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छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 12 नवंबर। छत्तीसगढ़ में आवारा मवेशियों के कारण बढ़ते सड़क हादसों को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए कहा कि योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन जमीन पर अमल नहीं दिखता।
हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने को कहा था। इसके जवाब में मुख्य सचिव ने 10 नवंबर को शपथपत्र दाखिल किया, जिसमें बताया गया कि 24 और 25 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर सड़क से मवेशी हटाने के फैसले लिए गए हैं।
सरकार ने बताया कि सभी शहरों में कांजी हाउस को सक्रिय किया जा रहा है, खराब केंद्रों की मरम्मत के आदेश दिए गए हैं और शिकायत के लिए दो टोल-फ्री नंबर जारी किए गए हैं- 1100- शहरी क्षेत्रों के लिए तथा 1033- राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सड़कें अंधेरे में हैं, हर दिन हादसे हो रहे हैं और अधिकारी सिर्फ रिपोर्ट भेजकर खानापूर्ति कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि सुरक्षा और मॉनिटरिंग की स्थिति बेहद खराब है।
कोर्ट ने निर्देश दिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन किया जाए और अभियान सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे।
मुख्य सचिव ने बताया कि सरकार एक महीने का विशेष अभियान चलाने जा रही है, जिसमें दिन-रात सड़कों से आवारा पशुओं को हटाया जाएगा। अभियान की जानकारी अखबारों, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से जनता तक पहुंचाई जाएगी। सरकार ने यह भी कहा कि कलेक्टर और संभागायुक्त हर सप्ताह समीक्षा करेंगे, और हादसे रोकने में लापरवाही पाए जाने पर टोल ठेकेदार जिम्मेदार होगा।
याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान बताया कि हाल ही में एक बछड़ा सड़क दुर्घटना में घायल हुआ, लेकिन कॉल करने पर न कोई अधिकारी पहुंचा, न अस्पताल से जवाब मिला। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर इलाज की व्यवस्था नहीं है, तो सरकारी रिपोर्ट झूठी साबित होती है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए राज्य सरकार से कहा है कि शहरों और हाइवे से आवारा पशुओं को अनिवार्य रूप से हटाएं। सभी पशुओं को संयुक्त अभियान चलाकर गौशालाओं में भेजा जाए, रातभर हाईवे पेट्रोलिंग टीम सक्रिय रहे, हर हाईवे पर हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित किए जाएं, कोर्ट ने कहा कि लापरवाही पर अधिकारी खुद जिम्मेदार होंगे।


