संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : त्यौहारों का विश्लेषण, और मूल्यांकन करना कैसा रहेगा?
सुनील कुमार ने लिखा है
28-Oct-2025 4:44 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : त्यौहारों का विश्लेषण, और मूल्यांकन करना कैसा रहेगा?

भारत धर्मप्रधान देश है। एक समय यह कृषिप्रधान हुआ करता था, बाद में कृषि, सरकारी समर्थन मूल्य, कर्जमाफी, मुफ्त बिजली, और सरकार के आयात-निर्यात नियमों की मोहताज होकर रह गई। देश में हरितक्रांति जरूर आ गई, लेकिन खेतों में हरियाली लाने वाले किसान सरकार की योजनाओं, चुनावी घोषणाओं, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की नीतियों के सहारे ही रह गए। ऐसे देश में खेती के बाद दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण काम धर्म का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग धर्मों में, अलग-अलग जातियों में तरह-तरह के धर्म साल भर चलते ही रहते हैं। दुनिया के कुछ विकसित देशों की तरह भारत में अभी लोगों का अनास्थावादी, या नास्तिक होना लोकप्रिय नहीं हुआ है, इसलिए नास्तिकता मोटेतौर पर किताबों तक सीमित है, और असल जिंदगी में अधिकतर लोग धर्मालु हैं। लेकिन जिस तरह एक किताब या फिल्म का नाम है, फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, भारत में भी लोगों के शंकालु से लेकर धर्मालु तक, और धर्मान्ध से लेकर साम्प्रदायिक होने तक, ऐसे 50 अलग-अलग शेड दिखते हैं।

धार्मिक त्यौहारों की सोचते हुए एक बात लगती है कि किस धर्म, या किस जाति के कौन से त्यौहार कितने उस समुदाय के भीतर के हैं, और कितने सचमुच ही सामाजिक हैं, दूसरे समुदायों के लिए भी हैं। त्यौहारों का ऐसा अनौपचारिक विश्लेषण सुझाता है कि त्यौहारों को कुछ पैमानों पर कसा जा सकता है कि उनका सामाजिक योगदान कितना है। अब जैसे किसी धर्म के किसी त्यौहार का मूल्यांकन करने के लिए यह सोचना चाहिए कि उसे मनाते हुए उस तबके के भीतर अमीर और गरीब का फर्क कितना झलकता है? क्या गरीब भी उस त्यौहार को मना सकते हैं, या फिर वह गरीबों पर महज बोझ रहता है? क्या लोगों के बीच इस त्यौहार पर अपने से कमजोर लोगों की मदद करने की कोई सोच रहती है, या फिर लोग अपने ही परिवार, दोस्तों, और अपने ही आय वर्ग के बीच मस्त रहते हैं? किसी त्यौहार का मूल्यांकन इस पर भी होना चाहिए कि मनाने वाले परिवारों में महिलाओं को कितने हक मिलते हैं? क्या उन्हें सिर्फ पकाने और सजाने का, पूजा और मनाने का अतिरिक्त बोझ ही मिलता है, और उपवास से खाली पेट मिलता है, या फिर खुशियां मनाने में बराबरी का मौका और हक भी मिलता है? यह भी देखा जाना चाहिए कि उस त्यौहार से जुड़ा हुआ उपवास सिर्फ महिलाओं के मत्थे पड़ता है, या फिर चर्बी से लदे हुए मर्द भी एकाध दिन अपने बदन को राहत देते हैं? मूल्यांकन इस बात को लेकर भी होना चाहिए कि त्यौहार मनाने के तौर-तरीके गरीबों पर अधिक भारी पड़ते हैं क्या? फिर यह भी देखना चाहिए कि कौन सा त्यौहार कितना प्रदूषण छोड़ जाता है, नदियों में, तालाबों पर, सडक़ों पर, शामियानों में, कहां-कहां पर वह ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, धरती और जल प्रदूषण छोड़ जाता है? त्यौहारों को लेकर यह भी देखना चाहिए कि उनमें कट्टरता कितनी है? अंधविश्वास और पाखंड कितना है? वैज्ञानिक पैमानों पर त्यौहार कितने सकारात्मक, और कितने नकारात्मक होते हैं? इन सभी बातों को देखना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि आमतौर पर जो महिलाएं त्यौहार मनाती हैं, उनके परिवार के लडक़े या पुरूष उनका कितना हाथ बंटाते हैं? कुछ बरस पहले की एक तस्वीर याद पड़ती है जिसमें एक नामी-गिरामी टीवी जर्नलिस्ट रहे रवीश कुमार छठ पर सिर पर टोकरी रखे हुए शायद अपनी मां के साथ चलते हुए दिखते हैं। तो किस त्यौहार का बोझ पुरूष भी उठाते हैं?

