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छत्तीसगढ़ एक खोज अट्ठावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देवपुरुष
08-Mar-2022 11:14 AM
छत्तीसगढ़ एक खोज अट्ठावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देवपुरुष

जस्टिस के. एल. पांडेय के समक्ष दिए गए बयान में एक शिक्षा शास्त्री का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा शास्त्री के इस बयान को मैं ज्यों का त्यों यहां उद्धृत कर रहा हूं :

1. दिनांक 25. 3.1966 को लगभग 10:45 बजे दिन को जब मैं अपने निवास स्थान की बैठक में लिखा-पढ़ी का कार्य कर रहा था, मैंने सर्वप्रथम माइक्रोफोन से 144 धारा नगर में लागू होने की उद्घोषणा सुनी। फिर थोड़ी देर बाद धमाकों की आवाजें हुई और राजवाड़ा के दक्षिणी दरवाजे के पास हवा में टियर गैस शेल्स फूटते देखा। मैं दौड़ा-दौड़ा घर के पास के पेट्रोल पंप में फोन करने गया क्योंकि मुझे पुराने राजमहल के विद्यालयों के बच्चों और शिक्षकों के विषय में घोर चिंता हुई। पुराने राजमहल के फोन पर थोड़ी-थोड़ी देर में संपर्क स्थापित किया। फिर चिंता, भय, आकुलतावश राजबाड़े के पूर्वी दीवार के पास एक अर्धनिर्मित झोपड़ी पर चढ़कर अंदर का हाल जानने हेतु देखने लगा। उस वक्त राजमहल के सामने के बगीचे में आदिवासियों और पुलिस में संघर्ष छिड़ा हुआ था। धमाकों की आवाजें हो रही थी और आदिवासी वृक्षों व झाड़ियों की आड़ लेकर उत्तर की ओर पीछे हट रहे थे। कुछ भाग रहे थे। एक दो लोग तीर भी चला रहे थे। थोड़ी देर के बाद वहां से उतर कर मैं पुनः अपने घर, सामने की सड़क, पड़ोस की छत आदि से यथासंभव राजवाड़े के भीतर-बाहर की घटना का अवलोकन करने लगा। इस बीच राजमहल के पूर्वी और उत्तरी भू-भाग पर काफी पुलिस वालों का फैलाव हो रहा था। आदिवासी अब बाहर नहीं दिख रहे थे। फिर राजमहल के पिछले भू-भाग बगीचे की ओर टियर गैस शेल्स के फूटने की ध्वनियां हुई, धुवां दिखाई दिया। 

राजवाड़ा के उत्तरी दरवाजे पर तीर से घायल सिपाही को बेदम होते, आदिवासी को पुलिस तथा एक ऑफिसर द्वारा बुरी तरह पिटते, भीतरी हिस्से में एक आदिवासी को दौड़ते और उसके पीछे गोली की आवाज भी मैने अधखुले दरवाजे से देखी सुनी। पुनः लगभग चार बजे के बाद राजमहल के ऊपरी छत पर कई पुलिस वाले दृष्टिगोचर हुए। फिर थोड़ी देर बाद काफी हल्ला-गुल्ला सुनाई दिया।  

माइक से यह भी उद्घोषणा हुई कि महल के भीतर के आदिवासी आत्मसमर्पण कर दें। मुझे समीप की छत पर से यह दृष्टिगोचर हो रहा था कि कुछ आदिवासी नए राजमहल के सामने के एक दरवाजे से निकल कर बाहर आंगन में आ रहे थे और उन्हें बैठा कर, घेर कर काफी पुलिस वाले उन्हें लाठियों से अंधाधुंध मार रहे थे। कोई भी मार से बच कर भागने की कोशिश करता उसके पीछे कई-कई पुलिसवाले दौड़ते और मनमानी पीटते। एक दो भागते हुए आदिवासियों पर गोलियां भी चलाई गई। दृश्य बहुत ही कारुणिक था।


2. संध्या तक यह क्रम चलता रहा। रात्रि में भी रुक-रुक कर कई बार गोलियां चलने की आवाजें आती रहीं। एक गोली की बड़े जोरों की आवाज तड़के सुबह भी आई।

