संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : निजी सम्पत्ति पर उपासना, इजाजत लेने की जरूरत नहीं सरकार से हिफाजत का हक
सुनील कुमार ने लिखा है
16-Mar-2026 4:07 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : निजी सम्पत्ति पर उपासना, इजाजत लेने की जरूरत नहीं सरकार से हिफाजत का हक

पिछले हफ्ते भर से उत्तरप्रदेश का संभल एक बार फिर खबरों में बना हुआ है। वहां के एक मंझले पुलिस अफसर ईद की तैयारियों की शांति समिति की बैठक के वायरल हुए वीडियो में कहते सुनाई दे रहे हैं- बहुत सारे लोगों को खुजली मची हुई है कि ईरान और इजराइल-अमरीका का झगड़ा हो रहा है, अगर इतनी परेशानी है तो जहाज का टिकट कटवाओ, और ईरान चले जाओ। इस अफसर ने इसी बैठक में खुलकर कहा कि ईरान के लिए छाती पीटने वालों को ईरान चले जाना चाहिए। उसने यह भी कहा कि अगर सडक़ पर नमाज पढ़ी तो जेल भेज देंगे, इलाज करेंगे। जो लोग ईरान के समर्थन में या अमरीका-इजराइल के खिलाफ रील बना रहे हैं, उनके संदर्भ में इस अफसर ने बैठक में कहा-रील बनाई, तो रेल बना देंगे। इन हमलावर बयानों पर देश के बहुत से भले लोग लिख रहे हैं कि क्या अगर कोई हिन्दू अमरीका और इजराइल के लिए हवन और प्रार्थना करे, तो क्या पुलिस की यही जुबान होगी? देश के एक बड़े मुस्लिम नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा- यह मुल्क आपके बाप का नहीं है, पुलिस का काम हिफाजत देना है, धमकी देना नहीं है। कुल मिलाकर साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील चले आ रहा एक जिला, यूपी का संभल अब अपने एक खुले आक्रामक साम्प्रदायिक अफसर को और देख रहा है। इसके पहले भी यहां ऐसे दूसरे अफसर आ चुके हैं।

कल 15 मार्च को ही संयुक्त राष्ट्र में दुनिया भर के लिए इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की याद दिलाई है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि सरकारों को नफरत फैलाने वाले बयानों को रोकने, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, और भेदभाव के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेश ने कहा कि ऑनलाइन मंचों को हेट स्पीच और उत्पीडऩ समाप्त करने के लिए काम करना होगा जो किसी व्यक्ति के धर्म या उसकी आस्था के आधार पर उसे निशाना बनाते हैं। 15 मार्च के इस अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर एक और बड़ी चीज हुई। 

यूपी के ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण फैसला दिया कि किसी निजी सम्पत्ति में बनी हुई मस्जिद, या किसी निजी जगह पर नमाज पढऩे पर, या धार्मिक सभा आयोजित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी जिले संभल के साथ-साथ एक और जिले बदायूं के अफसरों को कड़ी फटकार लगाई कि निजी सम्पत्ति के भीतर धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रशासन से किसी भी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, और अफसर निजी परिसरों में होने वाली नमाज या प्रार्थनाओं में दखल न दें। अदालत ने ऐसी प्रार्थना या उपासना को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार माना, और अफसरों को फटकार लगाई कि अगर उन्हें कानून व्यवस्था बिगडऩे का डर है, तो या तो वे उसे संभालने की जिम्मेदारी दिखाएं, या अपना तबादला करवा लें, या इस्तीफा दे दें। अदालत ने कहा कि कोई धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक सडक़ या सम्पत्ति पर होती है, तभी पुलिस की इजाजत जरूरी होगी। इन दो जिलों में प्रशासन ने लोगों की निजी सम्पत्ति पर भी नमाज पढऩे पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम निजी सम्पत्ति पर, या मस्जिद में नमाज पढ़ रहे लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे शांतिपूर्ण ऐसा कर सकें, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का जिम्मा उस पर है। अदालत ने हैरानी जाहिर की कि पुलिस सुरक्षा देने के बजाय नमाज पढऩे पर ही रोक लगा रही थी। अदालत ने कहा कि पुलिस सिर्फ इस आधार पर किसी धार्मिक आयोजन को निजी सम्पत्ति पर नहीं रोक सकती कि वहां भीड़ है, या वहां तनाव हो सकता है। संभल में एक मस्जिद में रमजान के दौरान प्रशासन ने यह प्रतिबंध लगाया था कि वहां कुल 20 लोग नमाज पढ़ेंगे। दो अलग-अलग बेंचों में आए हुए दो अलग-अलग जिलों के मामलों में जजों ने अफसरों को फटकार लगाई है, और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला भी दिया है कि निजी स्थान पर धार्मिक गतिविधियां पूर्ण रूप से संरक्षित हैं, और संभावित तनाव के नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। कानून के विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरप्रदेश का यह फैसला इस साम्प्रदायिक बना दिए गए प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए राहत की बात है जो निजी मस्जिदों या घरों में प्रार्थना करते हैं, और उस पर पुलिस और प्रशासन तरह-तरह की नाजायज कार्रवाई करते हैं। कानून के जानकार कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये दो फैसले मिसाल कायम करते हैं कि निजी सम्पत्ति पर धार्मिक आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है। 

