संपादकीय
तमिलनाडु की एक खबर है कि किसी यूट्यूब चैनल पर वजन कम करने की तरकीब देखकर एक कॉलेज छात्रा ने बोरेक्स खा लिया, और उसकी मौत हो गई। इसे कुछ भारतीय पारंपरिक दवाओं में बहुत ही कम मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लेने का मतलब जहरीला कीटनाशक खाने जैसा होता है। इस छात्रा के पिता का कहना है कि उन्होंने यूट्यूब चैनलों पर होने वाले मेडिकल-दावों को लेकर अपनी बेटी को भरोसा न करने की सलाह दी थी। यह मामला सोशल मीडिया पर तैरने वाली बहुत सी दूसरी झूठी जानकारियों जैसा है जिन्हें अच्छे-भले जिम्मेदार दिखने और माने जाने वाले लोग भी अंधाधुंध रफ्तार से चारों तरफ फैलाते हैं। वॉट्सऐप जैसी मुफ्त की सहूलियत के चलते लोग सुबह उठने के बाद न मुंह धोते हैं, न फारिग होते हैं, बल्कि रात भर में उनके फोन पर आए हुए कचरे, झूठ, और अफवाह को चारों तरफ फैलाने में लग जाते हैं। इस बारे में कोई डॉक्टरी रिसर्च तो नहीं हुई है, लेकिन मुंहअंधेरे ही कई लोग जिस रफ्तार से तरह-तरह की नफरत, झूठ, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, और सीधे नुकसान पहुंचाने वाली झूठी मेडिकल जानकारियों को फैलाते हैं, उनका वह समर्पण देखने लायक रहता है, और ऐसा लगता है कि इसके बिना उनका पेट साफ नहीं होता।
टेक्नॉलॉजी ने जो मुफ्त के औजार लोगों को दे दिए हैं, लोग उनका इतना गैरजिम्मेदार इस्तेमाल करते हैं कि वे समाज को बर्बाद करने के हथियार में तब्दील हो जाते हैं। टेक्नॉलॉजी ने लोगों को फल-सब्जी काटने के लिए चाकू दिया, और लोग हैं कि उससे दूसरों की अतडिय़ां काटने लगे। अभी हम यह तो अंदाज नहीं लगा पा रहे कि बेबुनियाद मेडिकल-दावे फैलाना अधिक खतरनाक है, या नफरत फैलाना, खतरनाक तो दोनों ही हैं, लेकिन नफरत की शिनाख्त उसे पाने वाले लोग कुछ आसानी से पकड़ सकते हैं, मेडिकल-दावों की, खानपान की झूठी सलाह बढ़ाने वाले लोग उतनी आसानी से झूठे साबित नहीं हो पाते। अब बहुत से लोग ऐसी जानकारियों के नीचे किसी डॉक्टर का नाम, किसी बड़े अस्पताल का नाम देखकर दूसरों को भी कुछ खिलाना-पिलाना शुरू कर देते हैं, और नतीजा खतरनाक निकलता है। इंसानों को कई ऐसी बीमारियां होती हैं जिन्हें चिकित्सा विज्ञान या तो आसानी से ठीक नहीं कर सकता, या पूरी तरह से दूर नहीं कर सकता। खास ऐसी बीमारियों को ठीक और दूर करने के दावे वाले कई वीडियो कुछ डॉक्टरी पढ़े-लिखे लोग भी बनाकर पोस्ट करते हैं, और डायबिटीज जैसी बीमारी को दूर करने के दावे वाले उनके वीडियो के खिलाफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन जैसी डॉक्टरी संस्था भी सार्वजनिक रूप से भांडाफोड़ करती रहती है, लेकिन सनसनी फैलाने के मामले में अतिउत्साही सोशल मीडिया वाले लोग किसी वैज्ञानिक बात को अपने गले उतरने नहीं देते, बल्कि एक ऐसा मानसिक फिल्टर गले में लगा लेते हैं कि कोई वैज्ञानिक बात गले उतर न जाए।
झूठ को फैलाने में गैरजिम्मेदार लोगों की क्षमता का विज्ञान कोई मुकाबला नहीं कर सकता। कोरोना के पूरे दौर में यह देखा हुआ है कि अपनी दवाइयों से कोरोना को ठीक करने के झूठे दावे करने वाले रामदेव सरीखे लोग भी केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ मंच से झूठ फैलाते रहे, और डॉक्टरों के राष्ट्रीय संगठन भी आसानी से उसका मुकाबला नहीं कर सके। उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा, तब जाकर बाबा का झूठ कुछ थम पाया। इस तरह धर्म, आध्यात्म, योग, और देश की पुरानी परंपराओं के नाम का बेजा इस्तेमाल करके विज्ञान विरोधी बातें, और झूठ फैलाना चलते रहता है। इन बातों में जनता के जिन तबकों का भरोसा रहता है, वे इनके झंडेतले फैलाए जा रहे झूठ पर भी भरोसा करने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं, कि ऐसा न हो कि झूठ आए, और वे लपकने से चूक जाएं।
