संपादकीय
यूपी के रायबरेली, दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट, और छत्तीसगढ़ के मगरलोड में दो दिनों के भीतर की तीन घटनाओं का भला आपस में क्या रिश्ता हो सकता है? इसे समझने के लिए इन तीनों की कुछ जानकारी देखनी होगी। रायबरेली में एक दलित नौजवान को भीड़ ने चोर समझकर घेर लिया। इसकी खबर मिलने पर पुलिस गाड़ी वहां पहुंची, और गाड़ी में बैठे-बैठे पुलिसवालों ने कहा उसे जाने दो, और चले गए। भीड़ ने पीट-पीटकर उसे मार डाला। जाहिर है कि इतनी मारपीट के दौरान उसका नाम तो किसी ने पूछा ही होगा, क्योंकि वह अपनी ससुराल आया हुआ था। यह नौजवान कमजोर और मानसिक बीमार भी लग रहा था, लेकिन पुलिस उसे भीड़ के बीच से ले जाने तैयार नहीं हुई, और भीड़ तो भीड़ होती है, उसने इस कमजोर गरीब को बहुत बुरी तरह पीट-पीटकर मार डाला, और उसके वीडियो भी बनाए। कानून अपने हाथ में लेने में लोगों को अब कुछ नहीं लगता, यह उन्हें अपना कानूनी हक लगता है। उधर दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत में पहुंचकर एक हिन्दू-सनातनी बुजुर्ग वकील ने अपना जूता उतारकर चीफ जस्टिस पर फेका, और रोकने-पकडऩे पर वह यह कहते हुए गया कि सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। उसने बाद में यह भी कहा है कि उससे भगवान ने यह काम करवाया है, और वे मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से नाराज था, और जेल में रहने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। उसे कोई पछतावा नहीं है, दूसरी तरफ चीफ जस्टिस बी.आर.गवई ने इस सनातनी वकील की हरकत पर किसी कार्रवाई से इंकार कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे फोन पर बात करके अफसोस जाहिर किया है, लेकिन सनातन के नाम पर देश भर में दीवानगी का जो माहौल बना हुआ है, उसका सिर्फ एक नमूना ही सुप्रीम कोर्ट के दलित मुख्य न्यायाधीश को झेलना पड़ा है। अब हम तीसरी घटना पर आते हैं जो कि छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मगरलोड नाम की जगह पर हुई है। इस कस्बे में एक पुराने झगड़े को लेकर एक नाबालिग मुस्लिम लडक़े को कई हिन्दू लडक़ों ने पीटा, और पीछा करते हुए उसके घर गए। वह अपने घर में घुसकर छुप गया, तो इस भीड़ ने घर को घेरकर हंगामा किया, उस मुस्लिम परिवार की लड़कियों से बदसलूकी-छेडख़ानी की। सत्रह बरस के इस लडक़े को बचाने के लिए परिवार ने उसे घर के भीतर एक कमरे में बंद कर दिया, और बाहर पुलिस पहुंचने के बाद भी हंगामा चलते रहा। इस बीच पता लगा कि दहशत में इस लडक़े ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। अब कई हिन्दू लडक़े गिरफ्तार हुए हैं, और कई और की शिनाख्त के आधार पर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है।
