संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जंग में इंसान ही नहीं मरते, पर्यावरण की भी बुरी मौत..
सुनील कुमार ने लिखा है
12-Mar-2026 10:22 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  जंग में इंसान ही नहीं मरते, पर्यावरण की भी बुरी मौत..

आज जब ईरान पर अमरीका और इजराइल की मिलिट्री के जमकर हमले चल रहे हैं, और इसके जवाब में ईरान अपने अड़ोस-पड़ोस के उन देशों पर हमले कर रहा है जहां अमरीकी फौजी अड्डे हैं, तो इन धमाकों के बीच पर्यावरण की सोचने की किसी को न जरूरत लग रही है, न मुमकिन ही है। पांच बरस से रूस और यूक्रेन के बीच जंग चल रही है, पिछले कुछ बरसों में इजराइल ने फिलीस्तीन के गाजा पर जितने फौजी हमले किए हैं, पड़ोस के लेबनान पर वहां बसे हुए हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला पर हमले अभी भी जारी हैं, उनसे कितना प्रदूषण हो रहा है, पर्यावरण कितना तबाह हो रहा है, और धरती पर जंग और हथियारों को चलाने के लिए, इनके कारखानों से धरती पर कार्बन कितना बढ़ा है, पर्यावरण कितना चौपट हुआ है, उसका कोई हिसाब नहीं है। अभी तो ईरान के मोर्चे पर जंग बढ़ते ही दिख रही है, इसलिए उसके कम होने की अटकलें बेबुनियाद हैं। फिर कुछ छोटी-मोटी जंग और चलती रहती है, जो कि लड़ाई के दर्जे में गिनी जाती है। हाल के महीनों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने एक-दूसरे पर कुछ फौजी-हथियारबंद हमले किए हैं।

आज जब दुनिया वैसे जलवायु-संकट में है, जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में मौसम इस रफ्तार से बदल रहा है, और उसकी चरम मार धरती पर इतना बुरा असर डाल रही है कि लोगों ने ऐसी तबाही पहले देखी नहीं थी। फिर यह भी है कि यह तबाही बढ़ती ही चल रही है। अभी जंग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ का एक इंटरव्यू आ रहा था जिसमें वे बता रहे थे कि किस तरह दुनिया की फौजों को खड़ा करने के लिए बहुत सारे हथियारों और दूसरे सामानों का निर्माण होता है, बड़े-बड़े ढांचे बनते हैं, बड़े-बड़े जहाज बनते हैं, कुछ खास किस्म के हवाई जहाज और पनडुब्बी बनाने के लिए कुछ खास किस्म की धातु और दूसरी सामग्री इस्तेमाल होती है जिसे बनाने के लिए बहुत सारी ऊर्जा लगती है, और बहुत सारा प्रदूषण होता है। फिर इन फौजों के नियमित अभ्यास में भी गोला-बारूद से लेकर बाकी सामानों का उसी तरह इस्तेमाल होता है जिस तरह कि किसी असल जंग में। बड़े-बड़े जहाजी बेड़ों के साथ उनकी हिफाजत करते हुए दूसरे जहाजों का दस्ता चलता है, और इन सबमें खूब ईंधन लगता है। जंग में जब कोई जहाज डुबाया जाता है, जैसा कि अभी भारत के बगल में ही ईरान का एक फौजी जहाज अमरीकी पनडुब्बी ने समंदर में डुबा दिया, तो उससे भी हर तरह का प्रदूषण समंदर में चले गया, सौ से अधिक जिंदगियां भी गईं, लेकिन वह एक अलग मामला है।

एक अंदाज यह है कि दुनिया की फौजें मिलकर दुनिया भर में पैदा होने वाली ग्रीन हाऊस गैस का करीब साढ़े पांच फीसदी पैदा करती हैं। और यह मात्रा नागरिक विमानों, और मालवाहक जहाजों से होने वाली ग्रीन हाऊस गैसों से अधिक है। एक जानकार विशेषज्ञ बता रहे थे कि अपनी फौज की गोपनीयता बनाए रखने के लिए दुनिया की कोई भी फौज न तो अपने सामानों की पूरी जानकारी देती, न अपने अभ्यास की। इन सबसे उन्हें अपने पर खतरा दिखता है, इसलिए कोई भी देश अपनी फौजी हलचल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को अपने आंकड़ों में शामिल नहीं करते। जंग में किसी तरह की प्रदूषणमुक्त ऊर्जा इस्तेमाल नहीं होती। विमानों से लेकर जहाजों तक तरह-तरह के पेट्रोल और डीजल ही इस्तेमाल होते हैं, और वे नागरिक विमानों, और जहाजों के मुकाबले बहुत अधिक ईंधन खपाते हैं। इसलिए किसी भी युद्ध में, या फौजी हमले में दुनिया पर कार्बन का खूब सारा बोझ बढ़ जाता है।

