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जापान में 8 फरवरी को होने वाले मध्यावधि चुनाव पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं. प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची खुद तो लोकप्रिय हैं, लेकिन घोटालों और महंगाई से परेशान जनता की वजह से उनकी पार्टी कमजोर पड़ती दिख रही है.
जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने पिछले शुक्रवार को संसद के निचले सदन को भंग करने की औपचारिक घोषणा की. इसके साथ ही देश में 8 फरवरी को मध्यावधि चुनाव कराने का कार्यक्रम तय किया गया है. ताकाइची इन मध्यावधि चुनावों के जरिए देश के सामने मौजूद कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए, मतदाताओं से नए सिरे से समर्थन और विश्वास हासिल करना चाहती हैं. उन्हें उम्मीद है कि इस चुनाव से उन्हें नया जनादेश मिलेगा.
हालांकि, विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि प्रधानमंत्री ताकाइची की उच्च लोकप्रियता का मतलब यह नहीं है कि लोग घोटालों से घिरी उनकी पार्टी ‘लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी' को भी पसंद करेंगे. इसी बीच, एक नई विपक्षी पार्टी अचानक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है, जो लंबे समय से सत्ता पर काबिज एलडीपी को कड़ी टक्कर दे सकती है.
इन अजीब परिस्थितियों को देखते हुए, विशेषज्ञों का कहना है कि यह चुनाव जापान के हालिया राजनीतिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक चुनाव हो सकता है. एलडीपी ने 2024 में हुए निचले सदन के चुनाव में 191 सीटें जीती थीं. अपने छोटे सहयोगी दल ‘कोमेइतो' की मदद से उसके पास एक मजबूत बहुमत था. कोमेइतो को बौद्ध संगठन का समर्थन प्राप्त है.
पिछले साल के उच्च सदन के चुनावों में एलडीपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों के हाथों सीटें गंवाने के बाद सरकार अल्पमत में आ गई, जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा को पद छोड़ना पड़ा.
कोमेइतो के अलग होने से कमजोर हुआ एलडीपी गठबंधन
एक और करारा झटका तब लगा जब ताकाइची के प्रधानमंत्री बनते ही ‘कोमेइतो' पार्टी 26 साल पुराना गठबंधन तोड़कर एलडीपी से अलग हो गई. इसके पीछे की वजह महत्वपूर्ण नीतिगत मतभेद बताए गए.
एलडीपी ने कोमेइतो के साथ गठबंधन टूटने के झटके से उबरने की कोशिश की है और रूढ़िवादी विचारधारा वाली ‘जापान इनोवेशन पार्टी' के साथ एक लचीला गठबंधन बनाया है. हालांकि, कोमेइतो के अलग होने का खामियाजा एलडीपी को चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.
दूसरी तरफ, कोमेइतो ने अब ‘कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान' (सीडीपीजे) के साथ हाथ मिला लिया है और साथ मिलकर एक नया ‘सेंट्रिस्ट रिफॉर्म अलायंस' (सीआरए) बनाया है.
मौजूदा समय में इस सीआरए गठबंधन के पास संसद में 172 सीटें हैं. अगर यह गठबंधन अन्य जगहों से नाराज मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफल रहा, तो यह ताकाइची की प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर सकता है.
टेम्पल यूनिवर्सिटी के टोक्यो कैंपस में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर हिरोमी मुराकामी ने कहा, "ताकाइची अब तक काफी लोकप्रिय रही हैं और पोल में उन्हें करीब 70 फीसदी समर्थन मिल रहा है, लेकिन बहुत से लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि वे अभी चुनाव क्यों करा रही हैं?”
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "यह सब इतना अचानक और इतने कम समय में हो रहा है कि पार्टियों के पास अपनी नीतियों की घोषणा करने और उन्हें मतदाताओं तक पहुंचाने का वक्त ही नहीं बचा है. मुझे नहीं लगता कि चुनाव के दिन इससे उन्हें कोई फायदा होगा और मतदाता उनके कुछ फैसलों से खुश नहीं हैं.”
घोटालों की वजह से कम हुई एलडीपी की विश्वसनीयता
एलडीपी का सबसे विवादित फैसला उन दर्जनों सांसदों को समर्थन देने का है, जिन्हें 60 करोड़ येन से ज्यादा के गुप्त राजनीतिक चंदे, रिश्वत और बिना हिसाब वाली आय के मामले में पार्टी से किनारे कर दिया गया था, लेकिन उन्हें निकाला नहीं गया था.
मुराकामी ने कहा, "मुझे समझ नहीं आता कि ताकाइची अब इन नेताओं का समर्थन क्यों कर रही हैं, जबकि उनके कामों की वजह से ही पार्टी ने पिछले चुनाव में इतना खराब प्रदर्शन किया था. जनता को विश्वास नहीं है कि पार्टी इस समस्या से ठीक से निपट पाई है और हम देख रहे हैं कि उनका फिर से स्वागत किया जा रहा है.”
