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चीन इतना सोना क्यों ख़रीद रहा है, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका असर
18-Jan-2026 5:11 PM
चीन इतना सोना क्यों ख़रीद रहा है, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका असर

करीब तीन दशकों बाद साल 2025 में पहली बार वैश्विक केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद सोने का कुल मूल्य अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड में निवेश से अधिक हो गया.

केंद्रीय बैंकों के पास सोने का भंडार करीब 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश 3.5 ट्रिलियन डॉलर है.

सोना यूरो को पीछे छोड़ते हुए अमेरिकी डॉलर के बाद दूसरा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व एसेट बन गया.

यह बदलाव 2022 में अमेरिका के रूस की संपत्तियां फ़्रीज करने के बाद केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की ख़रीद तेज़ करने के बाद सामने आया.

लगातार तीन सालों तक केंद्रीय बैंकों ने हर साल 1,000 टन से ज़्यादा सोना ख़रीदा. ऊंची कीमतों के बावजूद सितंबर 2025 तक इसमें 634 टन और जुड़ गया.

चीनी विश्लेषकों का कहना है कि सोने का भंडार बढ़ाने से केंद्रीय बैंकों को डॉलर पर निर्भरता घटाने और डॉलर आधारित परिसंपत्तियों से जुड़े जोखिम को संभालने में मदद मिलती है.

डॉलर की विश्वसनीयता कमज़ोर पड़ने की स्थिति में, अधिक सोना कुल विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिरता में भी मददगार होता है.

सितंबर 2025 तक, चीन के कुल अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व में सोने की हिस्सेदारी 7.6 प्रतिशत रही. रूस के कुछ इंटरनेशनल रिज़र्व में सोने का हिस्सा 41.3 % रहा जबकि भारत का 13.57% रहा.

नीतिगत अनिश्चितता, अमेरिका के बढ़ते कर्ज़ और भू-राजनीतिक तनाव के बीच विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं और सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं.

इससे वैश्विक मौद्रिक प्रणाली अधिक विविधता की ओर बढ़ सकती है.

साल 2024 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान रूस ने ब्रिक्स क्रॉस बॉर्डर पेमेंट इनिशिएटिव (बीसीबीपीआई) का प्रस्ताव रखा था. यह व्यवस्था सदस्य देशों को अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार की सुविधा देने और अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली पर निर्भरता घटाने के मकसद से तैयार की गई है.

विश्लेषकों का मानना है कि यह रुझान चीनी रेनमिनबी (चीनी करेंसी का आधिकारिक नाम) के व्यापक अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के लिए भी नए अवसर पैदा करता है.

चीन के बढ़ते सोने के भंडार को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में रेनमिनबी की बढ़ती भूमिका के प्रति भरोसा मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है.

यह विश्लेषण वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल, आईएमएफ़ और पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना के आंकड़ों पर आधारित है और इसमें ब्रिक्स देशों, खास तौर पर चीन, के सोना इकट्ठा करने के पैटर्न को समझने की कोशिश की गई है. इसमें ये भी विश्लेषण किया गया है कि सोने के भंडारण ने रेनमिनबी के व्यापाक अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के लिए कैसे नए अवसर पैदा किए हैं.

हालांकि मौजूदा स्तर अब भी इस मुद्रा के पूर्ण अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए पर्याप्त नहीं है.

ब्रिक्स देशों में सोने के भंडार का पैटर्न

ब्रिक्स देशों, खासकर दुनिया के दो सबसे बड़े उत्पादक चीन और रूस का सोने के भंडार बढ़ाना कोई नई बात नहीं है.

दोनों देशों ने साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद अपने सोने के भंडार को बढ़ाना शुरू किया था. उस संकट ने अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली की कमज़ोरियों को सामने ला दिया था और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को डॉलर आधारित एसेट्स में निवेश से जुड़े जोखिमों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया.

हालांकि, दोनों देशों का तरीका अलग रहा है. रूस ने बड़े पैमाने पर और लगातार ख़रीद की नीति अपनाई. साल 2022 में यूक्रेन पर हमले और पश्चिमी देशों के व्यापक प्रतिबंधों के बीच रूस का सोने का भंडारण अपने चरम पर पहुंच गया.

इसके बाद रूस के भंडार में लगभग स्थिरता आ गई. साल 2025 में रूस ने घरेलू बजट घाटे को पूरा करने के लिए अपने सोने के भंडार का एक हिस्सा कथित रूप से बेचा था.

चीन का रुख़ रणनीतिक और क़ीमत आधारित था. पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना आमतौर पर उस समय सोने की ख़रीद बढ़ाता रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की क़ीमतें गिरती हैं.

