जशपुर

पुनरुत्थान की रोशनी से जगमगाया जशपुर, चर्चों में गूंजे ‘हल्लेलुया’, ईस्टर पर उमड़ी आस्था की भीड़
06-Apr-2026 5:07 PM
पुनरुत्थान की रोशनी से जगमगाया जशपुर, चर्चों में गूंजे ‘हल्लेलुया’, ईस्टर पर उमड़ी आस्था की भीड़

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

जशपुरनगर, 6 अप्रैल। रविवार को पास्का (ईस्टर)पर्व के अवसर पर जशपुर जिले में आस्था का उत्सव अपने चरम पर नजर आया। प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान की खुशी में मनाए जाने वाले ईस्टर संडे पर महागिरजाघर सहित जिले के विभिन्न चर्चों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। ‘हल्लेलुया’ के जयघोष और घंटियों की गूंज के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। चर्चों में विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की गईं, जहां श्रद्धालुओं ने मोमबत्तियां जलाकर, बाइबिल का पाठ कर और प्रभु यीशु को याद करते हुए उनके पुनर्जीवित होने की खुशी साझा की। लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर ईस्टर की शुभकामनाएं दीं, जिससे पूरे शहर में भाईचारे और प्रेम का संदेश फैलता नजर आया।

बलिदान से पुनरुत्थान तक आस्था का सबसे बड़ा पर्व

ईसाई धर्म में गुड फ्राइडे को प्रभु यीशु के बलिदान का दिन माना जाता है, जबकि तीसरे दिन यानी रविवार को उनका पुनरुत्थान हुआ था। इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना की स्मृति में ईस्टर संडे मनाया जाता है, जिसे ‘पास्का’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि पुनर्जीवित होने के बाद यीशु मसीह 40 दिनों तक पृथ्वी पर रहे और अपने शिष्यों को प्रेम, क्षमा और करुणा का संदेश दिया। यही कारण है कि ईस्टर को नई आशा, नवजीवन और सकारात्मक बदलाव का प्रतीक माना जाता है।

 प्रार्थना में डूबे श्रद्धालु

महागिरजाघर, शांति भवन सहित जिले के विभिन्न चर्चों में सुबह से ही विशेष प्रार्थना का दौर शुरू हो गया था। श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में चर्च पहुंचे और सामूहिक प्रार्थना में शामिल हुए।मोमबत्तियों की रोशनी और भजनों की मधुर धुन के बीच श्रद्धालुओं ने प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की खुशी मनाई। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग में उत्साह देखने को मिला।

शांति भवन में विशेष आयोजन, पवित्र जल से मिला आशीर्वाद

शांति भवन चर्च में ईस्टर के अवसर पर विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। फादर अजय केरकेट्टा ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ईस्टर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में आत्मिक जागृति और सुधार का अवसर है। उन्होंने बताया कि इस दिन पवित्र जल का छिडक़ाव कर मण्डली को आशीर्वाद दिया जाता है, जो बपतिस्मा और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। यह परंपरा लोगों को अपने जीवन में नई शुरुआत करने और बुराइयों से दूर रहने की प्रेरणा देती है।

ईस्टर संडे का पर्व जशपुर में केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समाज को जोडऩे और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढऩे का संदेश भी देता नजर आया। प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की यह गाथा आज भी लोगों को यह सिखाती है कि कठिनाइयों के बाद भी आशा की किरण हमेशा जीवित रहती है।


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