संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : माहवारी की अनिवार्य छुट्टी से महिला-रोजगार पर असर?
सुनील कुमार ने लिखा है
14-Mar-2026 3:57 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : माहवारी की अनिवार्य छुट्टी से महिला-रोजगार पर असर?

भारत के सुप्रीम कोर्ट में कल एक जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह कहते हुए खारिज किया कि महिलाओं को माहवारी की छुट्टी का अनिवार्य हक देने से उनके ही रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन रोजगार देने वालों को जब यह पता लगेगा कि उन्हें कानूनी शर्त के तहत महिलाओं को हर महीने 3-4 दिन छुट्टी देनी ही होगी, तो ऐसे मालिक या कंपनी महिलाओं को काम पर रखने से ही परहेज करेंगे। इसके पहले एक पिछले सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने भी 2024 में इसी तरह की बात कही थी कि ऐसी छुट्टी महिलाओं को रोजगार से बाहर करने की वजह बन सकती है। जो लोग अदालत में इस जनहित याचिका को लेकर गए थे उनका तर्क है कि महिलाओं की माहवारी उनकी एक शारीरिक स्थिति है जो उनकी पसंद से नहीं रहती। ऐसे में अधिकतर महिलाएं कई तरह की तकलीफ महसूस करती हैं, और कुछ को तो छुट्टी भी लेनी पड़ती है। इसलिए मानवीयता के आधार पर या महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए, उनकी गरिमा की रक्षा के लिए ऐसा कानून बनाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि माहवारी को लेकर समाज के बीच में जिस तरह की एक नकारात्मक सोच बनी हुई है, वह भी कानूनी छुट्टी मिलने से कुछ कमजोर होगी। याचिका में तो यह तक कहा गया कि बहुत सी महिलाएं तकलीफ के ऐसे दिनों में भी काम पर जाने के लिए मजबूर होने पर काम ही छोड़ देती हैं।

वर्तमान और एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के तर्क को भी समझने की जरूरत है जिनका कहना है कि छोटे कारोबारों में, या अनौपचारिक क्षेत्रों में कर्मचारियों पर खर्च एक बड़ा अनुपात रहता है, और अगर वहां पर महिला कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से माहवारी की छुट्टी देनी पड़ेगी, तो लोग उन्हें काम पर रखने पर ही कतराएंगे। आज भी भारत में बहुत से देशों के मुकाबले कामगारों में महिलाओं का अनुपात बड़ा नीचे है, प्रसूति अवकाश और महिलाओं के बच्चों की देखरेख के कानूनी अवकाश जहां-जहां लागू हैं, वहां-वहां नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने में कतराते भी हैं।

इन दोनों पक्षों को देखने के साथ-साथ महाराष्ट्र की एक पुरानी चली आ रही नौबत की चर्चा भी जरूरी है। वहां बीड जिले में गन्ने के खेतों में काम करने वाली महिलाओं को लगातार 12-18 घंटे तक काम पर लगाया जाता है। उन्हें कोई छुट्टी नहीं दी जाती, शौचालय तक जाने का समय नहीं दिया जाता। ठेकेदार इन खेतों में पति-पत्नी दोनों को रोजी पर एकसाथ रखते हैं, और अगर पत्नी ने माहवारी की छुट्टी ली, तो मजदूरी दोनों की काट ली जाती है। इससे बचने के लिए वहां पर बड़ी संख्या में महिलाएं गर्भाशय निकलवा देती हैं ताकि माहवारी ही बंद हो जाए, और गन्ने के खेतों से छुट्टी लेने की नौबत ही न आए। इस पर महाराष्ट्र सरकार ने औपचारिक जांच भी करवाई थी, और पता लगा कि गन्ना उत्पादक बीड जिले में गर्भाशय निकलवाने की राष्ट्रीय औसत दर 3 फीसदी से आगे बढक़र कई गांवों में 36 फीसदी तक है। कुछ महिलाओं ने 20-30 साल की उम्र में ही गर्भाशय निकलवा दिए ताकि खेतों की मजदूरी न कटे। खेत-मजदूरी के ठेकेदार इस सर्जरी के लिए मजदूरों को कर्ज देते हैं जो कि बाद में उनकी रोजी से काटते हैं।

महाराष्ट्र की यह विकराल समस्या अपने पूरे अमानवीय रूप के साथ पूरी दुनिया में कुख्यात है। लेकिन इससे परे भी पूरे देश में हाल यही है कि महिलाओं को काम पर रखने के पहले नियोक्ता यह अंदाज लगा लेते हैं कि माहवारी, गर्भ, प्रसूति, शिशु पालन के साथ-साथ हर किस्म के त्यौहारों का बोझ भी महिलाओं पर आता है, और परिवारों में कोई भी बीमार रहे, रिश्तेदारी में कोई भी मरे, अड़ोस-पड़ोस से लेकर जात-बिरादरी तक कोई भी शादी हो, उसका पहला बोझ महिलाओं पर ही पड़ता है। इसलिए लोग महिलाओं को काम देने के पहले यह सोच लेते हैं कि उनकी छुट्टियां पुरूष सहकर्मियों के मुकाबले अधिक रहेंगी। इसके साथ-साथ यह बात भी रहती है कि शिफ्ट वाले काम में महिलाओं को रात की शिफ्ट में रखना बहुत ही कम जगहों पर संभव हो पाता है। इन सब वजहों से लोग महिलाओं को अधिक काम देना नहीं चाहते हैं। नियोक्ता की अपनी मजबूरियां रहती हैं, उसे बाजार के मुकाबले में अपनी कंपनी या अपने कारोबार को चलाना रहता है, उसे प्रकृति के नियमों से अधिक लेना-देना नहीं रहता। फिर कुछ श्रम कानून तो काम की जगहों पर एक संख्या से अधिक महिलाओं के रहने पर उनके बच्चों के लिए भी कुछ तरह के इंतजाम की शर्त रखते हैं। इन सबकी वजह से महिलाओं की उत्पादकता को कम मान लिया जाता है। अब अगर कानून माहवारी की छुट्टी को अनिवार्य बना देगा, तो इसका मतलब महिला के काम के दिन दस फीसदी तक कम हो जाना होगा, 30 दिनों के महीने में 3-4 दिनों की छुट्टी, कोई भी मालिक पसंद नहीं करेंगे।

