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-सुसंस्कृति परिहार
आज 1971 के भारत पाक युद्ध की याद तरोताजा हो आई जब साम्राज्यवादी ताकतें पाकिस्तान के ज़रिए भारत को निशाने पर रखीं थीं। तब भारत के पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान तथा पश्चिम में पश्चिम पाकिस्तान था ऐसा देश जो दो हिस्सों में बंटा हुआ था और भारत की दोनों सीमाओं के लिए ख़तरनाक था। पूर्वी पाकिस्तान में चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान भारी बहुमत से जीते थे। वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद के योग्य थे पर पश्चिम के नेताओं ने उनके यहां हुए चुनाव को नकारा जिससे पूर्वी पाकिस्तान में अराजकता फैल गई जिसे कुचलने बड़ी संख्या में पाक फ़ौज यहां आई और छात्रों, नेताओं और अवाम पर इतने जुर्म ढाये कि बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत में शरण लेने लगे। वहां के दमनचक्र को रोकने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय फौज पश्चिमी पाकिस्तान में भेजी वो विजयी रही। पाक फौज ने आत्म समर्पण किया तब जाकर मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में एक स्वतंत्र बांग्लादेश का निर्माण हुआ। यह सिर्फ एकल पूर्व भारतवंशियों की पीड़ा देखकर उतना नहीं था जितना देश की पूर्व की सीमा को सुरक्षित रखने का था।उस समय अमेरिका ने डियागोगार्सिया में अपना जहाजी बेड़ा तैनात कर रखा था किंतु तब रूस से हमारी 25 वर्षीय मैत्री काम आई। रूस की एक घुड़की में सब कुछ शांत हो गया।
आज वही रुस अपने पड़ोसी मुल्क यूक्रेन में ठीक उसी तरह साम्राज्यवादी ताकतों का अनावश्यक हस्तक्षेप देख रहा है जैसा इंदिरा जी ने पाकिस्तान में देखा था और फ़ौज भेजने का सख़्त कदम उठाया था। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को मदद के नाम पर जिस तरह युद्ध में लड़ाया, हथियार बेचने और उस पर काबिज होने षड्यंत्र रचा। आतंकी संगठनों का जन्मदाता अमेरिका अफगानिस्तान में पिछले समय तालिबानियों से जिस तरह घिरा वह उसकी नियति बन चुका है। पेंटागन अमरीका की हथियार बेचने वाली इस संस्था का उद्देश्य ही युद्ध के द्वार खोले रखना है। यही वह संस्था है जो अमेरिकी सरकार बनाने में सक्रिय भागीदारी रखती है और फिर अपने इशारों पर नचाती है।
जब सोवियत संघ 26 दिसम्बर 1991 को विघटित घोषित हुआ। इस घोषणा में सोवियत संघ के पूर्व गणतन्त्रों को स्वतन्त्र मान लिया गया। विघटन के पूर्व मिखाइल गोर्बाचेव, सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे। घटना के बाद सोवियत संघ टूट गया और उसके 15 गणतंत्र सभी स्वतन्त्र देशों के रूप में उभरे। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय संधियों में रूस को सोवियत संघ के उत्तराधिकारी देश की मान्यता दी गई। अंतिम दौर में मिखाईल गोर्बाचोव के राष्ट्रपति काल में सोवियत संघ शीत युद्ध के बुरे परिणामों, आर्थिक संकट और अलगाववाद से जूझने लगा, आंतरिक कलह चरम पर पहुंच गई। कहा गया कि इस टूटने में अमेरिका की ही कूटनीति थी।
न्यूयॉर्कर के एडिटर डेविड रैमनिक 1987-1991 के बीच वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाता थे उन्होंने अपनी पुस्तक Lenin’s Tomb: Last Days of the Soviet Empire में लिखा है कि लेनिन के लिए यूक्रेन को खोना रूस का सिर कटने जैसा है। पुतिन भी सोवियत संघ के विघटन को पिछली सदी की सबसे बड़ी त्रासदी कह चुके हैं और वह लगातार सोवियत संघ से अलग हुए देशों में रूस के प्रभाव को फिर से कायम रखने की कोशिश में हैं। पुतिन के मुताबिक रूस और यूक्रेन एक ही इतिहास और आध्यात्मिक विरासत साझा करते हैं।
रूस और यूक्रेन के विवाद में अमेरिका की अहम भूमिका है। अमेरिका ने अपने 3000 सैनिकों को यूक्रेन की मदद के लिए भेजा है और उनकी तरफ से यह आश्वासन दिया गया है कि वे यूक्रेन की मदद के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। सच्चाई यह है कि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, यूक्रेन का इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि मजबूत करने के लिए कर रहे हैं। पिछले साल अमेरिका को अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी थी। इसके अलावा ईरान में अमेरिका कुछ हासिल नहीं कर पाया और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण भी कर रहा है। इन घटनाओं ने अमेरिका की सुपरपावर इमेज को नुकसान पहुंचाया है। यही वजह है कि जो बाइडेन यूक्रेन-रूस विवाद के साथ इसकी भरपाई करना चाहते हैं।