चीन की अब तक की सबसे बड़ी सालाना खरीद 2015 में 708.22 टन रही. यह ख़रीद अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व के 2013 के उस एलान के बाद हुई, जिसमें बॉन्ड ख़रीद कार्यक्रम को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी, जिसे आमतौर पर 'टैपर टैंट्रम' कहा जाता है.

साल 2023 के बाद चीन ने सोना जमा करने की रफ़्तार धीमी की, लेकिन छोटी मात्रा में ख़रीद जारी रखी. इससे यह संकेत मिलता है कि चीन लंबे समय तक सोने का भंडार बढ़ाने की रणनीति पर कायम है.

भारत ने साल 2018 से धीरे-धीरे अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी शुरू की. रूस और चीन के विपरीत, (जिन्होंने डी-डॉलराइजेशन की नीति के तहत अमेरिकी कर्ज़ में अपनी हिस्सेदारी तेजी से घटाई) भारत ने 2024 तक अमेरिकी ट्रेज़री में भारी निवेश जारी रखा. इसका मकसद विकासशील अर्थव्यवस्था में आने वाली अतिरिक्त विदेशी पूंजी को लगाना था.

हालांकि साल 2026 की शुरुआत तक भारत ने अपना रुख़ बदला. अब अमेरिकी ट्रेज़री में भारत की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत हो गई है. भारत ने अब वैश्विक वित्तीय जोखिमों से बचाव के लिए सोने और अन्य गैर-डॉलर परिसंपत्तियों में निवेश बढ़ा दिया है.

ब्रिक्स का वैकल्पिक भुगतान सिस्टम

डी-डॉलराइज़ेशन के बीच जब वैश्विक रिज़र्व का रुझान सोने की ओर बढ़ रहा है, तब रूस ने लंदन मेटल एक्सचेंज जैसे पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्म के विकल्प के रूप में एक ब्रिक्स प्रीसियस मेटल एक्सचेंज बनाने का प्रस्ताव रखा है.

इसका मक़सद व्यापार को प्रतिबंधों के असर से सुरक्षित रखना है. हालांकि साल 2025 में ब्राज़ील में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक तक इस प्रस्ताव पर कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई.

इसका एक कारण चीन की मौजूदा गोल्ड मार्केट व्यवस्था मानी जा रही है. चीन पहले से ही रेनमिनबी आधारित शंघाई गोल्ड एक्सचेंज चलाता है और हांगकांग में एक प्रमाणित बुलियन वॉल्ट भी मौजूद है.

हांगकांग में अंतरराष्ट्रीय गोल्ड ट्रेडिंग सेंटर बनाने की योजना भी है. ऐसे में चीन के लिए नया ब्रिक्स एक्सचेंज बनाने के बजाय वैश्विक बुलियन बाज़ार में अपनी स्थापित भूमिका का इस्तेमाल करना अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है.

साल 2022 के बाद से रूस ब्रिक्स बास्केट आधारित रिज़र्व मुद्रा का सबसे मुखर समर्थक रहा है. इसमें सोने या अन्य कमोडिटी से जुड़ी मुद्रा के सुझाव भी शामिल हैं. हालांकि ये सभी प्रस्ताव फिलहाल चर्चा के स्तर पर ही हैं.

व्यापक तौर पर देखें तो आर्थिक विकास के स्तर, नीतिगत प्राथमिकताओं और विदेश नीति के अंतर के कारण ब्रिक्स के भीतर तालमेल सीमित रहता है. इसका असर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशों पर भी दिखता है, जो काफ़ी हद तक व्यापार संतुलन और नकदी की उपलब्धता पर निर्भर करता है.

भारत और चीन के बीच 102.5 अरब डॉलर का व्यापार घाटा इस चुनौती को साफ़ दिखाता है. अगर द्विपक्षीय व्यापार रुपये में होता, तो चीन के पास बड़ी मात्रा में ऐसी मुद्रा जमा हो जाएगी, जिसका अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल सीमित है.

ब्रिक्स से बाहर भी चीन रेनमिनबी के सीमा पार इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए अपनी वित्तीय व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहा है.

चीन की प्रमुख पहल में एमब्रिज शामिल है. यह एक ब्लॉकचेन आधारित होलसेल सेंट्रल बैंक डिज़िटल करेंसी प्लेटफ़ॉर्म है, जिसे हांगकांग, थाईलैंड, यूएई और सऊदी अरब के केंद्रीय बैंकों के साथ मिलकर विकसित किया गया है.

यह परियोजना 2024 के मध्य में अपने 'मिनिमम वायबल प्रोडक्ट' चरण तक पहुंच चुकी है.

चीन के सोने के बढ़ते भंडार ने रेनमिनबी की स्थिरता और भरोसे की धारणा को मजबूत किया है. साल 2009 में जब चीन ने रेनमिनबी के अंतरराष्ट्रीयकरण का कार्यक्रम शुरू किया, तब से पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने 32 द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा स्वैप समझौते किए हैं.

