बस्तर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
जगदलपुर, 23 मार्च। बस्तर की गौरवशाली धरा पर आज खेल और संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जहाँ ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन 2026’ के माध्यम से न केवल फिटनेस का संदेश दिया गया, बल्कि अंचल की समृद्ध लोक कलाओं ने धावकों के मार्ग में उत्साह का संचार किया।
मैराथन की शुरुआत से लेकर 42 किलोमीटर के अंतिम फिनिशिंग पॉइंट तक, धावकों का स्वागत बस्तर के पारंपरिक लोक नृत्यों की गूँज के साथ हुआ। ऐतिहासिक लाल बाग से दौड़ प्रारंभ कर धावक जब चांदनी चौक पहुंचे, नेगानार के झाड़ा सिरहा नृत्य के साथ स्वागत किया गया और जब राम मंदिर पहुंचे तब छिंदावाड़ा के धुरवा नृत्य के नर्तक दलों ने अपनी ऊर्जावान प्रस्तुतियों से खिलाडिय़ों का जोश बढ़ा दिया।
जैसे-जैसे मैराथन का कारवां आगे बढ़ा, पीजी कॉलेज चौक और एसटीएफ कैंप जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों पर किलेपाल और आंजर के नर्तक दलों ने विश्व प्रसिद्ध ‘गौर सिंग नृत्य’ का प्रदर्शन किया। सिर पर कौडिय़ों से सजे गौर के सींग और पारंपरिक वेशभूषा में सजे इन कलाकारों को देख विदेशी और बाहरी राज्यों से आए धावक मंत्रमुग्ध हो गए। यह दृश्य बस्तर की अदम्य शक्ति और शौर्य का प्रतीक लग रहा था। वहीं धरमाउर के रास्तों पर मुंडाबाजा की गूँज और पोटानार के नर्तकों की लयबद्धता ने मैराथन को एक उत्सव का रूप दे दिया। रास्ते के कठिन मोड़ों पर जब धावकों का हौसला डगमगाने लगता, तब कलाकारों की थिरकन उन्हें लक्ष्य की ओर बढऩे के लिए प्रेरित करती रही।
मैराथन के मध्य पड़ाव, यानी बड़ांजी तिराहा और चित्रकोट के क्षेत्रों में गेड़ी नृत्य और परब नृत्य का अद्भुत नजारा देखने को मिला। बाँस की ऊँची गेडिय़ों पर संतुलन बनाकर नाचते कलाकारों ने शारीरिक दक्षता और कला के संतुलन का ऐसा उदाहरण पेश किया, जो मैराथन के मूल उद्देश्य ‘फिटनेस’ से पूरी तरह मेल खाता था। अंतत:, जब धावक 42 किलोमीटर की अपनी चुनौतीपूर्ण यात्रा पूरी कर फिनिशिंग पॉइंट पर पहुँचे, तब वहाँ धुरवा नाचा के कलाकारों ने विजय की खुशी में झूमते हुए उनका आत्मीय स्वागत किया।
दरभा, लोहण्डीगुड़ा और तोकापाल जैसे विकासखंडों के इन लोक कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि बस्तर की विरासत केवल संग्रहालयों में नहीं, बल्कि यहाँ के जन-जीवन और उनकी हर धडक़न में बसती है।


