संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भवन आलीशान बनने से संसदीय काम बेहतर होगा?
सुनील कुमार ने लिखा है
01-Nov-2025 5:52 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भवन आलीशान बनने से संसदीय काम बेहतर होगा?

छत्तीसगढ़ में इस वक्त नए विधानसभा भवन का उद्घाटन चल रहा है, और टीवी स्क्रीन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फीता काटते दिख रहे हैं। महलों सरीखी नई इमारत भीतर से, और आसमान से खूबसूरती की एक मिसाल दिख रही है। अभी 90 सदस्यों वाले सदन में अगले कुछ बरस में डी-लिमिटेशन, और महिला आरक्षण के बाद 120 सदस्य हो जाने की उम्मीद है, लेकिन इस सदन में 200 लोगों के बैठने का इंतजाम रखा गया है जो कि अगली आधी सदी भी शायद कम न पड़े। छत्तीसगढ़ एक संपन्न राज्य बनते चल रहा है, देश में इसकी नई राजधानी, नया रायपुर एक सबसे अच्छी राजधानी बनी है, और उसका विकास चल रहा है। पुराने व्यस्त शहर से निकलकर मंत्री-मुख्यमंत्रियों के बंगले, राजभवन, विधानसभा, विधायक विश्रामगृह, और अफसरों के बंगले, ये सब नई राजधानी में चले जाएंगे, वहां बसाहट होगी, और पुराने शहर में सांस लेने को थोड़ी सी जगह बढ़ेगी।

आज हम विधानसभा पर केन्द्रित कुछ बातें लिखना चाहते हैं क्योंकि यह 25 बरस पूरे कर रही है, राज्य नया बना तो राजकुमार कॉलेज में एक शामियाने में विधानसभा शुरू हुई, जो बाद में केन्द्र सरकार के एक प्रशिक्षण केन्द्र की इमारत में गई, और अभी तक वहीं चल रही थी। अब इस नए विधानसभा भवन में सत्ता की सभी बांहों ने अपनी-अपनी मर्जी से सुख-सहूलियतें जुटा ली हैं, और खूबसूरती और भव्यता तो ऐसे किसी भी नए ढांचे में कल्पना से परे रहती ही है। अब 52 एकड़ जगह पर बनी इस विधानसभा और उसके कैम्पस को नीचे-ऊपर, भीतर-बाहर सभी तरफ से देख लेने के बाद मन में यह सवाल उठता है कि इंजीनियर-आर्किटेक्ट और सरकार-विधानसभा का सपना तो पूरा हो गया, विधानसभा से जनता के सपने पूरे होने में इस नई भव्यता से कोई बढ़ोत्तरी होगी, या यह सिर्फ सदन के सदस्यों के सुख की बढ़ोत्तरी रह जाएगी?

प्रदेश में विधानसभा, और देश में संसद ऐसी जगह रहती हैं जहां न सिर्फ विपक्ष, बल्कि सत्ता पक्ष के निर्वाचित सदस्य भी सरकार को कटघरे में रखते हैं, और वहां जानकारी देना सरकार की मजबूरी रहती है। सरकारें आमतौर पर विधानसभा में घिरने से बचती हैं, वे चाहती हैं कि सदन के सत्र कम से कम दिन रहें, और उन दिनों में भी कम से कम घंटे काम चले। सरकारें अपना जो सरकारी कामकाज विधानसभा में करवाना चाहती है, वह तो सदस्यों का बाहुबल पर्याप्त होने पर बिना किसी बहस के हो जाता है, और अब विस्तृत बहस की परंपरा धीरे-धीरे घटती भी चल रही है। जब कभी सत्ता और विपक्ष के बीच, या सदस्यों के बीच आपस में किसी बात खुलकर चर्चा नहीं होती है, तो प्रस्तावित कानून में कई ऐसी बातें रह जाती हैं जो कि बाद में लोगों को तकलीफ देती हैं। दूसरी तरफ चर्चा न होने से देश की जनता को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से अपनी बात रखने का कोई मौका भी नहीं मिलता। इसलिए जब कभी देश या किसी प्रदेश में सदन में हंगामा चलते रहता है, तो हम यह मानते हैं कि इसका सबसे बड़ा नुकसान उस आम जनता को रहता है जो ऐसे सदनों में अपने मुद्दों पर चर्चा की उम्मीद करती है, क्योंकि वह खुद तो सदन में जा नहीं सकती।

