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तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार साय को मिली राहत
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
अंबिकापुर, 21 नवंबर। प्रीति श्रीवास्तव हत्याकांड से संबंधित दिसंबर 1998 में प्रकाशित एक रिपोर्ट पर लगभग 26 वर्ष बाद अदालत ने एक समाचार पत्र के मालिकों और तत्कालीन संपादक पर जुर्माना लगाया है। इस मामले में मध्यप्रदेश के तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार साय को राहत मिली है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दैनिक ‘नवभारत’ में प्रकाशित खबर में नंदकुमार साय के बयान को तोड़मरोडक़र प्रस्तुत किया गया और ऐसी बातें जोड़ी गईं, जिनका उन्होंने उल्लेख नहीं किया था। अदालत के अनुसार, इस रिपोर्ट से सरगुजा राजपरिवार की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ा, इसलिए यह समाचार मानहानि की श्रेणी में आता है।
प्रथम व्यवहार न्यायाधीश पल्लव रघुवंशी ने अपने निर्णय में नवभारत समूह के प्रकाश माहेश्वरी, विनोद माहेश्वरी, प्रफुल्ल माहेश्वरी तथा तत्कालीन संपादक, प्रकाशक और मुद्रक बजरंग केडिया को दोषी ठहराते हुए एक रुपये अर्थदंड का आदेश दिया।
3 दिसंबर 1998 को अंबिकापुर के गल्र्स कॉलेज परिसर में छात्रा प्रीति श्रीवास्तव की जीप चढ़ाकर हत्या की घटना दर्ज की गई थी। 8 दिसंबर को संगम चौक अंबिकापुर में आयोजित सभा में नंदकुमार साय ने कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर प्रश्न उठाए थे।
अगले दिन प्रकाशित समाचार में आरोप लगाया गया था कि हत्या के आरोपी सरगुजा राजपरिवार से जुड़े हैं और पैलेस के प्रभाव से जांच प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट में यह भी जोड़ा गया कि गहन जांच होने पर अन्य प्रकरण भी सामने आ सकते हैं तथा उस समय की सरकार में सामंती प्रवृत्तियों के सक्रिय होने का उल्लेख किया गया था।
इन्हीं कथनों के आधार पर सरगुजा राजपरिवार की ओर से मानहानि का दावा दायर किया गया।
सुनवाई के दौरान नंदकुमार साय ने कहा कि उन्होंने सरगुजा राजपरिवार या महाराज एम.एस. सिंहदेव के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की थी और समाचार पत्र ने उनके भाषण को बढ़ाकर प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्होंने ऐसा बयान दिया होता तो अन्य समाचार माध्यमों में भी इसका उल्लेख होता, जबकि ऐसा नहीं हुआ। साय के अनुसार इससे स्पष्ट है कि रिपोर्ट में तथ्य बदले गए थे।
अदालत ने निर्णय में कहा कि समाचार पत्र ने भाजपा अध्यक्ष के कथनों को बढ़ाया-घटाया और टिप्पणी में ऐसे तत्व शामिल किए जिनके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है। अदालत के अनुसार, इस प्रकाशन से सरगुजा राजपरिवार की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जो मानहानि की स्थिति बनाता है।
लगभग तीन दशक बाद आए इस निर्णय को सरगुजा राजपरिवार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजपरिवार के मुखिया और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव के लिए भी यह निर्णय राजनीतिक और व्यक्तिगत स्तर पर उल्लेखनीय है। अदालत का यह निर्णय उस समय की राजनीतिक टिप्पणियों और पत्रकारिता में तथ्यों के उपयोग को लेकर एक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है।


