, गाली-गलौज और धोखाधड़ी के कई केस दर्ज हैं। उस पर धारा 107, 116 और 110 की फौजदारी कार्रवाई भी कई बार की जा चुकी है। लगातार अपराधों में लिप्त रहने पर पुलिस ने उसे वर्षों पहले गुंडा-बदमाश श्रेणी में भी शामिल किया था।

इस गिरफ्तारी अभियान में थाना प्रभारी मरवाही एवं टीम आरक्षक नारद जगत, मनोज मरावी, अनुरूप पैकरा, अमितेश पात्रे और महिला आरक्षक कमलेश जगत की अहम भूमिका रही।

दो साल सेवा पूरा करने की मांग वाली 27 याचिकाएं खारिज की हाईकोर्ट ने

अदालत बोली– सिर्फ असंतुष्ट होने से बराबरी का दावा नहीं कर सकते

बिलासपुर, 4 दिसंबर। स्कूल शिक्षा विभाग में दो वर्ष की सेवा पूरी करने के आधार पर संलग्न करने की मांग को लेकर दायर 27 अलग-अलग याचिकाओं को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सिर्फ नाराजगी, या दूसरों जैसा लाभ मांगना, ये बातें अपने आप में कोर्ट के विशेष अधिकारों के इस्तेमाल का आधार नहीं बन सकतीं।

जस्टिस ए.के. प्रसाद ने कहा कि जब तक याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर दें कि प्रक्रिया में कोई मनमानी, भेदभाव या कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है, तब तक कोर्ट दखल नहीं दे सकता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ज्यूडिशियल रिव्यू का दायरा सिर्फ प्रक्रिया की जांच तक सीमित है, न कि फैसले के फायदे-नुकसान देखने तक।

अदालत ने कहा कि दो साल की सेवा से सीनियारिटी तय करने की मांग मान्य नहीं है। सीनियारिटी हमेशा कानूनी नियमों और कैडर में शामिल होने की वास्तविक तारीख से तय होती है। याचिकाकर्ताओं को 2018 की पॉलिसी के तहत आठ वर्ष सेवा पूरी करने के बाद ही शिक्षा विभाग में शामिल किया गया था, इसलिए सीनियारिटी में बदलाव संभव नहीं।

कोर्ट ने कहा कि 23 जुलाई 2020 की नीति में किसी प्रकार की मनमानी या गैर-कानूनी तत्व नहीं है। यह शासन का विवेकपूर्ण निर्णय है और याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता।

कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि काल्पनिक एब्जॉर्शन, सीनियरिटी रीसेट, पे-स्केल बदलाव जैसी मांगें पूरी तरह असंगत हैं।


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