मुख्य न्यायाधीश की यह फिक्र देश के कुछ अलग-अलग राज्यों में पिछले कुछ समय से लागू कानून के साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। बिहार में 1992 से ही सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन का माहवारी अवकाश मिलता है। कर्नाटक में अभी पिछले साल से सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में महीने में एक दिन की ऐसी छुट्टी अनिवार्य कर दी गई है। ओडिशा में 2024 से हर महीने एक दिन की छुट्टी मिलती है। केरल में 2023 से उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं को छुट्टी मिलती है, और उनकी हाजिरी 75 फीसदी के बजाय, 73 फीसदी ही अनिवार्य है। कुछ बड़ी निजी कंपनियां भारत में भी महिला कर्मचारियों को ये सहूलियत देती हैं।

पूरे देश में कुल कामगारों को अगर देखें, तो कुछ राज्य सरकारों के, और कुछ बहुत बड़ी निजी कंपनियों के सीमित कर्मचारियों के लिए ही ऐसा हक लागू किया गया है। इसलिए अभी यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि अगर इसे पूरे देश में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के लिए अनिवार्य किया जाता है, तो मालिक या नियोक्ता की प्रतिक्रिया इस पर किस तरह की होगी। ऐसा न हो कि महिलाओं को हक देने के लिए कोई ऐसा कानून बना दिया जाए जो कि व्यावहारिक रूप से उनके ही पूरे तबके की रोजगार की संभावनाओं को घटा दे। सरकारी क्षेत्र में तो महिला आरक्षण लागू है, लेकिन निजी क्षेत्रों में तो कोई महिला आरक्षण भी नहीं है, और कम काम मिलने पर भी पूरी तनख्वाह देना बिजनेस मैनेजमेंट की समझ के खिलाफ भी जा सकता है। आज गिनी-चुनी कंपनियां ही ऐसी हैं जो कि महिला अधिकारों, या दूसरे मजदूर कानूनों की फिक्र और परवाह करती है, बाकी तो आज महिलाओं से परे के भी मजदूर कानूनों की कोई परवाह नहीं करतीं। ऐसे में बाजार की क्या प्रतिक्रिया ऐसे माहवारी-अधिकार पर होगी, उसे भी सोचना चाहिए, वरना हवन करते महिलाओं के ही हाथ जलेंगे।

मौजूदा कानूनों को ही अगर सौ फीसदी कड़ाई के साथ लागू किया जाए, तो आज पूरे हिंदुस्तान के शहर अवैध निर्माण टूटने से मलबे में बदल जाएंगे। अगर मजदूर कानूनों को पूरी कड़ाई से लागू किया जाए, तो हिंदुस्तान के शायद 99 फीसदी मालिक जेल में होंगे, और कर्मचारी बेरोजगार। हमने बंगाल में यह देखा हुआ है कि ममता बनर्जी की सरकार ने जिस तरह टाटा के नैनो प्लांट का विरोध किया, उससे वह प्लांट ही वहां से निकलकर गुजरात चले गया। यह एक अलग बात है कि वह कार कई वजहों से आगे जाकर कामयाब नहीं हो पाई। लेकिन बहुत से संस्थान मजदूर कानूनों की कड़ाई के चलते हुए ऐसी नौबत में पहुंच जाते हैं कि वे नियमित कर्मचारी रखने के बजाय ठेका मजदूरों से काम करवाते हैं ताकि उन पर आर्थिक बोझ कम हो। यह बात सुनने में अच्छी नहीं लगेगी, लेकिन देश में कुछ अलग-अलग क्षेत्रों के मजदूरों-कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार के बनाए गए वेज बोर्ड की वजह से ऐसी नौबत आई है कि अधिकांश कारोबार कानून तोडऩे के लिए मजबूर हो गए हैं। कई कारोबार अपनी पसंद से भी कानून तोड़ते होंगे, लेकिन बहुत से लोग मजबूरी में भी ऐसा करते हैं क्योंकि मजदूर-कानूनों के तहत पूरा वेतन या पूरी मजदूरी देने पर वे बाजार से ही बाहर हो जाएंगे क्योंकि देशभर में उनके क्षेत्र के अधिकतर कारोबारी इसके बिना काम करते हैं, और सरकार कभी भी कानून सब पर लागू नहीं करवा पाती।

मुख्य न्यायाधीश की सोच हमें अधिक व्यवहारिक लगती है कि महिलाएं हों या कोई और तबका, उसके वर्गहितों को इस तरह लागू न किया जाए कि वह उनके लिए वर्ग-शत्रु बन जाए।

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