संपादकीय
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का यह दूसरा कार्यकाल अभी सवा साल भी पूरा नहीं कर सका है, और पिछले चार दिनों में जो बात सबसे तल्खी से उभरकर आई है, वह यह कि आज ट्रम्प खुद, और उसके चक्कर में अमरीका दुनिया में सबसे अलग-थलग पड़ चुके हैं। आज अमरीका के कल तक के अपने पिट्ठू इजराइल के अलावा कोई देश उसके साथ बचा नहीं है, और खुद ट्रम्प आज इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का पिट्ठू दिख रहा है। अब तक जो पूरी दुनिया पर साम, दाम, दंड, भेद से राज करते आया था, आज अपनी गुंडागर्दी में दूसरे देशों की मदद मांग रहा है, लेकिन कोई देश उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। क्या पिछले सौ-पचास बरस में अमरीका का यह बदहाल किसी और राष्ट्रपति ने आज तक किया था? जिस अमरीका की तरफ देखे बिना नैटो देशों की सुबह नहीं होती थी, नैटो देशों के मुखिया सोने के पहले यह देखते थे कि क्या अमरीका का कोई संदेश आया है, या उससे जुड़ी हुई कोई जरूरी बात है, उसके बाद ही सोने जाते थे। आज उसी अमरीका के राष्ट्रपति की फौजी-मदद की अपील को एक-एक करके वे सारे देश खारिज कर चुके हैं जिन देशों ने मध्य-पूर्व के अलग-अलग देशों पर हमले में अब तक अमरीका का साथ दिया था, बदनामी और तोहमतें झेलने की कीमत पर भी। ट्रम्प आज ठीक उस तरह अकेला पड़ गया है जिस तरह रैबीजग्रस्त कोई कुत्ता अकेले रह जाता है, जिसे पकडक़र पिंजरे में बंद कर देना जरूरी समझा जाता है, आज ट्रम्प दुनिया के लिए रैबीज-डॉग जैसा ही खतरनाक हो चुका है, और उसके काटे की कोई वैक्सीन भी नहीं है। हम रैबीज-डॉग से तुलना नाजायज मानते हैं क्योंकि कोई कुत्ता खुद होकर तो रैबीज-संक्रमित होता नहीं है, ट्रम्प तो आज जो कुछ कर रहा है, सब अपनी बददिमागी से। ऐसे में एक बेकसूर कुत्ते की मिसाल का इस्तेमाल हम मजबूरी में इसलिए कर रहे हैं कि ट्रम्प दुनिया के लिए ठीक उतना ही खतरनाक हो चुका है। रैबीज-संक्रमित कुत्ते के सामने तो जिंदगी बचे-खुचे दिनों की रहती है, ट्रम्प के सामने तो करीब पौने तीन बरस का कार्यकाल बाकी है।
हमने आज इस पर लिखना जरूरी इसलिए समझा कि ईरान के मोर्चे पर एक समुद्री रास्ता खोलने के लिए ट्रम्प ने दुनिया भर के देशों से फौजी मदद मांगी है, और उसने खासकर नैटो-देशों को यह खुली धमकी दी है कि अगर वे साथ नहीं देते हैं, तो यह नैटो के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात होगी। अभी ईरान की जंग में अमरीकी जनता की मर्जी के खिलाफ अमरीका को फंसा देने वाले ट्रम्प की फौजी मदद की इस अपील पर फ्रांस ने कह दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। जापान ने भी सहयोग से इंकार कर दिया, और कहा कि वह तेल आयात पर निर्भर तो है, लेकिन अमरीका के साथ मिलकर युद्ध में शामिल नहीं होगा। दक्षिण कोरिया ने मना कर दिया, और कहा कि वे क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं, लेकिन अमरीकी गठबंधन में नहीं। ब्रिटेन ने भी अपने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया, और कहा कि वह कूटनीति पर जोर देगा। खाड़ी के अमरीकी-सहयोगी देशों, यूएई, और सउदी अरब ने भी जंग में अमरीका का साथ देने से मना कर दिया, और कहा कि उन्हें पहले सूचना नहीं दी गई, और वे अमरीका-इजराइल की नीति से असहमत भी हैं। खाड़ी के जिन देशों में अमरीका फौजी अड्डे बनाकर चल रहा है, वे भी आज लड़ाई में ईरान के हमले झेल रहे हैं, लेकिन जंग में वे साथ नहीं उतरे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने ट्रम्प की मांग को खारिज कर दिया, और कहा कि वे जंग में शामिल नहीं होगा। तुर्की ने ट्रम्प की अपील को अमरीका की गलती कहा, और जंग में शामिल होने से मना कर दिया। जर्मनी तो ग्रीनलैंड को लेकर अमरीकी गुंडागर्दी के समय से ट्रम्प का बड़ा मुखर आलोचक रहा है, और उसने ग्रीनलैंड और ईरान