किसी हाईकोर्ट के फैसले देश के बाकी राज्यों के हाईकोर्ट में भी एक नजीर के रूप में तब तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जब तक उन प्रदेशों के हाईकोर्ट ने वैसे ही मामलों में उससे अलग या उलट कोई फैसला न दिया हो। अब हम सोचते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां हर इतवार किसी न किसी शहर या कस्बे में किसी निजी घर में होने वाली ईसाई प्रार्थना सभा पर लगातार साम्प्रदायिक लठैत संगठनों के जो हमले होते हैं, और धर्मांतरण के मनमानी आरोप लगाकर ईसाई समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया जाता है, बहुत से मामलों में तो कैमरों के सामने ही पुलिस की मौजूदगी में ये लठैत ईसाई स्त्री-पुरूषों को, पादरियों को पीटते हैं, घरों या चर्चों में तोडफ़ोड़ करते हैं, क्या ऐसी घटनाओं पर भी उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के इन फैसलों के नजीर की तरह इस्तेमाल किया जा सकेगा? वैसे तो कल इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया है, और यूपी में ये पूरी घटनाएं मुस्लिमों के खिलाफ चल रही पुलिस-प्रशासन की ज्यादती और हिंसा की रही हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ईसाईयों के खिलाफ जो कार्रवाई चल रही है, क्या उस पर भी सुप्रीम कोर्ट के वे ही फैसले लागू होंगे, जिनका हवाला इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों ने दिया है? या फिर यहां पर कोई अलग तर्क काम करेगा? यह समझ लेने की जरूरत है कि जब समाज में किसी संगठन को, या किसी आस्था या विचारधारा को हिंसक और हमलावर होने की छूट दी जाती है, बढ़ावा दिया जाता है, तो फिर उसे मनचाही सीमा पर रोक देना मुमकिन नहीं होता। उत्तरप्रदेश इस बात की एक जलती-सुलगती मिसाल है कि पुलिस और प्रशासन का धार्मिक ध्रुवीकरण कर देने से वे किस तरह बुलडोजर चलाने लगते हैं, किस तरह सत्ता को नापसंद धर्मों के खिलाफ असंवैधानिक कार्रवाई करने लगते हैं। अगर भारत नाम के इस लोकतंत्र के बाकी हिस्से यूपी जैसी प्रयोगशालाओं से सबक नहीं लेंगे, तो ऐसी प्रयोगशालाओं में बनने वाली जहरीली गैस जाने देश में कहां-कहां भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने जैसा काम करेगी। देश के कई प्रदेशों में हाईकोर्ट बुरी तरह निराश भी कर रहे हैं, और निराश तो कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। लोकतंत्र में यही लचीलापन रहता है कि इसके संस्थान इसे ही निराश कर सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


अन्य पोस्ट