पिछले बरसों में हम लगातार यह देखते आ रहे हैं कि एक बरस में लोकसभा और राज्यसभा औसतन कितने दिन काम करती हैं, और काम के उन दिनों में वे कितने घंटे काम करती हैं। पहली नजर में जो आंकड़े मिले हैं, वे बताते हैं कि लोकसभा और राज्यसभा सालभर में कुल 50-60 दिन काम कर रही हैं, जबकि संसदीय सिफारिश साल में सौ से अधिक दिन काम करने की है। इस पर भी तरह-तरह के हंगामों से प्रभावित काम को देखें, तो काम के घंटे और घट जाते हैं। 2024 में संसद में कुल 285 घंटे काम किया। और जिस ब्रिटिश संसद के मॉडल पर भारतीय संसदीय व्यवस्था बनी है, वह इससे दो-तीन गुना अधिक घंटे काम करती है। 2024 में ही ब्रिटिश संसद ने 6 सौ से 7 सौ घंटे काम किया। हम संसद की मिसाल इसलिए दे रहे हैं कि प्रदेशों की विधानसभाएं मिसाल के लिए संसद की तरफ देखती हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इतना छोटा हो गया है कि किसी भी कोने से आधे दिन में सफर करके राजधानी पहुंचा जा सकता है। विधायकों के लिए राजधानी में सहूलियतें बहुत हैं, और नई विधानसभा के साथ-साथ नई राजधानी में सहूलियतें भी बढ़ जाएंगी, और सारे सरकारी दफ्तर भी वहीं रहेंगे। ऐसे में विधायकों के लिए सब कुछ एक साथ और सुविधाजनक हो जाएगा। चाहे सत्ता के लिए असुविधा की बात हो, हम यही चाहेंगे कि विधानसभा में काम के दिन बढऩे चाहिए, और काम के दिनों में घंटे बढऩे चाहिए। यह तो हम हमेशा से लिखते आए हैं कि विपक्ष को बहिष्कार और बहिर्गमन से बचना चाहिए, और जनता के हक की बात अधिक से अधिक सामने रखनी चाहिए, सरकार से सवाल पूछने चाहिए। सदन की कार्रवाई छोडक़र जाना विरोध करने का एक नकारात्मक तरीका है जिससे जनता के हक का मौका घटता है।

अब चूंकि विधानसभा में सुख-सुविधा आसमान पर है, इसलिए इसके सत्र लंबे किए जाने चाहिए, अधिक दिनों तक प्रदेश की बात होनी चाहिए, और विधायकों पर तो किसी निजी खर्च का बोझ भी लंबे सत्र से पड़ता नहीं है, बल्कि उन्हें सहूलियतों के साथ-साथ भत्ते भी मिलते हैं। हर संवैधानिक संस्था में मौजूदा परंपराओं से आगे बढक़र बहुत कुछ नया करने की संभावना रहती है। लीक से हटकर कुछ करना आमतौर पर बहुत सहूलियत का नहीं माना जाता, लेकिन किसी भी इतिहास में नाम तो ऐसे ही लोगों का होता है जो कुछ मौलिक या असाधारण करते हैं। आज के विधानसभा अध्यक्ष डॉ.रमन सिंह सांसद और केन्द्रीय राज्यमंत्री भी रहे हुए हैं, और तीन बार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री। अपने खुशनुमा मिजाज के कारण वे विधानसभा में सभी पक्षों को अधिक मान्य भी हैं। पार्टी के भीतर भी उनका वजन काफी है, और वे सरकार को भी अधिक चर्चा के लिए सहमत कर सकते हैं। अब यह एक अलग बात है कि यह राज्य पिछले कई बरस से निर्धारित सत्रों में भी कटौती देख रहा है, क्योंकि सरकार के पास कोई संसदीय कार्य नहीं बच जाता, और विपक्ष के पास विरोध करने को कोई मुद्दा। यह प्रदेश की एक संसदीय विफलता है, जिसे दूर करने की कोशिश डॉ.रमन सिंह को करनी चाहिए। हमारा मानना है कि लोकसभा या विधानसभा का कामकाज साल में सौ दिन तो चलना ही चाहिए, और मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। अभी भारत की संसदीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच खेमेबाजी इतनी अधिक रहती है कि सांसदों या विधायकों के मौलिक चिंतन को चर्चा में आने का मौका ही नहीं मिलता, और सदस्य अपनी-अपनी पार्टी की सोच और उसके फैसलों से बंधे रहते हैं। इस पूरी तस्वीर को बदलना अकेले छत्तीसगढ़ विधानसभा के बस का नहीं है, लेकिन अभी आधे से अधिक कार्यकाल इसी विधानसभा का बाकी है, और बेहतर संसदीय कामकाज की एक परंपरा कायम करने का समय भी है। देखते हैं इमारत जितनी शानदार है, काम भी उतना शानदार होता है या नहीं, वरना बहुत पहले किसी ने एक लाईन लिखी थी, ऊंची दुकान, फीका पकवान। भारतीय संसद के ऐतिहासिक आलीशान बने नए भवन को लेकर भी यही बात कही जाती है।

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