दोनों पर ट्रम्प के फैसलों को खारिज करते हुए खतरनाक बताया है। उसने अभी ट्रम्प की अपील पर कहा है कि वह अपने जहाज नहीं भेजेगा, यह उसकी लड़ाई नहीं है, और अमरीका को पहले कूटनीति पर जोर देना चाहिए। जर्मनी ने कहा कि ईरान पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा पर खतरा गहराएगा। जर्मनी ने यूरोपीय संघ के साथ मिलकर कहा कि वह ईरान के जंग में अमरीका को कोई फौजी समर्थन नहीं देगा, और ट्रम्प की नीतियां एकतरफा और खतरनाक हैं। इटली को ट्रम्प का करीबी माना जाता था, उसने ट्रम्प की धमकी को नामंजूर कर दिया है, और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पूरा सम्मान होना चाहिए। इटली ग्रीनलैंड से लेकर ईरान के जंग तक खुलकर अमरीका के खिलाफ है, और उसने साफ-साफ कहा कि यह जंग अमरीका की समस्या है, जिसे कि कूटनीति से हल किया जाना चाहिए। इस मामले में इटली यूरोपीय संघ के साथ है, जिसने यह कहा है कि वह ट्रम्प के हमलों के साथ नहीं हैं। इस पूरे महीने में ईरान पर हमले को लेकर यूरोपीय संघ ट्रम्प के खुलकर खिलाफ है, और वह इसके पहले भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर पूरी तरह से डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ था। ईरान पर ईयू ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। ईयू की मुखिया ने ईरान पर हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ कहा।
अमरीका के अंदर भी ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 36-40 फीसदी के आसपास है। जो मतदाता दोनों प्रमुख पार्टियों से परे हैं, वे बेचैन हैं। महंगाई, तरह-तरह के टैरिफ, और पेट्रोलियम अचानक बहुत महंगे हो जाने से लोग खफा हैं। खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी में फूट है, और संसद में जरूर इन सांसदों ने जंग के फैसले पर सरकार का साथ दे दिया है, लेकिन बाहर खुलकर कई रिपब्लिकन सांसद जंग के खिलाफ बोल रहे हैं। जिस हिन्दुस्तान में ट्रम्प के लिए हवन-पूजन होता था, वहां वह अब न सिर्फ मुस्लिम समुदाय की धिक्कार पा रहा है, बल्कि देश के विचारवान लोग भी अब उसे धिक्कार रहे हैं। ऐसे लोग और ऐसे महिला आंदोलनकारी भी, जो कि ईरान की मुल्ला-सरकार के कट्टरपंथ के खिलाफ रहते हैं, वे भी आज ईरान पर इस तरह के फौजी हमले के मुद्दे पर ईरान के साथ खड़े हो गए हैं।
ट्रम्प ने अपने मनमाने फैसलों से दुनिया को हजार किस्म की आर्थिक दिक्कतों में तो डाल ही दिया है, अब उसने दुनिया को एक असाधारण ईंधन-संकट में भी डाल दिया है, जो पता नहीं कब जाकर दूर हो पाएगा। तब तक खुद अमरीका के भीतर लगातार ऐसे सार्वजनिक बयान आ रहे हैं कि यह निहायत गैरजरूरी, नाजायज, और गैरकानूनी जंग किस तरह अमरीकी जनता पर आर्थिक बोझ भी है। यह धारणा भी घर करती जा रही है कि इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू आधी सदी से इस ताक में था कि कब अमरीका में कोई परले दर्जे का बेवकूफ राष्ट्रपति आए, जिसे वह झांसे में लेकर ईरान पर जंग में घसीट ले, और अब जाकर उसे मौका मिला है। अब लोगों को ट्रम्प, उसके उपराष्ट्रपति, और उसके दूसरे सत्ता-सहयोगी लोगों के पुराने वीडियो पोस्ट करने का मौका मिल रहा है जिसमेंं वह बीते बरसों में लगातार इस बात का विरोध करते रहा कि अमरीका को बाहर कोई जंग छेडऩी चाहिए, ईरान पर कोई हमला करना चाहिए। बड़बोले ट्रम्प के बड़े-बड़े शब्द अब निगलना उसके लिए भी मुमकिन नहीं रह गया है। अब देखना यही है कि रैबीज-डॉग की तरह लाइलाज, और खतरनाक हो चुके इस ट्रम्प को दुनिया पौने तीन बरस और कैसे झेलेगी, और इन बरसों में वह दुनिया में किस-किसको और काटेगा। अगर अमरीकी संसद महाभियोग चलाकर, या अमरीकी मंत्रिमंडल दिमागी रूप से विचलित ट्रम्प को हटा नहीं देता, तो यह ट्रम्प अपने बाकी कार्यकाल में अमरीका को एक अछूत देश बनाकर छोड़ेगा, जिसका अकेला सगा इजराइल बचेगा।