वासेदा विश्वविद्यालय में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर तोशिमित्सु शिगेमुरा ने कहा कि चुनाव के दिन, आम जापानी लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बढ़ती महंगाई और जीवन यापन का गहराता संकट होगा. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "खाने-पीने और रोजमर्रा की चीजों के दाम काफी समय से बहुत ज्यादा बढ़े हुए हैं और लोग अब इससे तंग आ चुके हैं.”
महंगाई की वजह से गुस्से में मतदाता
बढ़ती कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी को देखते हुए एलडीपी और नई विपक्षी पार्टी, दोनों ने कहा है कि वे खाने-पीने की चीजों पर लगने वाले 8 फीसदी सेल्स टैक्स को खत्म कर देंगी.
हालांकि, शिगेमुरा ने कहा कि उन्हें इस बात पर शक है कि वे टैक्स को पूरी तरह खत्म कर पाएंगी. उनका मानना है कि इस टैक्स से सरकारी खजाने में हर साल करीब 5 ट्रिलियन येन की आमद होती है और यह देश की बुजुर्ग होती आबादी की मदद के लिए धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है.
शिगेमुरा का यह भी मानना है कि इमिग्रेशन का मुद्दा एक बार फिर मतदाताओं की बड़ी चिंताओं में शामिल होगा. पिछले साल ही ‘संसेइतो' और ‘जापान कंजर्वेटिव पार्टी' जैसे धुर-दक्षिणपंथी दलों ने ‘जापान फर्स्ट' को अपने घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बनाया था.
पिछले साल जुलाई के चुनावों में, मुख्य रूप से इसी मुद्दे की वजह से एलडीपी के समर्थकों ने धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों का रुख कर लिया था. इस बार भी दोनों पार्टियां जापान के सीमा नियंत्रण में ढील देने के खिलाफ जोरदार प्रचार करेंगी.
शिगेमुरा का मानना है कि एलडीपी के जो मतदाता पिछले साल संसेइतो के पक्ष में चले गए थे वे फरवरी में वापस अपनी पुरानी पार्टी एलडीपी की ओर लौट सकते हैं. इसकी वजह यह है कि ताकाइची ने आप्रवासन के मुद्दे पर बेहद सख्त रुख अपनाने के साफ संकेत दे दिए हैं.
हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि संसेइतो ने स्थानीय स्तर पर अपनी बहुत मजबूत पैठ बना ली है. यह पार्टी राष्ट्रीय चुनाव में इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगी.
चीन के साथ तनाव की वजह से मतदाता चिंतित
जापानी मतदाताओं के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा तीसरा सबसे गंभीर मुद्दा है. इसका मुख्य कारण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का बढ़ता आक्रामक रवैया और ताइवान को मुख्य भूमि के साथ ‘फिर से मिलाने' का दबाव है.
अमेरिका के साथ सुरक्षा और व्यापारिक रिश्तों को लेकर भी चिंता बनी हुई है. पीढ़ियों से अमेरिका जापान का सबसे करीबी सहयोगी रहा है, लेकिन आज उसे कम भरोसेमंद माना जा रहा है. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अब यह देखा जा रहा है कि अमेरिका अपने पुराने सहयोगियों से केवल अपना फायदा निकालने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है.
विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव का नतीजा कई कारकों पर निर्भर करेगा. इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिन पर किसी भी राजनीतिक दल का कोई नियंत्रण नहीं है.
उदाहरण के लिए, यह बहुत अजीब बात है कि इतनी कड़ाके की ठंड में चुनाव कराए जा रहे हैं. खासकर तब जब जापान के उत्तरी तटीय इलाकों के लोग पहले से ही सालों की सबसे भारी बर्फबारी से जूझ रहे हैं. इसका असर निश्चित रूप से 8 फरवरी को होने वाले मतदान के प्रतिशत पर पड़ेगा.
मुराकामी ने कहा, "किसी भी नतीजे का अनुमान लगाना वास्तव में बहुत कठिन है, क्योंकि इस चुनाव में कई अनोखे पहलू हैं. मेरे लिए एक बड़ी चिंता यह है कि चुनाव प्रचार के लिए काफी कम समय मिला है. ऐसे में बहुत से लोगों के पास पार्टियों की नीतियों को सुनने और समझने का समय नहीं होगा. इसलिए, वे शायद वोट न देने का फैसला करें.”
उन्होंने आगे बताया, "मुझे लगता है कि कम मतदान होने से एलडीपी को नुकसान हो सकता है. शायद इसी कारण से ताकाइची को जल्दबाजी में चुनाव कराने के अपने फैसले पर पछतावा करना पड़ सकता है.”