अब इन तीनों घटनाओं को देखें, तो लगता है कि भारत में आज जो वंचित तबका है, जो कि सामाजिक रूप से सबसे कमजोर है, उस पर हर किस्म से हमले हो रहे हैं। दलित को पीट-पीटकर मार डाला जा रहा है, दलित के देश के मुख्य न्यायाधीश रहने पर भी उस पर एक सनातनी बुजुर्ग वकील जूता फेंक रहा है, और इसे दैवीय प्रेरणा भी बता रहा है, और इधर मगरलोड में एक नाबालिग मुस्लिम को मारते-पीटते हिन्दू नौजवानों की भीड़ उसके घर को घेरती है, शिकायत के मुताबिक परिवार की लड़कियों से बदसलूकी-छेडख़ानी करती है, और दहशत में मुस्लिम लडक़ा खुदकुशी कर लेता है। करीब चौबीस घंटों में ही हुई ये तीन घटनाएं बताती हैं कि देश में आज क्या हाल है। इन तीनों के पीछे आक्रामक हिन्दुत्ववादियों के हमले हैं, जो कि हिन्दू समाज के ही दलित तबके के खिलाफ जगह-जगह सामने आते हैं, और मुस्लिमों-ईसाईयों जैसे दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के खिलाफ तो सामने आते ही हैं। प्रधानमंत्री को शायद यह लग सकता है कि मुख्य न्यायाधीश पर चले जूते को लेकर उनके अफसोस से देश का माहौल बदल जाएगा, लेकिन देश का माहौल इतना बिगड़ चुका है, कि इसके आसानी से सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। सनातनी-हिन्दुत्ववादी सोच कहीं आदिवासियों के खिलाफ हो रही है, जो कि छत्तीसगढ़ के ही कई इलाकों में सामने आ रही है, तो दलितों के खिलाफ तो देश भर में खुली नफरत जलकुंभी की तरह सतह पर दिखती हैं। दरअसल लोगों की सोच के सामने जब जात-धरम की नफरत परोसी जाती है, और लोगों का दिल-दिमाग किसी सूखे स्पंज की तरह उस नफरत को सोख लेता है, तो फिर कोई भी सरकार उस स्पंज को दबाकर, निचोडक़र, उस नफरत को पानी की तरह बाहर नहीं निकाल सकती। दिल-दिमाग स्पंज की तरह सोखते जरूर हैं, लेकिन स्पंज की तरह निचोडऩे पर छोड़ते नहीं हैं। जिस देश-प्रदेश की सरकार नफरत को किसी भी तरह की छूट देती है, वह बेकाबू इस हद तक हो जाती है कि जब सरकार को उससे समस्या होने लगे, तब भी वह थमती नहीं है। अब चीफ जस्टिस की तरह माफ कर देने वाले तो तमाम लोग होते नहीं, इसलिए रायबरेली की घटना के बाद आधा दर्जन पुलिस वाले सस्पेंड हुए हैं, और यह जाहिर है कि जितने वीडियो इस भीड़त्या के देखने मिल रहे हैं, उस सुबूत के आधार पर दर्जनों और लोग गिरफ्तार होंगे। इसी तरह मगरलोड में भी दर्जन भर लोगों की गिरफ्तारी का रंग-ढंग दिख रहा है। एक दलित या एक मुस्लिम की मौत पर अगर एक-एक दर्जन गैरदलित, गैरमुस्लिम जेल में जाएंगे, तो यह किस समाज का नुकसान होगा? मरने वाले तो चले गए, अब मारने वाले लोग जेल जाएंगे, और हो सकता है कि किसी प्रदेश की पुलिस इतनी ईमानदार हो, वहां की कोई अदालत इतनी सख्त हो कि वह ऐसे लोगों को सजा भी दे-दिला सके। फिर नफरती हिंसा के अपने खतरे रहते हैं, जब लोगों का मिजाज ऐसा हो जाता है, तो फिर वे दूसरे धरम, नीची कही जाने वाली जात के लोग न मिलने पर बात-बात में कानून हाथ में लेकर अपने ही तबके के दूसरे लोगों को भी मार सकते हैं। इंसान अपनी खामियों के लिए बात-बात में जानवरों की मिसाल देते हैं, ऐसे लोगों की जुबान में अगर हम कहें, तो जब लोगों के मुंह हिंसा और नफरत का खून लग जाता है, तो वे इंसानखोर हो जाते हैं, और यह नहीं तो वह सही के अंदाज में किसी न किसी को मारते हैं। आज हम देश भर में कानून हाथ में लेने का एक अभूतपूर्व सैलाब देख रहे हैं, और बुरी मिसालें बहुत अच्छा तर्क बनकर लोगों के काम आती हैं। पता नहीं यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा, लेकिन यह बात तो तय है कि हिंसा को छूट, और अफसोस के आंसू साथ-साथ नहीं चल सकते, ऐसे में हिंसा की छूट का ही असर होगा, हो रहा है।


