संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विधायक की गुंडागर्दी पर तिलचट्टों की जिम्मेदारी
सुनील कुमार ने लिखा है
28-May-2026 7:57 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : विधायक की गुंडागर्दी पर तिलचट्टों की जिम्मेदारी

छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक ने अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक जगह पर, सार्वजनिक रूप से एक नायब तहसीलदार को मारा। इस मौके पर इस छोटे अफसर के साथ उसके एक बड़े अफसर भी थे, जिन्होंने विधायक को रोकने की कोशिश की, लेकिन विधायक ने अपनी ही सरकार के अधिकारी को पीटने से परहेज नहीं किया। सत्तारूढ़ विधायक के लिए बेहतर और आसान तरीका अफसर को हटवा देने का हो सकता था, लेकिन उन्होंने सडक़ पर अपनी मर्जी का ‘इंसाफ’ कर दिया। न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, और न सिर्फ भाजपा राज में, बहुत सारे प्रदेशों में अलग-अलग सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता सरकारी अमले से, या सार्वजनिक जगहों पर गुंंडागर्दी करते दिखते हैं, और हाल के बरसों में मोबाइल-कैमरों की मेहरबानी से वे सुबूत भी छोड़ जाते हैं। कई नेता अफसरों से टेलीफोन पर गंदी गालियों, और धमकियों से बात करते हैं, और ऐसी कॉल रिकॉर्डिंग से सोशल मीडिया पटा हुआ है। सांसद, विधायक, या उनसे छोटे दर्जे के नेताओं के पांव भी जमीन पर पडऩा बंद हो जाते हैं, और दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा हुआ रहता है।

विपक्षी पार्टी तो अपनी भड़ास निकालने के लिए सरकारी अमले के साथ बदसलूकी कर सकती है, और उसके खिलाफ कड़ी पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है, होती भी है, लेकिन जब सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ऐसी हरकतें करते हुए रिकॉर्ड होते हैं, तो सरकार के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात रहती है। पड़ोस के मध्यप्रदेश में एक किसी जिले के कलेक्टर के बंगले पर पहुंचकर धमकी देने वाले सत्तारूढ़ भाजपाई विधायक को पार्टी ने ही फटकार लगाई थी, लेकिन इससे विधायकों को कोई सबक मिला हो ऐसा नहीं है। अगली घटना एक दूसरे विधायक के साथ हुई जिसके बेटे ने सडक़ पर बददिमागी से लोगों को कुचला था, और विधायक ने इसके बाद अफसरों को खुली धमकी का वीडियो जारी किया था। सत्तारूढ़ नेताओं को यह रियायत जरूर मिल जाती है कि उनके खिलाफ पुलिस आसानी से कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करती, और सरकार भी उनके पीछे नहीं पड़ती। मध्यप्रदेश में ही एक मंत्री ने भारतीय फौज की एक बड़ी महिला अधिकारी को मुस्लिम होने की वजह से आतंकियों की बहन कहा था, और इसके बारे में अदालत के बार-बार के निर्देशों पर भी सरकार ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की थी। फिर मानो अपनी ही तौहीन और बेइज्जती से थककर अदालत ने ही एक और जांच का आदेश दे दिया, ताकि मंत्री कुर्सी पर बना रहे, और सत्ता का कोई राजनीतिक असुविधा न हो। भारत सरकार की हाल के बरसों की सबसे बड़ी फौजी कार्रवाई, ऑपरेशन सिंदूर का ब्यौरा हर दिन मीडिया को देने वाली कर्नल सोफिया ही खुली बेइज्जती करने वाले मंत्री पर आज तक न अदालती आंच आई है, और न ही राजनीतिक या सरकारी आंच। जाहिर है कि अपनी पार्टी, और पार्टी की सरकार की ऐसी मेहरबानी से पार्टी के दूसरे नेताओं में भी बददिमागी आती है, और वे भी बदसलूकी और गुंडागर्दी करने लगते हैं।