हमें त्यौहारों का मूल्यांकन करते हुए यह भी सूझता है कि कौन सा त्यौहार दूसरी जाति, या दूसरे धर्म के लोगों के लिए कितना खुला रहता है? दूसरे समुदायों का उनमें कितना स्वागत होता है? बंगाल की याद पड़ती है कि वहां की विश्वविख्यात दुर्गा पूजा में हिन्दू जितने शामिल होते हैं, उतने ही मुस्लिम भी शामिल होते हैं, मूर्तिकार और साज-सज्जा करने वाले मुस्लिम ही अधिक रहते हैं, और वे पूजा के पूरे जलसों में शामिल रहते हैं। वहां पर यह त्यौहार धार्मिक न होकर सामाजिक अधिक रहता है। लोगों को अपने-अपने इलाकों में यह देखना चाहिए कि उनके त्यौहार कितने धार्मिक हैं, और कितने सामाजिक। एक वक्त गुजरात में गरबा पूरी तरह से सामाजिक था, कहीं से यह सुनाई भी नहीं पड़ता था कि उसमें गैरहिन्दू न पहुंचें। लेकिन बाद में माहौल बदलते चले गया, और अब तो ऐसी तख्तियां लगने लगी हैं, और एक सामाजिक त्यौहार पूरी तरह से एक धर्म का त्यौहार हो गया है। हर धर्म को यह हक है कि वह अपने त्यौहारों को अपने समुदाय का रखे, या सभी समाजों का उसमें स्वागत करे, इसमें बिना बुलाए दूसरे धर्म के लोगों को वहां जाकर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह डांस नहीं करना चाहिए।

त्यौहारों का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि उसके दिनों में उसे मना रहे लोग कितना सेहतमंद खाना खा पाते हैं? कई लोगों को यह बात अटपटी लगेगी, और वे कहेंगे कि त्यौहार तो होते ही इसलिए हैं कि खूब खाया-पिया जाए। लेकिन हम तो त्यौहार के हर पहलू का मूल्यांकन कर रहे हैं, इसलिए हम उसे सेहत के साथ जोडक़र भी देखेंगे ही देखेंगे। यहां पर लोगों को इटली में कई-कई दिनों तक चलने वाली पार्टियों के बारे में बताना जरूरी है जिसमें लोग खाते-खाते जब और अधिक नहीं खा पाते, तब वे जाकर उल्टियां करते हैं, और लौटकर और खाते हैं। पुराने रईसों के घरों में बाथरूम के अलावा वोमिटोरियम भी हुआ करते थे, वोमिट यानी उल्टी, और उसे करने की जगह बनाई जाती थी, क्योंकि खा-खाकर अघा चुके लोगों को और खाने के पहले उसकी जरूरत लगती थी। इस तरह कुछ त्यौहार अंधाधुंध खाने के रहते हैं, और लोगों को त्यौहार का मूल्यांकन या विश्लेषण करते हुए खानपान को भी ध्यान में रखना चाहिए।

अब चलते-चलते आखिर में एक और पैमाना सूझ रहा है कि लोग ठीक-ठाक संपन्न होने पर उस त्यौहार को मना रहे विपन्न लोगों की कितनी मदद करते हैं? दान देते हैं, या कमाई का एक हिस्सा जकात की तरह देते हैं, या अड़ोस-पड़ोस के गरीबों को अपनी रौशनी और मिठाई में हिस्सा लेने के लिए बुलाते हैं, या किसी और तरीके से जरूरतमंदों की मदद करते हैं? त्यौहार तो अपनी खुशी के साथ-साथ खुशियां मनाने और बांटने का भी मौका रहता है, कोई त्यौहार उतना ही अच्छा कहा जा सकता है जितना कि उसे मनाने वाले विपन्न लोगों को भी संपन्न लोगों का साथ मिले। अब हमने तो यहां एक छोटी सी लिस्ट गिनाई है, आप चाहें तो अपने आसपास के बच्चों को इस चर्चा के साथ एक निबंध लिखने को कह सकते हैं कि किस त्यौहार में क्या-क्या खूबी है, और क्या-क्या खामी है। ऐसा लिखते हुए बच्चों को सामाजिक सरोकार की भी थोड़ी सी समझ होगी, और वे आपसे कुछ सवाल भी कर सकेंगे। त्यौहारों पर स्कूलों की छुट्टी रहती है, और उस छुट्टी के बीच, या कि त्यौहार निपट जाने के बाद अगली छुट्टी के दिन बच्चों के साथ ऐसी दिमागी कसरत करके देखें, हो सकता है कि आपको भी अपने खुद के त्यौहार को लेकर एक नया नजरिया मिले। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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