इनका कुल मूल्य करीब 4.5 ट्रिलियन युआन है, जिसमें से लगभग आधे समझौते एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ हैं.

 

इन भागीदार देशों में से 15 देश चीन के साथ मुख्य रूप से कमोडिटी व्यापार करते हैं, जबकि आठ देश चीन केंद्रित मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन से जुड़े हुए हैं.

वैश्विक रिज़र्व मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की पकड़ को चुनौती मिलने और वैश्विक कमोडिटी के लिए देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बीच चीन तेजी से युआन में कमोडिटी व्यापार की कोशिश कर रहा है.

चीन ने रेनमिनबी के ऑफशोर ढांचे का भी विस्तार किया है. अगस्त 2025 तक पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने 33 देशों में 35 विदेशी रेनमिनबी क्लियरिंग बैंकों को अधिकृत किया था, जो चीन के अधिकांश प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को कवर करते हैं.

सिर्फ 2024 में इन क्लियरिंग बैंकों ने 937.6 ट्रिलियन युआन का लेनदेन किया, जो सालाना आधार पर 47.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. इसी अवधि में सीमा पार रेनमिनबी प्राप्तियां और भुगतान 64.1 ट्रिलियन युआन तक पहुंचा, जो 23 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दिखाते हैं.

क्षेत्रीय स्तर पर 2024 में आसियान और यूरोप दोनों के साथ चीन का रेनमिनबी सेटलमेंट 8.9 ट्रिलियन युआन रहा.

हालांकि आसियान में इसकी वृद्धि दर 50.7 प्रतिशत रही, जबकि यूरोप में यह 13.1 प्रतिशत तक सीमित रही. साल 2015 में शुरू किया गया चीन का क्रॉस बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम 2024 के अंत तक कुल मिलाकर करीब 600 ट्रिलियन युआन के भुगतान का लेनदेन कर चुका है.

इन उपलब्धियों के बावजूद वैश्विक स्तर पर रेनमिनबी की भूमिका अभी सीमित है. 2024 में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 2.06 प्रतिशत रही.

नवंबर 2025 तक वैश्विक भुगतान में आरएमबी का हिस्सा 2.94 प्रतिशत था. किसी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण का आकलन आमतौर पर व्यापार में उपयोग, रिज़र्व स्थिति, क़ीमत तय करने की भूमिका और निवेश व फ़ंडिंग में स्वीकार्यता के आधार पर किया जाता है.

हालांकि चीन की आर्थिक क्षमता और व्यापारिक वर्चस्व उसे मजबूत आधार देते हैं, लेकिन वित्तीय बाज़ारों की खुली व्यवस्था, गहराई और नीतिगत पूर्वानुमान के मामले में रेनमिनबी अब भी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं से पीछे है.

चीन के बढ़ते सोने के भंडार ने रेनमिनबी को लेकर भरोसा बढ़ाया है और उसके अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए बेहतर हालात बनाए हैं. लेकिन एक वास्तविक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनने के लिए पूंजी खाते का उदारीकरण ज़रूरी है.

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में चीन वित्तीय खुलेपन को धीरे-धीरे बढ़ा रहा है.

हालांकि उसकी प्राथमिकता व्यापार निपटान और सीमा पार भुगतान में रेनमिनबी के इस्तेमाल को बढ़ाने पर है, न कि वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में इसकी हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ाने पर.

इसके लिए पूंजी खाते का पूर्ण उदारीकरण और मुद्रा का पूरी तरह परिवर्तनीय होना ज़रूरी होगा, जिससे बीजिंग बचना चाहता है.

चीन का मानना है कि उसके वित्तीय बाज़ार अभी इतने गहरे नहीं हैं और समय से पहले खुलापन अनियंत्रित पूंजी निकासी या अस्थिरता पैदा कर सकता है.

ये अध्ययन कैसे किया गया?

इस लेख के अध्ययन के लिए आंकड़े वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल, इंटरनेशनल मॉनेटरी फ़ंड, सोसाइटी फ़ॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फ़ाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन और पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना द्वारा प्रकाशित रेनमिनबी इंटरनेशनलाइजेशन रिपोर्ट्स से लिए गए हैं.

यह शोध 2007 से लेकर 2025 के अधिकांश हिस्से को कवर करता है. 2007 वह साल है, जो वैश्विक वित्तीय संकट से ठीक पहले का है. अध्ययन में गुणात्मक विश्लेषण किया गया, जिसके जरिए प्रमुख ब्रिक्स देशों में सोने के भंडार बढ़ाने के पैटर्न की जांच की गई.

इसमें खास तौर पर चीन पर ध्यान केंद्रित किया गया, ताकि यह आकलन किया जा सके कि सोने का भंडारण चीन के रेनमिनबी अंतरराष्ट्रीयकरण अभियान को किस तरह सपोर्ट करता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


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