संपादकीय
तस्वीर / सोशल मीडिया
भारत के ताजा इतिहास में पिछले दो सौ बरसों में कई तरह के आंदोलन हुए। दलितों से छुआछूत खत्म करने का आंदोलन, विधवाओं की दुबारा शादी करवाने का आंदोलन, सतीप्रथा खत्म करने का आंदोलन, बालविवाह रोकने का आंदोलन, महिला शिक्षा, दलितों के मंदिर प्रवेश के आंदोलन, पर्दा प्रथा का विरोध जैसे बहुत से आंदोलन समय-समय पर हुए। नतीजा यह निकला कि इनमें से कई चीजों को सुधारने के लिए कानून बने, और बाकी के लिए सामाजिक वातावरण में बदलाव आया। इनसे परे कन्या भ्रूण हत्या जैसी हिंसक सामाजिक परंपरा को खत्म करने के लिए, दहेज प्रताडऩा को खत्म करने के लिए बहुत ही कड़ी सजा रखी गई, और नतीजा यह हुआ कि इनमें भी कमी आई। लेकिन इतनी हिंसक सामाजिक परंपराओं से परे बहुत सी कम हिंसक सामाजिक परंपराएं अब भी चल रही हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है।
आज की यह चर्चा हम उत्तराखंड की एक पंचायत के एक फैसले को देखते हुए छेड़ रहे हैं। देहरादून जिले के दो गांवों में पंचायत ने यह नियम लागू किया है कि किसी भी शादी-ब्याह या सामाजिक समारोह में महिलाएं सोने के कुल तीन गहने ही पहन सकेंगी। वे मंगलसूत्र, नाक की बाली, और कान की बाली, इन्हीं को पहनेंगी। इससे ज्यादा गहने पहनने पर पंचायत को 50 हजार रूपए का जुर्माना देना होगा। इस फैसले के पीछे का तर्क यह बताया गया है कि सोने की बढ़ती कीमतों और दिखावे की होड़ को रोकने के लिए इसे लागू किया जा रहा है। पंचायत का मानना है कि शादी-ब्याह के मौके पर गहने खरीदने का दबाव रहता है, और समाज में बराबरी भी इससे खत्म होती है। दूसरी तरफ कुछ महिलाओं ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि खर्चे में कमी लानी हो तो मर्द दारू पीना छोड़ें, और बड़ी दावतें न करें, दारू और मांसाहार पर भी रोक लगाई जाए।
हम अभी उत्तराखंड की पंचायत के इस फैसले के गुण-दोष पर नहीं जा रहे, लेकिन समाज में किसी भी तरह की फिजूलखर्ची को लेकर एक जागरूकता की जरूरत पर जरूर बात करना चाहते हैं। अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोगों ने अलग-अलग प्रदेशों में समय-समय पर ऐसे फैसले भी लिए हैं कि शादियां दिन में की जाएं, ताकि रात में रौशनी का खर्च बचे। कुछ जगहों पर शादी की दावत में सीमित पकवान रखने के सामाजिक फैसले भी लागू किए गए हैं। कुछ जगहों पर बारातियों की संख्या सीमित करने की रोक लगी है। अभी-अभी कुछ समाजों ने इन दिनों अधिक लोकप्रिय हो गई शादी के पहले की फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी को रोकने की बात भी की है। कुछ लोग बैंड पार्टी और डीजे के खिलाफ फैसले ले चुके हैं। ऐसे फैसले दशकों से हम देखते आ रहे हैं, और वे तभी तक लागू हो पाते हैं, जब तक कोई संपन्न या ताकतवर व्यक्ति इनको तोडऩा न चाहे। कोई सत्तारूढ़ नेता, या कोई अतिसंपन्न व्यक्ति जब चाहे तब ऐसे नियमों को तोड़ लेते हैं, और समाज में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं होती।