सनसनीखेज झूठ पर भरोसा करने का पढ़ाई-लिखाई से बहुत कम लेना-देना होता है। न सिर्फ भारत, बल्कि विकसित, और अधिक पढ़े-लिखे पश्चिमी देशों को देखें, तो वहां भी धर्म पर अंधविश्वास रखने वाले लोग हर किस्म के झूठ को अधिक तेजी और उत्साह से लपकते हैं। दुनिया में धर्म पर विश्वास करने वाले कम संख्या में ऐसे जिम्मेदार लोग भी रहते हैं जो सच और झूठ के फर्क को समझते हैं। आमतौर पर धर्म लोगों में अंधविश्वास भरने की, और उन्हें विज्ञान से दूर करने की ताकत अधिक रखता है। धर्म के नाम पर पाखंड करने वाले लोग नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करते हैं, और दूसरी तरफ वेलेंटाइन डे जैसे मासूम प्रेम-दिवस को मनाने से मना करते हैं, और उसे मातृ-पितृ पूजन दिवस बनवा देते हैं। हमारी यह बात कुछ अधिक बिखरी हुई लग सकती है, जो कि मेडिकल-अफवाहों से शुरू होकर धर्म के कुछ बुरे असर तक पहुंच गई है, लेकिन आस्था कब अंधविश्वास में बदल जाती है, कब वह अवैज्ञानिक झूठ को अपना लेती है, इसके बीच कोई सीमा रेखाएं नहीं हैं। इसलिए अगर लोगों को तरह-तरह के झूठ, अफवाह, और नफरत से बचना है, तो उन्हें अपनी खुद की समझ को बहुत मजबूती से विज्ञान, लोकतंत्र, और मानवीय मूल्यों की मजबूत बुनियाद पर टिकाकर रखना पड़ेगा, और इन तमाम पैमानों पर किसी बात के खरे उतरने के बाद ही उस पर भरोसा करना होगा। आज दुनिया में सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों की मेहरबानी से नकारात्मक बातें, नफरत, झूठ, अंधविश्वास, साम्प्रदायिकता, और चिकित्सा-फरेब जैसी चीजें लगातार फैल रही हैं। लोगों को किसी भी बात को अभी ऊपर लिखे गए पैमानों पर परखे बिना आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि किसी गैरजिम्मेदार ने उन्हें कुछ भेज दिया है, तो उसे आगे भेजना किसी भी तरह उनकी जिम्मेदारी नहीं है। लोगों को एक तस्वीर याद होगी जो सोशल मीडिया पर कई तरह से पोस्ट होती है, उसमें कुछ दीवारों के पार बसे हुए लोग एक-दूसरे के अहाते में घमेला भर-भरकर गंदगी डाल रहे हैं, सब अपने अहाते में आई हुई गंदगी को तुरंत आगे बढ़ा रहे हैं। आज असल जिंदगी में हालत कुछ इसी तरह की हो गई है। हमारी सलाह यही है कि पूरी जांच-पड़ताल करके जब कोई जानकारी पूरी तरह से पुख्ता साबित हो जाए, उसके बाद भी यह जरूर सोचें कि क्या इसे आगे बढ़ाना आपकी कोई जिम्मेदारी है? आज लोग सूचना और सामग्री के ओवरलोड से थके हुए हैं, और कई लोग ऐसे लोगों को ब्लॉक करते चलते हैं, जो बिना किसी मतलब के गुडमॉर्निंग मैसेज, धार्मिक संदेश हर दिन अपने संपर्क के सारे लोगों को भेजते हैं। आज किसी के पास इतना वक्त नहीं है कि ऐसे मासूम संदेश भी रोज देख सकें। और झूठ या अफवाह, नफरत या साम्प्रदायिकता को झेलने का वक्त तो किसी के भी पास नहीं होना चाहिए, जिन लोगों को ऐसी बातें पसंद आती हैं, उन्हें दिमाग के रोगों के मानसिक चिकित्सकों से अपनी जांच करवानी चाहिए, इलाज भी।