लेकिन हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में यह सिलसिला किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए उस वक्त तक तो नुकसानदेह साबित नहीं होता, जब तक उस पार्टी के पक्ष में लहर चल रही हो। लेकिन जिस दिन चुनावी मुकाबला कड़ी टक्कर का हो जाएगा, उस दिन सत्तारूढ़ नेताओं की गुंडागर्दी के वीडियो आखिरी दिन, आखिरी पल मतदाताओं का संतुलन इतना बदल सकते हैं कि दो-चार हजार वोट की होने वाली जीत हार में बदल जाए। सत्ता की बददिमागी की ताकत इतनी रहती है कि सत्तासंपन्न नेता की बड़ी गाड़ी का हॉर्सपावर भी उसका मुकाबला नहीं कर पाता। और जब ये दोनों जुड़ जाते हैं, तो ऐसी गाड़ी मध्यप्रदेश में राह चलते पैदल लोगों को कुचलती है, या यूपी में किसान आंदोलन के लोगों को कुचलकर मार डालती है। यह बददिमागी जगह-जगह सामने आती है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ ऐसे बड़े नेता हुए हैं जिनकी सार्वजनिक रूप से गंदी गालियों के वीडियो अगर फोन या कम्प्यूटर पर अचानक बजने लगें, तो लोगों को आसपास के लोगों के बीच भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। अभी जिस तरह सत्तारूढ़ विधायक ने छत्तीसगढ़ में अफसर को सार्वजनिक रूप से मारा है, ऐसा ही बहुत साल पहले बिलासपुर में हुआ था, जब सर्किट हाऊस में बिना वजह नाराज हुए एक मंत्री ने एक डिप्टी कलेक्टर को थप्पड़ मार दी थी। ऐसे कई मामलों में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी को खून का घूंट पीकर रह जाना पड़ता है क्योंकि पानी में रहकर मछली मगरमच्छ से बैर भला कैसे पाल और निभा सकती है? आमतौर पर ऐसी रिपोर्ट हो जाने के बाद, और जुर्म दर्ज हो जाने के बाद भी शिकायतकर्ता कर्मचारी-अधिकारी पर इतना राजनीतिक और सरकारी दबाव पड़ता है कि वे खुद अपनी शिकायत को कमजोर करते हैं, और किसी तरह इस नौबत से निकलना चाहते हैं। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश के इंदौर में वहां के सबसे ताकतवर नेता के विधायक बेटे ने क्रिकेट की बैट से दिनदहाड़े खुली सडक़ पर म्युनिसिपल अफसर को पीटा था, और बाद में उसी पार्टी की सत्ता के रहते हुए उस अफसर ने अदालत में पीटने वाले को पहचानने से इंकार कर दिया था। उस दिन भी इस पिटाई और हिंसा के अनगिनत वीडियो इंटरनेट पर मौजूद थे, आज भी हैं, लेकिन अगर सरकारी नौकरी करना है, तो सरकारी अमले को अपमान झेलते हुए यह बर्दाश्त करना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट के कहे हुए देश के हर प्रदेश में एमपी-एमएलए के किए हुए जुर्म पर तेजी से सुनवाई के लिए अलग से अदालतें बनी हुई हैं, लेकिन वहां पर मामलों का क्या नतीजा होता है, यह अभी इस पल हमारे सामने नहीं है। हम इतना ही कह सकते हैं कि नेताओं की बदजुबानी, बदसलूकी, और उनकी हिंसा के सारे ऑडियो-वीडियो लोगों को संभालकर रखने चाहिए, और अगली बार जब ये नेता किसी चुनाव प्रचार के लिए आएं, तो उनसे इस बारे में सवाल करने चाहिए। यह काम आसान इसलिए नहीं रहेगा कि राजनीतिक गुंडागर्दी की ताकत से लैस नेता और उनके आसपास के गुंडे ऐसे दिक्कत के सवाल उठाने वाले लोगों को फिर पीट सकते हैं, लेकिन ऐसे सवालों के मौके पर लोगों को कई-कई मोबाइल कैमरे पर वीडियो रिकॉर्डिंग जारी रखना चाहिए, ताकि अगर कोई ताजा गुंडागर्दी होती है, तो वह भी अलग-अलग कई एंगल से रिकॉर्ड हो जाए। शायद बड़े राजनीतिक दलों की ऐसी ही गुंडागर्दी पर नजर रखने के लिए, उस पर सवाल उठाने के लिए तिलचट्टों की जरूरत पड़ती है, जिन्हें खुद बर्बाद हो जाने का बहुत अधिक डर नहीं रहता। हम तिलचट्टों की किसी सरकार की कल्पना जितने दूर नहीं जाते, लेकिन हम सवाल पूछने वाले तिलचट्टों की कल्पना जरूर करते हैं। आज जो गुंडागर्दी रिकॉर्ड हो रही है, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, या फिर किसी सरकारी अमले की हो, ऐसी हर गुंडागर्दी की रिकॉर्डिंग लेकर तिलचट्टों को आगे बढऩा चाहिए। जिन लोगों को तिलचट्टों की खूबियां नहीं मालूम हैं, वे जान लें कि ये सीमेंट खाकर भी जिंदा रह लेते हैं, और परमाणु युद्ध होने पर उसके बाद अगर कोई एक प्राणी धरती पर जिंदा रहेंगे, तो वे तिलचट्टे ही होंगे। इसलिए तिलचट्टा-पार्टी को, या ऐसी सोच रखने वाले लोगों को राजनीतिक गुंडागर्दी पर सवाल खड़े करते ही रहना चाहिए।  


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