आज दिक्कत यह है कि हर परिवार शादी-ब्याह के मौके पर, और कई जगहों पर तो मृत्युभोज के मौके पर भी, अपनी क्षमता और औकात से आगे बढक़र फिजूलखर्ची करने के लिए मजबूर रहते हैं। हर परिवार अपने से ठीक ऊपर के संपन्न तबके को देखकर खर्च के उसके पैमानों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, अपनी पूरी बचत खत्म करते हैं, गहने बेचते हैं, और कर्ज भी लेते हैं। बेटी की शादी, या बेटे की शादी कौन बार-बार होती है, यही सामाजिक और पारिवारिक उलाहना लोगों को उनकी औकात भुला देता है। इस सिलसिले के खिलाफ कुछ समाजों ने सामूहिक विवाह का चलन भी शुरू किया जिसमें सीमित संख्या में मेहमान रहते हैं, कोई अधिक लेन-देन नहीं होता, और किफायत में सब कुछ निपटता है। लेकिन जहां अलग-अलग जातियां किसी विवाद की नौबत आने पर एकजुट हो जाती हैं, किसी सुधार के लिए वे उस तरह एकजुट नहीं होतीं, और यही एक बात बताती है कि आज समाज में उतनी साख वाले वजनदार नेता नहीं रह गए हैं जिनकी बात सुनकर लोग फिजूलखर्ची या दूसरी बुराईयों को छोडऩे लगें। भारत के इतिहास में बड़े-बड़े समाज सुधारक रहे हैं, और पिछली दो सदियों में ये सुधारक राजनीति से परे भी ताकतवर थे। लेकिन अभी पिछली आधी सदी में लगातार सामाजिक नेता कम और कमजोर होते चले गए, और राजनीति ही मानो सब कुछ हो गई। राजनीति को वोटरों की बहुतायत को खुश रखने की अपनी बेबसी के चलते किसी तरह का सुधार नहीं सुहाता है, बल्कि उसे दकियानूसी एकजुटता अधिक सहूलियत की लगती है।
आज जरूरत ऐसे लोगों की है जो कि सबसे पहले किफायत की, सुधार की अपनी मिसाल पेश करें, और फिर अपने दायरे के लोगों को धीरे-धीरे प्रभावित करें, और कामयाबी होने पर उसके हौसले से आगे बढ़ें। सामाजिक साख का सिलसिला बड़ा धीमा और मुश्किल हो सकता है क्योंकि धर्म और जाति पर आधारित समाजों ने नकारात्मकता के लिए बड़ी तेजी से एकजुट होना सीख लिया है, कट्टरता सबको तेजी से जोड़ लेती है, लेकिन सुधार और समझदारी की कोई बात, किफायत के तरीके, लोगों को आसानी से नहीं जोड़ पाते, वे लोगों की दकियानूसीपन की चर्बी पर जोर डालते हैं। उत्तराखंड की पंचायत का फैसला हो सकता है कि तर्कसंगत और न्यायसंगत न हो, और यह भी हो सकता है कि पंचायत के मर्दों के लिए गए फैसले के खिलाफ महिलाएं जो सवाल उठा रही हैं, वह जवाबी सुधार करने की भी जरूरत हो। जो भी तरीका इस्तेमाल हो, शुरूआत जहां से भी हो, लोगों को किफायत और सुधार की तरफ बढऩा ही होगा। समाज के किसी भी आर्थिक स्तर के परिवार पर सामाजिक दिखावा बोझ बनता ही है, लेकिन उनके निजी आर्थिक तनाव के साथ-साथ हर तरह का दिखावा धरती पर भी एक बोझ बनता है, और धरती के साधन-सुविधा एक अमूमन अनुत्पादक काम में खर्च होते हैं। कहने के लिए कुछ लोग गिना सकते हैं कि हर फिजूलखर्ची में कुछ न कुछ लोगों को काम और रोजगार मिलता है, लेकिन ऐसे रोजगार और काम कोई दीर्घकालीन उत्पादकता नहीं दिलाते हैं। समाज में सुधार की कोशिश राजनीति से परे ही मुमकिन हो सकती है, और उसी के लिए लोगों को मेहनत करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