अब पर्यावरण को होने वाले एक और नुकसान के बारे में सोचने की जरूरत है। दुश्मन के फौजी हमले की आशंका में, दुनिया भर के देशों ने कई तरह के भूमिगत ढांचे बनाए जाते हैं। संपन्न देश तो किसी परमाणु हमले की आशंका में ऐसे बंकर बनाकर उसमें लंबे समय तक लोगों को रखने के हिसाब से वहां तरह-तरह का खाना-पानी भी इकट्ठा करते हैं, और वह पड़े-पड़े जब खराब होता है, तो वह धरती की छाती पर बोझ रहता ही है। लेकिन सीधे फौजी हमलों को रोकने के लिए बहुत अधिक कांक्रीट वाले ढांचे बनाए जाते हैं। कुछ महीने पहले ही अमरीका ने ईरान के ऐसे परमाणु-परीक्षण ठिकानों पर बहुत बड़े-बड़े और विनाशकारी बम गिराए थे जिनके बारे में कहा गया था कि वे सैकड़ों फीट कांक्रीट को भी भेद सकते हैं। मतलब यही है कि फौजी तैयारियों के लिए दुनिया के देश जो ढांचे खड़े करते हैं, वे धरती पर कार्बन बहुत अधिक बढ़ाते हैं। अब अगर गाजा को देखें, तो जैसा कि हम बार-बार लिखते आए हैं, वह धरती का सबसे बड़ा मलबा बन गया है। दसियों लाख लोगों की आबादी की बसाहट आज खंडहर भी नहीं बची है, वह मटियामेट हो चुकी है, और धरती पर बिछी हुई है। अब इसका निपटारा कैसे होगा, यह मलबा कहां जाएगा, जब कभी भी पुनर्निर्माण होगा, तब इस मलबे से कैसे जूझेंगे, और एक बार फिर नई इमारतें बनाने के लिए फिर लोहा, सीमेंट, और कांक्रीट लगेगा। यह हाल आज तेहरान में भी हो रहा है, लेबनान में भी हो रहा है, और दूसरे कई देशों में भी। इस तरह जंग धरती पर वैसे भी तबाही की तरफ तेजी से बढ़ रहे जलवायु परिवर्तन में इतना कुछ जोड़ रही है, कि उसकी भरपाई बरसों तक नहीं हो सकेगी।

जंग और फौजी लड़ाई आमतौर पर देशों की जीत या हार, और फौजियों, या नागरिकों की मौत के आंकड़ों से आंकी जाती हैं। लेकिन उसे जलवायु और पर्यावरण के साथ जोडक़र देखना जरूरी है क्योंकि जब हम जरा-जरा से कार्बन फुटप्रिंट को रोकने के बारे में सोचते हैं, तो वैसे में एक पहाड़ जितना कार्बन फुटप्रिंट धरती पर बरसा दिया जाए, तो छोटी-मोटी सारी कोशिशें बेकार साबित हो जाती हैं। यह सिलसिला जंग की तबाही के साथ बढ़ता चल रहा है, और अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने तो पहले ही जलवायु परिवर्तन धीमी करने की कोशिशों से अमरीका को बाहर कर लिया है, और इन कोशिशों को धरती का सबसे बड़ा हरित-धोखा कहा है। ऐसे तानाशाह की नजरों में पर्यावरण कोई मुद्दा हो भी नहीं सकता, उसके लिए दूर तक की फिक्र करने वाले महान नेता लगते हैं, और ट्रम्प जैसे घटिया इंसान से महानता की उम्मीद उसके बीवी-बच्चे भी शायद नहीं करते होंगे।

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