यूक्रेन और रूस के रिश्ते को समझना बहुत मुश्किल है। यूक्रेन के लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं, लेकिन पूर्वी यूक्रेन के लोगों की मांग है कि यूक्रेन को रूस के प्रति वफादार रहना चाहिए। यूक्रेन की राजनीति में नेता दो गुटों में बंटे हुए हैं। एक दल खुले तौर पर रूस का समर्थन करता है और दूसरा दल पश्चिमी देशों का समर्थन करता है। यही वजह है कि आज यूक्रेन दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच फंसा हुआ है।
इस भारी उथल पुथल के बाद तकरीबन 30 वर्षों तक अमेरिका पूरी तरह दुनिया का डॉन बन बैठा। तीन दशक बाद रूस ने अपने से विघटित राज्य यूक्रेन को इन ताकतों से बचाने का बीड़ा उठाया है। अमेरिका की एक चाल यह भी थी कि यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाकर उसकी रक्षा का भार नाटो के सैनिकों के जिम्मे कर दिया जाए ताकि उसे 30 सदस्य देशों की मदद मिल सके। यह सब होने से पहले बड़ी चतुराई से वीटो पावर रखने वाले रूस ने यूक्रेन के दो इलाकों, डोनेट्स्क और लुहान्स्क, को स्वघोषित पीपुल्स रिपब्लिक की मान्यता दे दी और उनकी सुरक्षा में अपने फौजी भी भेज दिए हैं। अमरीका से मिली सीख का फायदा उठाते हुए उनकी फौज ने यूक्रेन के तीन चौथाई हिस्से को घेर लिया है और उन क्षेत्रों पर बमबारी कर रहा है जो प्रमुख सैन्य शक्ति के केंद्र तथा प्रमुख हवाईअड्डे हैं ताकि बाहरी फौज और हथियारों का प्रवेश ना हो सके। वहां से भारत लौटे छात्रों की रिपोर्ट ये आ रही है कि रूस अपने हमले में यूक्रेन के समूचे सैन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बना रहा है, बाकी क्षेत्र सुरक्षित हैं। साथ ही रूसी सेना सभी संभव दिशाओं से यूक्रेन में घुस रही है। पुतिन ने एक बयान में कहा कि रूस की यूक्रेन पर क़ब्ज़ा करने की कोई योजना नहीं थी, लेकिन ये कार्रवाई आत्मरक्षा में की जा रही है। पुतिन ने अपने संबोधन में पूर्वी यूक्रेन में तैनात यूक्रेनी सैनिकों से आग्रह किया कि वो हथियार डाल दें और अपने घरों को लौट जाएँ। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि रूस के हमले के दौरान किसी भी बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप को तत्काल जवाब दिया जाएगा और आक्रमण को विफल कर दिया जाएगा।
इधर अमेरिका समेत अधिकतर पश्चिमी देश रूस के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं। ब्रिटेन ने तो रूस के पांच बैंकों और तीन बड़े बिजनेसमैन के खिलाफ प्रतिबंधों का ऐलान भी कर दिया है। जर्मनी ने भी नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट को रद्द करने के संकेत दिए हैं। अमेरिका भी रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों की तैयारी में जुटा हुआ है। उधर, यूरोपीय यूनियन ने भी रूस पर प्रतिबंधों को लेकर एक आपात बैठक बुलाई है।
दूसरी ओर रूस के साथ भारत की दोस्ती कोल्ड वॉर के दौर की स्थिति में जाती दिख रही है। विदेश मंत्रालय के अफसरों का कहना है कि रूस विश्वसनीय और आजमाया हुआ साथी है। रूस द्वारा 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के वक्त भी भारत की यही थी रणनीति थी।
कुल मिलाकर यही लगता है रूस भी भारत की तरह अपनी सीमा सुरक्षा हेतु यह प्रयास कर रहा है साथ ही साथ साम्राज्यवाद के बढ़ते चरण को रोकने प्रतिबद्ध भी है। वह नहीं चाहता रूस का सिर यूक्रेन, अमेरिका के हाथों बर्बाद हो। वह सोवियत संघ का हिस्सा है। बहुतेरे रशियन हैं जो रूस से अलगाव के पक्ष में नहीं हैं। यह पूंजीवादी ताकतों द्वारा एक क्रांतिकारी समाजवादी देश को मिटाने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण जवाब भी है रूस ने दुनिया के साम्राज्यवादी देशों को यह संदेश भी दिया है कि वह अब जवाब देने तैयार खड़ा हो चुका है।