3. प्रातःकाल 26 . 3 . 1966 को माइक से उद्घोषणा के बाद शांतिपूर्ण ढंग से आदिवासियों का आत्मसमर्पण, उनकी गिरफ्तारियां, शाम को श्री प्रवीर चंद्र भंजदेव की शव यात्रा आदि मैंने देखी। शमशान घाट में स्वर्गीय प्रवीर चंद्र भंजदेव के चेहरे को काफी समीप से मैंने देखा। चेहरा विकृत हो गया था। उसमें खून के दाग़ थे।

अब जगदलपुर के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर का बयान भी मैं यहां उद्धृत करना चाहूंगा, जो उन्होंने उस समय पांडेय कमीशन के समक्ष दिया था। 

डॉक्टर द्वारा दिया गया यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है और बस्तर गोलीकांड की सच्चाइयों से पर्दा उठाता है। यह बयान यहां उद्धृत किया जा रहा है ताकि पाठक सच और झूठ का विवेक सम्मत निर्णय स्वयं ले सकें :

1. यह कि मैं दिनांक 25.3. 1966 को लगभग 10.30 बजे व्यवहार न्यायालय आया था।

2. यह कि राजमहल का मुख्यद्वार जो घटनास्थल था, वह सत्र न्यायालय और व्यवहार न्यायालय से लगभग 100 गज की दूरी पर है।

3. यह कि ज्यों ही मैं व्यवहार न्यायालय की ओर जाता हुआ नगर पालिका कार्यालय के समक्ष से गुजरा त्योंहि मैंने एक आरक्षी जीप और मोटर को राजमहल के मुख्य द्वार के समक्ष खड़े होते देखा तथा उनमें से श्री मोहन सिंह इंस्पेक्टर, श्री सिंह ए.डी.एम. जगदलपुर तथा दो या तीन पुलिस इंस्पेक्टर और सशस्त्र सेना के कुछ बंदूकधारी व लाठीधारी जवानों को उतरते हुए मैंने देखा।

4. यह कि उतरने के पश्चात सशस्त्र पुलिस ने स्वयं को दो भागों में बांट कर मुख्य द्वार के दोनों ओर अपनी स्थिति बनाई।

5. यह कि उस समय 20 या 25 आदिवासी महिलाएं दंतेश्वरी मंदिर के समीपस्थ उद्यान के घेरे के पास खड़ी थी जो स्थान राजमहल क्षेत्र के अंतर्गत है। इसके उपरांत मैंने एक जीप को प्रसाद के मुख्य द्वार की ओर नगरपालिका न्यायालय के सामने वाले राजमार्ग से आते देखा। इस जीप द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की 144 धारा का उद्घोष किया जा रहा था। सशस्त्र पुलिस जिसने अपनी स्थिति मुख्य द्वार के दोनों ओर बना ली थी उसने अब मुख्य द्वार के भीतर प्रवेश किया और दंतेश्वरी मंदिर के समक्ष खड़ी हो गई।

6. यह कि उसी समय पुलिस के कुछ सिपाही उद्यान के घेरे के समीप स्थित आदिवासी महिलाओं के समीप गए। इससे आदिवासी महिलाएं राजप्रसाद की ओर भाग गईं।

7. यह कि कुछ क्षण पश्चात पुलिस के अधिकारी तथा सिपाही तीर-तीर चिल्लाते हुए मुख्य द्वार से बाहर
निकले। तत्पश्चात पुलिस ने राजप्रसाद के भीतर मुख्य द्वार से अपनी बंदूकों के द्वारा दो या तीन फायर किए तथा अश्रु गैस छोड़ना प्रारंभ कर दिया।

8. यह कि उसके उपरांत पुलिस के आदमियों ने मुख्य द्वार के भीतर पुनः प्रवेश किया और तुरंत तीर-तीर चिल्लाते हुए बाहर निकल आए। उस समय तक कोई व्यक्ति घायल नहीं हुआ था।

शेष अगले सप्ताह ...


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